जिद कुछ कर दिखाने की

जिद कुछ कर दिखाने की

Friday, December 9, 2011

वीरू के शोले, जय हो



सचिन के शब्दों को सहवाग ने सही साबित कर दिया। सहवाग ने अपने ओपनिंग पार्टनर का रिकॉर्ड भी तोड़ा और उनकी बात का मान भी रखा। खुद सचिन ने कहा था सहवाग ही मेरा 200 का रिकार्ड तोड़ सकते हैं। क्रिकेट में हर रिकॉर्ड टूटने को बनता है। क्रिकेट के भगवान भी इससे नहीं बच सकते। किसने सोचा था कि 300 गेंदों की पारी कोई एक बल्लेबाज 200 रन बना सकेगा। पर उस सोच को पूरी तरह रौंदते हुए सचिन तेंदुलकर ने 24 फरवरी 2010 को ग्वालियर में दोहरा शतक बनाया। तब पूरी दुनिया के क्रिकेट दीवाने बोले-असंभव को संभव कर दिया। अब इस रिकॉर्ड को कोई नहीं तोड़ सकेगा। पर क्रिकेट के देवता का यह कारनामा सिर्फ 21 महीने में पुराना पड़ गया। रिकॉर्ड बुक में अब नया नाम उनसे ऊपर दर्ज हो गया। वीरेंद्र सहवाग। सचिन अब नंबर दो पर आ गए। इसके मायने यह नहीं है कि अब सचिन महान खिलाड़ी या भगवान नहीं रहे। सचिन अब भी महान हैंं। सिर्फ उनके बनाए रनों के रिकॉर्ड को एक खिलाड़ी ने पीछे छोड़ा है सचिन को नहीं। सहवाग ने इंदौर के होलकर स्टेडियम में चौका लगाकर 200 रन पूरे किए। इस रिकॉर्ड में कई बातें समान है, जो अपने आप में रोचक है। जैसे वन-डे इतिहास के दोनों दोहरे शतक भारतीयों ने बनाए। दोनों दोहरे शतक ओपनिंग बल्लेबाजों ने बनाए। दोनों ही भारत की जमीं पर और मध्यप्रदेश के शहरों में लगे। दोनों ही डे-नाइट के मैच थे। सचिन और सहवाग दोनों ने ऐसे वक्त ये शतक लगाए जब तमाम आलोचक और सहयोगी भी कहने लगे थे कि ये चूक गए हैं, उम्र उनपर हावी है, ये अब बड़े स्कोर नहीं बना सकते। सचिन ने जब दोहरा शतक लगाया तब वे भी ऐसी ही आलोचना के शिकार थे और आज सहवाग का भी हाल यही है। दोनों ने दिखा दिया कि शून्य से शिखर पर जाने का जज्बा उनमें अब भी है। हर दिन वे नई इबारत और नए रिकॉर्ड बनाने का माद्दा रखते हैं। क्रिकेट के खेल में 33 वह उम्र है जब आपको बल्ला खूंटी पर टांग देने की सलाह दी जाती है। खिलाड़ी रन आउट होने लगते हैं। गेद से नजरें चूक जाना सामान्य बात हो जाती है। पैंतीस की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते सिर्र्फरिकॉर्ड और पुराने दिनों की यादगार पारियां आपके पीछे होती हैं। लेकिन सहवाग यहां भी सबसे अलग नजर आते हैं वे कुछ भी पीछे नहीं छोडऩा चाहते। उपलब्धियों के साथ दौड़ लगाते हुए वे उम्र से होड़ लेते नजर आते हैं। उनके बारे में सोचते हुए एक ही शब्द उभरता है-अद्भुत। जिस सहजता से वे बल्ले को घुमाते हैं और जिस ढंग से उन्होंने अपने कैरियर को गढ़ा है वह चौंकाने वाला है। क्रिकेट के तमाम स्टाइलिश बल्लेबाज उन्हें नकार देते हैं, क्रिकेट बुक के हिसाब से उनकी बल्लेबाजी एकदम उलट है। वे अपने अंदाज में खेलते हैं, न उन्हें कोई स्टाइल की परवाह है, न स्टांस की न कोई खास तरीके की उनका तो एक ही अंदाज है गेंदबाज की धुलाई। गेंद बाउंड्री पार करे, रन बने, टीम जीते। वो रन कैसे बने, कौन सा शॉट खेला इस सबका हिसाब किताब वीरू नहीं रखते। उनके शॉट अपने हैं और एकदम नए हैं। आप क्रिकेट की किताब में ढूंढते रहिए उस शॉट का नाम। सिर्फ सिर खुजाते रहेंगे वो कहीं नहीं मिलेगा क्योंकि वो वीरू का अपना शॉट, अपना स्टाइल है। सहवाग का रिकॉर्ड और इतने लंबे समय तक टीम में टिके रहना इसलिए भी महत्व रखता है कि उन्होंने देश के टॉप बल्लेबाजों के दौर में अपनी जगह बनाई है। सौरव-सचिन की ओपनिंग जोड़ी के दौर में किसी तीसरे खिलाड़ी का ओपनिंग में जगह बना पाना असंभव था। उस दौर में भी सहवाग जमे रहे और लगातार आगे बढ़े। कई दौर ऐसे भी आए जब उनके फुटवर्क, हेड मूवमेंट पर सवाल उठे। कहा गया कि दुनिया के सारे गेंदबाज जान गए हैं कि सहवाग को एक ही स्टाइल में खेलना आता है और अब वे कभी उबर नहीं पाएंगे। उनका दौर खत्म हो गया। ये दोहरा शतक तमाम आलोचकों को बाउंड्री के बाहर का रास्ता दिखाता है। सहवाग एक बार मैदान पकड़ लेते हैं तो फिर आसानी से मैदान नहीं छोड़ते। गेंदबाज उनके आगे दम तोड़ देते हैं, वे शतक के करीब जाकर भी अपना स्वाभाविक खेल खेलते हैं। कभी कोई प्रेशर उनके ऊपर नहीं दिखता। मैच बड़ा हो या छोटा रन 4 हो या 99 उनके खेलने के अंदाज में कोई फर्क नहीं पड़ता। भारतीय क्रिकेट के दो ही जय और वीरू हैं सचिन और सहवाग। दोनों ने हमेशा बल्लेबाजी से मैदान में शोले बरसाए हंै। जय जयकार हासिल की है। जब भी दोहरे शतक की बात आएगी जय-वीरू दोनों का नाम साथ ही आएगा।



Friday, December 2, 2011

तो थप्पड़ो का सिलसिला शुरू हो जाएगा

पिछले सप्ताह केंद्रीय मंत्री शरद पवार को एक युवक ने थप्पड़ जड़ दिया। कारण। उसने कहा कि मंहगाई बढ़ रही है और ये (मंत्री महोदय) जवाब देने को भी तैयार नहीं। हर सवाल पर जवाब एक ही -मुझे नहीं पता। शरद पवार ने पहली बार महंगाई के मुद्दे पर पल्ला नहीं झाड़ा है। इसके पहले भी कई मौकों पर वे महंगाई का मजाक उड़ा चुके हैं। कभी कहा मैं भगवान नहीं हूं , कभी बोले इसे कंट्रोल करना हमारे बस में नहीं, कभी उछलकर बोल पड़े लोग ज्यादा खा रहे हैं इसलिए महंगाई बढ़ रही है। एक आम हिंदुस्तानी जो सुबह शाम दो सूखी रोटी की जुगाड़ क े लिए परेशान है, उसे अपने नेता ऐसे जवाब देंगे तो क्या होगा? थप्पड़ मारना सहीं नहीं है, पर आम आदमी की बेबसी का मजाक उड़ाना, उसके दर्द को अंतरराष्टï्रीय बाजार के भरोसे छोड़ देना। उसें रोटी मिल सके इसकी व्यवस्था करने के बजाए उसे मुद्रा स्फीती, महंगाई दर, आर्थिक व़द्घि की खबरें दिखाना। मंच पर चढ़कर सरकारी आंकड़े दिखाना, भूख से मरते आदमी के सामने अकड़ से खड़े होकर देश की सम़द्घि, वैभव के गुण गाना ऐसे ही कई और थप्पड़ पैदा करेे तो बड़ी बात नहीं। इस सरकार के अलावा विपक्ष में बैठे राष्टï्रीय नेता भी केवल अपने एसी कमरों में बैठकर चिंता जताते हैं। नमक लगे काजू, बादाम के शर्बत के साथ महंगाई पर चिंतन करते हैं और बाहर आकर कहते हैं- आम आदमी ज्यादा खाने लगा है इसलिए महंगाई बढ़ रही है। ये मजाक नहीं तो क्या है। सरकार खुद को करोड़ो के घोटाले को बढ़ावा दे रही है, केंद्र में सत्ता के खिलाफ अभियान उठाने वाला विपक्ष अपने सत्ता वाले राज्यों में भ्रष्टïाचार की खदाने खोलकर बैठा है। यात्राओं के नाम पर राजनीति और गरीबों का दर्द बांटने का ड्रामा हो रहा है। गरीबों, दलितों के हित की बात करने वाली बसपा हाथी, पार्क, अपनी पार्टी की संभाओं के बड़े तंबू लगवाने में पैसा फूंक रही है। जबकि उनके राज्य में दलित रोटी को तरस रहे हैं। गाजियाबाद और आगरा में विवाह समारोह में रोटी खाने को घुसे किशोरों को भीड़ ने पीट पीटकर मार डाला। ये है बहुजन की जीत। भाजपा शासित राज्यों में खदानों से पैसा उलीचा जा रहा है, लोकायुक्त की नाक के नीचे मंत्री अपराध कर रहे है। कांग्रेस शासित राज्यों में सीड़ी सामने आ रही है तो कहीं मंत्री शहीदों का पैसा खा रहे हैं। अन्ना के आंदोलन की भी चमक ठंडी पड़ गई है। उनके सिपाहसालार भी जनता को ही लूट रहे हैं। ऐसे में पवार को पड़ा थप्पड़ नेताओं की पूरी कौम के लिए एक अलर्ट है। संभलिए, देश सत्तर के दशक की तरह फिर गुस्से में हैं। ऐसे थप्पड़ृों की बौछार हर गली मोहल्ले में दिखाई दे सकती है। जल्दी ही सरकार और नेता नहीं सुधरे तो इस देश का हर आदमी एंग्री यंगमैन बन जाएगा और हर नेता के गाल पर एक थप्पड़ होगा।

Sunday, February 13, 2011

ये मेरा प्यार है


प्रेमिका से झगड़ा करना आसान नहीं है
अपनी प्रेमिका से रूठकर जैसे व्यक्ति अपने आप
से रूठ जाता है, अपने जीवन से रूठ जाता है
प्रेमिका से रूठा हुआ प्रेमी तो अभिशप्त होता है
उसके लिए जीवन के हर सुख पर शाप कुंडली
मारकर बैठ जाता है। उसका कोई विकल्प नहीं है
चुपचाप प्रेमिका को मनाओ !
(नरेन्द्र कोहली के उपन्यास प्रीति कथा से)

प्रेमिका, प्रेम, और उनके बीच का रूठना, मनाना
प्यार की गहराई, एक दूजे के बिना जीवन के सुख
पर शाप लग जाना, प्रेमिका नहीं मानी तो जीवन
का कोई मोल नहीं। ये सच्चाई (थी)जीवन की, बीस
साल पहले तक। तकनीक की छलांग और वक्त की रफ्तार
में प्यार का स्पर्श, समर्पण, नजरें, नजाकत, इंतजार, इकरार, खामोशी,
अदाएं मिलने की खुशी बिछुडऩे का गम सब धीरे-धीरे कल की बात
हो गया है। अब जमाना फटाफट का है। क्रिकेट के ट्वंटी-20 की तरह।
जिसमें ग्लैमर है, चकाचौंध है, दिखावा है, चीयर गल्र्स हैं। पर फिर
भी वह क्रिकेट नहीं है। है सिर्फ क्रिकेट जैसा। क्रिकेट तो टेस्ट मैच ही
है। प्यार भी अब उसी राह पर है। दिखने को बहुत कुछ। जित देखूं,
तित प्रेमी। सच है शहर में जिधर नजर घूमाएंगे। आपको प्रेमी जोड़
मिल जाएंगें। पर उनमें से ज्यादातर के बीच प्यार नहीं है। वो सिर्फ
प्यार जैसा है।

चार दिन बाद वेलेंटाईन डे है। प्यार का दिन। व्यापार वाले भी तैयार
हैं। एक प्रेमी/पे्रमिका जितने ज्यादा प्रपोज करे उतना ज्यादा लाभ। गिफ्ट शॉप,
शॉपिंग मॉल से लेकर छोटी-मोटी दुकाने तक सज चुकी है। प्यार किया नहीं
जाता हो जाता है की गीत को भूल जाइए। अब प्यार को बाकायदा आमंत्रित
किया जाता है। वो होता नहीं करवाया जाता है। प्रेम पत्रिका (वेलेंटाइन ग्रीटिंग कार्ड)
छपाई जाती है, बांटी जाती है। एक से एक खुबसूरत और महंगे। किसी में म्यूजिक
है, तो किसी में फ ूल। इन पत्रिकाओं के शब्द, रंग, रूप कुछ भी प्रेम करने वाला
का नही। सब रेडीमेड। बहुत सारे प्रेम पंछियों को तो इनके भीतर लिखें शब्दों के
अर्थ भी पता नहीं होते। वे अंग्रेजी में जो होते हैं। लाल, पीला रंग साईज देखा
और खरीद लिया। दे आए जिस पर दिल आया। हो सकता है उसे भी पढ़कर कुछ
समझ न आए। पर वो ये समझता है ये किसलिए दिया। इसे ही कहते हैं प्यार में
भाषा की कोई जरूरत नहीं। ये है आजकल का रेडीमेड प्रेम निवेदन। इस आधुनिक प्यार में
न खुशबू है न दिल। वो इजहार के पहले की शरम है न इकरार की खुशी। कार्ड पकड़ाया और
तत्काल मांग लिया जवाब। इस हाथ दे उस हाथ ले। पहले घर से निकलना मंदिर जाने के बहाने
फिर चुपचाप, नजरों के इशारे से फूल किसी दीवार पर रखकर वो चली जाती थी। सबसे नजरें
चुराकर उसे उठाना। जवाब के मौके तलाशते महीनों गुजर जाते थे। पर वो इजहार और इकरार
के बीच का वक्त जिस्म में एक खुशी भरी तडप देता है। सामने आते ही धड़कनों का बढ़ जाना।
नजरों के इशारों को पढऩे की बेताबी।

पहले किसी शादी, त्योहार, मेले पर उससे नजरें चार होती थी। ऐसे आयोजनों पर
जाने का बड़ा इंतजार होता था वहां वो मिलेगी। अब डिस्को है, मॉल है। प्यार की बची-खुची
संवेदना को मोबाइल की तरंगों ने धो ड़ाला। दिनभर में न जाने कितने मैसेज इधर-उधर
फारवर्ड होते रहते हैं। पता ही नहीं चलता किसने किसके लिए लिखा था। मोबाईल संदेश से कई गुना
ज्यादा मजा देते हैं नजरों और ईशारों के संदेश। अब मिलन के नाम पर ई-मिलन, ई-चैटिंग, ई-डेटिंग
और न जाने कितने अ, आ, ई, ऊ हो गए है। लैपटॉप खोला धड़धड़ाते उंगलियां चलाई, दिल में कोई
इच्छा नहीं मिलने की, चेहरे पर गुस्सा, बाहों में कोई और फिर भी लिख दिया- डियर मिस यू, तुम्हारे
बिना मन नहीं लगता, मैं बिल्कुल अकेला, तन्हा हूं। दिनभर अपने मेल चेक करता रहता हूं। तुम्हारा
मेल कब आएगा। अब मैं सोने जा रहा हूं गुड नाईट, टेक केअर। मेल सेंट किया फिर मोबाइल से मैसेज
किया आई हेव सेंट यू ए मेल, लव यू, मिस यू। इस झूठे मेल-मिलाप के बाद चल पड़े बगल में बैठी
लड़की के साथ फिल्म देखने-आई हेट लव स्टोरीज। पहले प्यार में नींद उड़ जाया करती थी, अब खुद
तो जागते हैं पर मोबाइल स्विच ऑफ हो जाता है। मैसेज के साथ- मैं थक गया हूं, गुड नाईट। न वादे,
न कसमें, न सात जन्मों का रिश्ता। सुबह चैटिंग, दोपहर को मीटिंग और शाम को गुडबाय।
कई बार तो ऑनलाईनचैटिंग से ही प्यार पनपता है और ऑन लाईन ही ऑफ हो जाता है। सिर्फ एक शब्द
के साथ-ब्रेकअप।

अब आते हैं पहले प्यार पर। एक जमाना था जब आपने पहले प्यार की अनंत कथाएं सुनी होगी।
पूरी जिंदगी पहले प्यार को न पा सक ने का मलाल रहता था। अब पहले, दूसरे, तीसरे का कोई गम नहीं।
याद करिए, प्रेम संदेश के वो दरख्त वो मंदिर। मंदिर की दीवारों पर भोलेपन से प्यार पाने की तडप।
इन दीवारों लिखी इबारत-मेरी उनसे शादी करा दो, मुझे उससे मिला दो। दरख्तों पर बने दिल जिनमें
लिखे नाम। अब न वो प्रेम के छायादार दरख्त हैं, न आस्था और विश्वास के मंदिर। इन दीवारों और दरख्तों
के साथ ही प्रेम भी धुंधला पड़ता जा रहा है। मोबाइल पर आई लव यू का इजहार भी छोटा हो गया
है सिर्फ आईएलयू लिख कर भेज देते हैं। ये है प्रेम का शार्टकर्ट जो सिर्फ मैसेज ही नहीं हमारे जीवन
में भी उतर आया है। अब दिल की दीवार पर कुछ नहीं लिखा होता है। जो भी लिखा पढ़ा जा रहा है
वो सब फेसबुक की वॉल पर है। चेहरे पढऩे से हम दूर हो गये हैं सिर्फ फेसबुक पढ़ रहे हैं। फेसबुक
ही हमारे प्रेम के बदलते चेहरे का गवाह है। हम आंखों की नमी दिल की तपिश सेहमारा कोई मतलब नहीं।
कोई हमारे साथी पर टिप्पणी करे हमें फर्क नहीं पड़ता। प्रेम गोपनीय या निजी नहीं रहा। इजहार और अलगाव दोनों की
सूचना फेसबुक पर सबके लिए ओपन है। कोई भी आए, लॉग इन करें और घुस जाए हमारी प्रेम की कहानी में। इस वेलेंटाइन डे पर एक दिन के लिए मोबाइल, ई-मेल, फेसबुक सब बंद कर दीजिए। जिसे आप अपना प्यार कहते हैं, उसके मैसेज, मेल,के बिना कैसा दिन गुजरता है। आपको प्यार की तडप, बेताबी, मिलने की बेकरारी, जुदाई का गम सब महसूस करिए। मशीन को छोड़ कर मनुष्य बनिए। यदि आपके भीतर वाकई तूफान उठता है, आपका दिल उससे मिलने को बेकरार हो जाता है। तो मानिए आप प्यार है। वरना जिसे आप आई लव यू के मैसेज भेज रहे हैं, वो सिर्फ टाईम पास है। जल्दी कीजिए, सच्चा प्यार आपका इंतजार कर रहा है।

Wednesday, January 12, 2011

उठो, कल हमारा है


उठो, कल हमारा है
हिंदुस्तान इस वक्त दुनिया का सबसे युवा देश है। लगभग पचपन करोड़ युवा। यानी तेरह से 35 साल की आबादी वाला समूह। यह समूह दुनिया का सबसे तेज, ताकतवर, ऊर्जावान और कामयाबी की और बढ़ता समूह है। जापान को गणित, अमेरिका को टेक् नॉलाजी तो अंग्रेजों को डॉक्टरी की दुनिया में भी हमारे युवा पछाड़ चुके हैं। एक दशक पहले तक जापान गणित में अव्वल था तो अब हम हैं। हमारे युवा जितनी तेजी से पहाड़े याद रखते हैं वह किसी के बस की बात नहीं। बड़ी से बड़ी संख्या का गुणा वे चुटकी बजाते कर देते हैं। बिना मशीनी सहायता के। अमेरिकी राष्टï्रपति बार-बार अपनी आबादी को चेता रहे हैं। संभलो, भारतीय युवा आ रहे हैं। अपनी नौकरी बचाओ, ज्ञान बढ़ाओ। यानी हमारे युवाओं की बुद्घि को सब जान, मान रहे हैं। वे सम्मान हासिल कर रहे हैं। ये पचपन करोड़ युवा सिर्फ संख्या नहीं है। ये है ऊर्जा के भंडार। देश को रोशन करने वाले लैम्प। एक तरह से ये नये एंग्री यंग मैन हैं जो भारत को नई ऊंचाई देंगे। अमिताभ बच्चन का फिल्मी एंग्री यंग मैन वाला किरदार थोड़ा निगेटिव था। वह सत्ता को उखाड़ फेंकने को तत्पर रहता था। पर हमारे युवा सत्ता को उखाड़ फेंकने के बजाए सिस्टम को बदलने की
तरफ बढ़ रहे हैं। वे पुराने ढर्रों से बाहर निकल रहे हैं।
आज की युवा पीढ़ी का न कोई रोल मॉडल है, न वे किसी के जैसा बनना चाहते हैं। वे सिर्फ और सिर्फ जो खुद हैं वही बनना चाहते हैं। वे राहुल गांधी के भाषणों पर ताली पीट सकते हैं, धोनी से सीख सकते हैं, साइना नेहवाल से कुछ नया हासिल कर लेंगे। पर वे इनमें से किसी की कापी नहीं बनेंगे। वे अपनी पहचान खुद बना रहे हैं। उन्हें रोल मॉडल की कोई जरूरत नहीं है। वे इस समाज में अपना रोल खुद लिख रहे हैं। वे एंग्री हैं पर अपनी जगह बनाने के लिए। उनका गुस्सा एक जुनून एक ऊर्जा है। उनमें एक तड़प है कुछ कर दिखाने की। इसके उदाहरण सैकड़ों हैं। एक बस ड्राइवर के बेटे सुशील कुमार ने अपने पसीने से कुश्ती के एरिना में नई कहानी लिखी। वहीं रिक् शा चालक की बेटी दीपिका कुमारी ने तीरंदाजी में जीत का निशाना लगाया। इन युवाओं का एक ही फलसफा है- समझौता नहीं करना, जो दिल कहे वो करो, जो दिमाग को ठीक लगे उस राह पर चलो और कामयाबी जब तक न मिल जाए चलते रहो। थककर बैठना इन्होंने नहीं सीखा। वे जो भी सीख रहे हैं अपनी गलतियों से।
दिमाग पर ऐसा कोई बोझ नहीं रखना चाहते कि मेरा मन ये था पर मैंने वो कर लिया। ऐसे युवाओं मे हैं देश के रूपए को चिन्ह देने वाले उदय कुमार। फार्मूला वन रेस के विजेता करुण चंडोक। 26 साल की उम्र में संसद में पहुंचने वाले हमीदुल्ला सईद। 33 की उम्र में मैक्स मोबाइल जैसी कंपनी खड़ी करने वाले अजय अग्रवाल। कश्मीर के दर्द पर कफ्र्यू नाइट जैसी किताब लिखने वाले 34 साल के बशरत पीर। 15 साल की उम्र में 32 घंटे लगातार वायलिन बजाकर गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में स्थान बनाने वाली अथिरा कृष्णा। देश में ऐसे होनहार युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है।

आर्थिक उदारीकरण के बाद जन्मी इस पीढ़ी में जिम्मेदारी का भाव है। वह तकनीकी ज्ञान के साथ सामाजिक सरोकार भी समझती है। वोट की कीमत और नौकरी के पीछे दौडऩे के बजाय अपना खुद का कारोबार करने में यकीन रखती है। अभी तो देखिए 2015 तक ये गुस्सा और जुनून कैसे देश की किस्मत संवार देगा। उस वक्त हमारी कुल युवा आबादी का लगभग 75 फीसदी शिक्षित होगा। युवाओं के इस जज्बे को समझते हुए गांधीजी ने
उन्हें समाज और इतिहास बदलने की क्षमता रखने वाला बताया। शिवाजी सावंत की मृत्युजंय में युवाओं की पहचान के कुछ आधार दिए गए है।आज का भारतीय युवा उन मानदंडों पर पूरा खरा उतरता है। आइए सिलसिलेवार उन आधारों को जानें-
- पुरूषार्थ-पुरुषार्थ थोड़ा सा ही क्यों न हो। यह हजार बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। बातों से भावनाएं जाग सकती है किंतु उस सिद्घांत की अनुभूति के लिए पुरुषार्थ नहीं किया गया तो समझो समय और भावना बेकार नष्टï हुई। अर्जुन ने मछली की आंख के प्रतिबिंब पर ही ध्यान केंद्रित किया, तीर छोड़ा और स्वयंवर की शर्त पूरी कर ली। द्रोपदी को प्राप्त किया। यहां बाण पुरुषार्थ का, मछली लक्ष्य का प्रतीक है।
- निर्भयता- निर्भयता युवा के जीवन संगीत का सबसे उंचा स्वर है। इस स्वर की बेसुरी और बिखरी हुई ध्वनि है भय। जग ऊंचे स्वर की तान सुनने को उत्सुक होता है, फटी हुई आवाज नहीं। साहस और खेल में कामयाबी केलिए एटीकेटी नहीं चलती, असफल होने के डर से भागने के बजाय , साहस के साथ डटे रहें, सफलता आपके सामने होगी।
-अभिमान- ये है युवावस्था की आत्मा। जिस मनुष्य में श्रद्घा नहीं है, वह मनुष्य नही है। और जिस युवा में अभिमान नहीं है, वह युवा नहीं है।
- महत्वकांक्षा-ये हर युवा का स्थायी भाव है। मैं महान बनूंगा। परिस्थिति के मस्तक पर पैर रखकर मैं उसे झुका दूंगा। यह विचारधारा ही युवा को ऊँचा उठाती है। जीवन में असफल होने का बड़ा कारण लक्ष्य का न होना है। स्वयं को जानो सुकारात का यह कथन ही जिंदगी बदलने को काफी है।
-उदारता- उदारता युवावस्था का अलंकार है। अपनी शक्ति का अन्य दुर्बलों के संरक्षण में उपयोग। स्वयं जीवित रहकर दुसरों को जीने का अमूल्य साधन।
आज का भारतीय युवा इन सभी कसौटयों पर खरा उतरता है। ऐसे युवाओं के जोश से भरे हिंदुस्तान को कोई नहीं रोक सकता। साथियों उठो, आगे बढ़ो कल हमारा है।

Thursday, January 6, 2011

सातवीं पास किसान ने खोजा 'गुणा' का आसान फार्मूला




हरियाणा/कैथल. गांव सौंगल के महज सातवीं पास किसान लछमन सिंह ने गुणा करने का आसान तरीका ढूंढ निकाला है। उसके फार्मूला से विद्यार्थी जल्द गुणा करना सीख जाते हैं। लछमन इसकी सीडी तैयार स्कूलों में वितरित करेगा। उसकी खोज जल्द ही पेटेंट होने वाली है। बुधवार को लछमन ने राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय कैथल में दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों को मौखिक रूप से बड़ी गुणा करने के गुर सिखाए। उन्होंने बाकायदा ब्लैक बोर्ड पर भी विद्यार्थियों को गुणा करके दिखाई और मौखिक रूप से भी गुणा की। सभी विद्यार्थी लछमन के गुणा करने की स्पीड से हतप्रभ थे। गांव सोंगल का रहने वाला लछमन सिंह सातवीं जमात तक पढ़ा है और उसकी गणित में खासी रुचि है। इसी कारण उसने गणना करने के आसान तरीके ईजाद किए। निरंतर अभ्यास से यह संभव हुआ है।

ऐसे करता है गणना

गणना के फार्मूला में दोनों ही संख्याओं के पहले एवं दूसरे अंकों से गणना की शुरुआत की जाती है, चाहे कितनी भी बड़ी गणना क्यों न हो, यह कुछ ही क्षण में की जा सकती है। उसने अपने फार्मूला से तैयार की गई गणना के बाद दोनों संख्याओं में से एक को गणना के परिणाम से भाग देकर जांच की, तो दूसरी संख्या उसके भागफल में आ गई। इससे उसकी गणना का फार्मूला स्वत: सिद्ध हो गया। उसने बताया कि गणित एक ऐसा शास्त्र है, जिसमें परिणाम सही पाए जाने के बाद और कोई सुबूत देने की अवश्यकता नहीं होती।

साभार- दैनिक भास्कर

Saturday, January 1, 2011

भूलना मना है


मैं एक बार कमिटमेंट कर देता हूं तो फिर अपने आप की भी नहीं सुनता। आपका मन जब भी संकल्प से पीछे हटे, तब इस संवाद को दिल से बोलिए...

भूलना मना है
एक और नया साल। एक और नई सुबह। रातभर जश्न, सुबह हैप्पी न्यू ईयर। दोपहर तक तमाम संकल्प। इस बार मैं सिगरेट छोड दूंगा, तुम शराब छोड़ दो, हम डटकर पढ़ेंगे, मैं अपना वजन कम कर लूंगी, हम आपस में नहीं लड़ेंगे, बचत करेंगे, फ्लर्ट नहीं करूंगा/करूंगी आदि इत्यादि जैसी लंबी लिस्ट। सब संकल्प ले रहे हैं। वादे करते हैं। पर एक जनवरी की शाम आते-आते याद का परदा सरकने लगता है। अपने संकल्प का कायाकल्प करने लगते हैं। मैंने सिर्फ सिगरेट छोडऩे का कहा था, सिगरेट शराब दोनों नहीं।
और एक सप्ताह बीतते-बीतते फिर वही कहानी। न कुछ छूटा न कुछ बदला। लंदन में एक रिसर्च ने भी इसे साबित किया है कि सत्तर फीसदी से ज्यादा लोग अपने न्यू ईयर रिजाल्यूशन यानी संकल्प सात दिन में भूल जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण उनमें बदलाव की तड़प ना होना है। साथ ही वे इस बदलाव के लिए अकेले जुझते रहते हैं। वे अपने रिश्तेदारों, दोस्तों की मदद नहीं लेते। जरूरत है करीबियों की मदद लें, देखिए आपके सारे संकल्प पूरे होंगे। वैसे भी यह साल तो ग्यारह अंक का है। ग्यारह यानी एक और एक यानी सहयोग का साल। ग्यारह वो अंक है जिसे हमेशा से शुभ माना गया है। पंडित को दक्षिणा देनी हो, या दान, भगवान को लड्डू चढ़ाना हो या दुर्वा सब ग्यारह हो तो क्या बात है। मंत्रों का जाप भी एक और एक से ही बढ़ता है। ग्यारह, एक सौ एक एक हजार एक, एक लाख एक और जितना चाहो पर एक और एक जरूर होगा। भारत के लिए खेल में भी अभी ग्यारह का जलवा है। सही समझे क्रिकेट में ग्यारह खिलाड़ी और इसी खेल में भारत है दुनिया का नंबर वन । हिंदू व्रत में सबसे फलदायी व्रत एकादशी। हां, धर्मग्रंथों में जरूर दस दिशाओं का जिक्र है। पर हम सफल तभी होंगे जब इसमें एक हमारी अपनी बनाई दिशा भी जुड़े। दस बीत चुका है, ग्यारह में संकल्प करें कि आप कुछ नहीं भूलेंगे। सारे संकल्प निबाहेंगे। सारी बुरी आदतों को नौ दो ग्यारह कहेंगे। वरना फिर वही कहानी। इस बार ठान लीजिए जो संकल्प लिया है, उसे नहीं छोड़ेंगे। सबसे पहले संकल्प लीजिए कि अब मैं इसे कभी नहीं भूलूंगा। फिर भी याद नहीं रहता हो तो सलमान का वह डॉयलाग याद कर लीजिए - मैं एक बार कमिटमेंट कर देता हूं तो फिर अपने आप की भी नहीं सुनता। आपका मन जब भी संकल्प से पीछे हटे तब इस संवाद को दिल से बोलिए।

Saturday, December 25, 2010

प्याज,इनकार,इकरार


प्याज,इनकार,इकरार

देश में तीन क बेहद चर्चा में हैं। कीमत, कलमाडी, क्रिकेट। खास यह है कि तीनों की चर्चा का कारण एक ही है। हैसियत से ज्यादा दाम हासिल करना। प्याज किसान के घर से तीन रुपए में चला और हमारे किचन तक आते-आते अस्सी रुपए तक पहुंच गया। क्रिसमस का मौका है, आम गृहिणी प्याज की कीमत से वैसे ही गुस्से में लाल थी कि अचानक सेंटा के लाल रंग को देखकर टमाटर भी इतरा गया। उसने भी छलांग लगाई और कीमत के पेड़ पर जा बैठा। इस समय आम आदमी कीमत बढऩे से परेशान है। पेट्रोल, सब्जी, दाल और न जाने क्या-क्या कितना माथा खपाए। किचन से बचाए तो पेट्रोल में लूट जाए। कितनी चीजे छोड़ दें। दूसरे क पर सवार है सुरेश कलमाड़ी। उनके घर पर भी सीबीआई ने छापा मारा। आरोप है कि खूब पैसा बनाया। पर कॉमनवेल्थ के खिलाड़ी कलमाड़ी ने सीबीआई के गेट के बाहर होते ही कहा-सब झूठ। मैंने पाई-पाई का हिसाब दे दिया है, मेरा इस घोटाले से कोई लेना देना नहीं है। सब जानते हैं मेरा काम सिर्फ पांच फीसदी था। इसे कहते हैं सच्चा इनकार। तीसरे क के खिलाड़ी है ललित मोदी। जो आईपीएल के घपले के बाद देश छोड़कर लंदन में जा बैठे हैं। भारत में किसी भी घपले से इनकार करने वाले मोदी लंदन में एकदम संत बन गए। एक अखबार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया कि आईपीएल में मेरे परिवार ने पैसा कमाया। इसे कहते हैं सुपर इकरार। केंद्र सरकार इस बात से परेशान है कि अपनी औकात से कई गुना ज्यादा पैसा बना चुके मंत्री, अफसरों और आम आदमी की जरूरत की चीजों की कीमत कैसे नियंत्रित की जाए। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा, केंद्रीय मंत्री रहे ए राजा, सुरेश कलमाड़ी, नीरा राडिया, ललित मोदी जैसे न जाने कितने नाम। अब जरूरत है प्रधानमंत्री पूरे तंत्र को सुधारें। आम आदमी की जरूरत की चीजों से लेकर पूरे मंत्रिमंडल और नौकरशाही को काबू में रखने का कोई साफ्टवेयर तैयार करें ताकि कोई भी हद पार न कर सके। परमाणुु समझौते, संयुक्त राष्टï्र में स्थायी सदस्यता। अमेरिका और चीन के लिए नौकरी और बाजार खोलना। फ्रांस के राष्टï्रपति का भारत आकर देश के गुणगाना और रूस के सुप्रीमो का भारत को सुपरपावर बताना। ये सब तमगे तभी सुहाते हैं, जब आम आदमी खुश रहे। देश का हर तबका कामयाबी हासिल करे, वरना ऐसे ही प्याज, इनकार, इकरार के ड्रामें आंसू निकलवाते रहेंगे।