जिद कुछ कर दिखाने की

जिद कुछ कर दिखाने की

Sunday, February 13, 2011

ये मेरा प्यार है


प्रेमिका से झगड़ा करना आसान नहीं है
अपनी प्रेमिका से रूठकर जैसे व्यक्ति अपने आप
से रूठ जाता है, अपने जीवन से रूठ जाता है
प्रेमिका से रूठा हुआ प्रेमी तो अभिशप्त होता है
उसके लिए जीवन के हर सुख पर शाप कुंडली
मारकर बैठ जाता है। उसका कोई विकल्प नहीं है
चुपचाप प्रेमिका को मनाओ !
(नरेन्द्र कोहली के उपन्यास प्रीति कथा से)

प्रेमिका, प्रेम, और उनके बीच का रूठना, मनाना
प्यार की गहराई, एक दूजे के बिना जीवन के सुख
पर शाप लग जाना, प्रेमिका नहीं मानी तो जीवन
का कोई मोल नहीं। ये सच्चाई (थी)जीवन की, बीस
साल पहले तक। तकनीक की छलांग और वक्त की रफ्तार
में प्यार का स्पर्श, समर्पण, नजरें, नजाकत, इंतजार, इकरार, खामोशी,
अदाएं मिलने की खुशी बिछुडऩे का गम सब धीरे-धीरे कल की बात
हो गया है। अब जमाना फटाफट का है। क्रिकेट के ट्वंटी-20 की तरह।
जिसमें ग्लैमर है, चकाचौंध है, दिखावा है, चीयर गल्र्स हैं। पर फिर
भी वह क्रिकेट नहीं है। है सिर्फ क्रिकेट जैसा। क्रिकेट तो टेस्ट मैच ही
है। प्यार भी अब उसी राह पर है। दिखने को बहुत कुछ। जित देखूं,
तित प्रेमी। सच है शहर में जिधर नजर घूमाएंगे। आपको प्रेमी जोड़
मिल जाएंगें। पर उनमें से ज्यादातर के बीच प्यार नहीं है। वो सिर्फ
प्यार जैसा है।

चार दिन बाद वेलेंटाईन डे है। प्यार का दिन। व्यापार वाले भी तैयार
हैं। एक प्रेमी/पे्रमिका जितने ज्यादा प्रपोज करे उतना ज्यादा लाभ। गिफ्ट शॉप,
शॉपिंग मॉल से लेकर छोटी-मोटी दुकाने तक सज चुकी है। प्यार किया नहीं
जाता हो जाता है की गीत को भूल जाइए। अब प्यार को बाकायदा आमंत्रित
किया जाता है। वो होता नहीं करवाया जाता है। प्रेम पत्रिका (वेलेंटाइन ग्रीटिंग कार्ड)
छपाई जाती है, बांटी जाती है। एक से एक खुबसूरत और महंगे। किसी में म्यूजिक
है, तो किसी में फ ूल। इन पत्रिकाओं के शब्द, रंग, रूप कुछ भी प्रेम करने वाला
का नही। सब रेडीमेड। बहुत सारे प्रेम पंछियों को तो इनके भीतर लिखें शब्दों के
अर्थ भी पता नहीं होते। वे अंग्रेजी में जो होते हैं। लाल, पीला रंग साईज देखा
और खरीद लिया। दे आए जिस पर दिल आया। हो सकता है उसे भी पढ़कर कुछ
समझ न आए। पर वो ये समझता है ये किसलिए दिया। इसे ही कहते हैं प्यार में
भाषा की कोई जरूरत नहीं। ये है आजकल का रेडीमेड प्रेम निवेदन। इस आधुनिक प्यार में
न खुशबू है न दिल। वो इजहार के पहले की शरम है न इकरार की खुशी। कार्ड पकड़ाया और
तत्काल मांग लिया जवाब। इस हाथ दे उस हाथ ले। पहले घर से निकलना मंदिर जाने के बहाने
फिर चुपचाप, नजरों के इशारे से फूल किसी दीवार पर रखकर वो चली जाती थी। सबसे नजरें
चुराकर उसे उठाना। जवाब के मौके तलाशते महीनों गुजर जाते थे। पर वो इजहार और इकरार
के बीच का वक्त जिस्म में एक खुशी भरी तडप देता है। सामने आते ही धड़कनों का बढ़ जाना।
नजरों के इशारों को पढऩे की बेताबी।

पहले किसी शादी, त्योहार, मेले पर उससे नजरें चार होती थी। ऐसे आयोजनों पर
जाने का बड़ा इंतजार होता था वहां वो मिलेगी। अब डिस्को है, मॉल है। प्यार की बची-खुची
संवेदना को मोबाइल की तरंगों ने धो ड़ाला। दिनभर में न जाने कितने मैसेज इधर-उधर
फारवर्ड होते रहते हैं। पता ही नहीं चलता किसने किसके लिए लिखा था। मोबाईल संदेश से कई गुना
ज्यादा मजा देते हैं नजरों और ईशारों के संदेश। अब मिलन के नाम पर ई-मिलन, ई-चैटिंग, ई-डेटिंग
और न जाने कितने अ, आ, ई, ऊ हो गए है। लैपटॉप खोला धड़धड़ाते उंगलियां चलाई, दिल में कोई
इच्छा नहीं मिलने की, चेहरे पर गुस्सा, बाहों में कोई और फिर भी लिख दिया- डियर मिस यू, तुम्हारे
बिना मन नहीं लगता, मैं बिल्कुल अकेला, तन्हा हूं। दिनभर अपने मेल चेक करता रहता हूं। तुम्हारा
मेल कब आएगा। अब मैं सोने जा रहा हूं गुड नाईट, टेक केअर। मेल सेंट किया फिर मोबाइल से मैसेज
किया आई हेव सेंट यू ए मेल, लव यू, मिस यू। इस झूठे मेल-मिलाप के बाद चल पड़े बगल में बैठी
लड़की के साथ फिल्म देखने-आई हेट लव स्टोरीज। पहले प्यार में नींद उड़ जाया करती थी, अब खुद
तो जागते हैं पर मोबाइल स्विच ऑफ हो जाता है। मैसेज के साथ- मैं थक गया हूं, गुड नाईट। न वादे,
न कसमें, न सात जन्मों का रिश्ता। सुबह चैटिंग, दोपहर को मीटिंग और शाम को गुडबाय।
कई बार तो ऑनलाईनचैटिंग से ही प्यार पनपता है और ऑन लाईन ही ऑफ हो जाता है। सिर्फ एक शब्द
के साथ-ब्रेकअप।

अब आते हैं पहले प्यार पर। एक जमाना था जब आपने पहले प्यार की अनंत कथाएं सुनी होगी।
पूरी जिंदगी पहले प्यार को न पा सक ने का मलाल रहता था। अब पहले, दूसरे, तीसरे का कोई गम नहीं।
याद करिए, प्रेम संदेश के वो दरख्त वो मंदिर। मंदिर की दीवारों पर भोलेपन से प्यार पाने की तडप।
इन दीवारों लिखी इबारत-मेरी उनसे शादी करा दो, मुझे उससे मिला दो। दरख्तों पर बने दिल जिनमें
लिखे नाम। अब न वो प्रेम के छायादार दरख्त हैं, न आस्था और विश्वास के मंदिर। इन दीवारों और दरख्तों
के साथ ही प्रेम भी धुंधला पड़ता जा रहा है। मोबाइल पर आई लव यू का इजहार भी छोटा हो गया
है सिर्फ आईएलयू लिख कर भेज देते हैं। ये है प्रेम का शार्टकर्ट जो सिर्फ मैसेज ही नहीं हमारे जीवन
में भी उतर आया है। अब दिल की दीवार पर कुछ नहीं लिखा होता है। जो भी लिखा पढ़ा जा रहा है
वो सब फेसबुक की वॉल पर है। चेहरे पढऩे से हम दूर हो गये हैं सिर्फ फेसबुक पढ़ रहे हैं। फेसबुक
ही हमारे प्रेम के बदलते चेहरे का गवाह है। हम आंखों की नमी दिल की तपिश सेहमारा कोई मतलब नहीं।
कोई हमारे साथी पर टिप्पणी करे हमें फर्क नहीं पड़ता। प्रेम गोपनीय या निजी नहीं रहा। इजहार और अलगाव दोनों की
सूचना फेसबुक पर सबके लिए ओपन है। कोई भी आए, लॉग इन करें और घुस जाए हमारी प्रेम की कहानी में। इस वेलेंटाइन डे पर एक दिन के लिए मोबाइल, ई-मेल, फेसबुक सब बंद कर दीजिए। जिसे आप अपना प्यार कहते हैं, उसके मैसेज, मेल,के बिना कैसा दिन गुजरता है। आपको प्यार की तडप, बेताबी, मिलने की बेकरारी, जुदाई का गम सब महसूस करिए। मशीन को छोड़ कर मनुष्य बनिए। यदि आपके भीतर वाकई तूफान उठता है, आपका दिल उससे मिलने को बेकरार हो जाता है। तो मानिए आप प्यार है। वरना जिसे आप आई लव यू के मैसेज भेज रहे हैं, वो सिर्फ टाईम पास है। जल्दी कीजिए, सच्चा प्यार आपका इंतजार कर रहा है।

Wednesday, January 12, 2011

उठो, कल हमारा है


उठो, कल हमारा है
हिंदुस्तान इस वक्त दुनिया का सबसे युवा देश है। लगभग पचपन करोड़ युवा। यानी तेरह से 35 साल की आबादी वाला समूह। यह समूह दुनिया का सबसे तेज, ताकतवर, ऊर्जावान और कामयाबी की और बढ़ता समूह है। जापान को गणित, अमेरिका को टेक् नॉलाजी तो अंग्रेजों को डॉक्टरी की दुनिया में भी हमारे युवा पछाड़ चुके हैं। एक दशक पहले तक जापान गणित में अव्वल था तो अब हम हैं। हमारे युवा जितनी तेजी से पहाड़े याद रखते हैं वह किसी के बस की बात नहीं। बड़ी से बड़ी संख्या का गुणा वे चुटकी बजाते कर देते हैं। बिना मशीनी सहायता के। अमेरिकी राष्टï्रपति बार-बार अपनी आबादी को चेता रहे हैं। संभलो, भारतीय युवा आ रहे हैं। अपनी नौकरी बचाओ, ज्ञान बढ़ाओ। यानी हमारे युवाओं की बुद्घि को सब जान, मान रहे हैं। वे सम्मान हासिल कर रहे हैं। ये पचपन करोड़ युवा सिर्फ संख्या नहीं है। ये है ऊर्जा के भंडार। देश को रोशन करने वाले लैम्प। एक तरह से ये नये एंग्री यंग मैन हैं जो भारत को नई ऊंचाई देंगे। अमिताभ बच्चन का फिल्मी एंग्री यंग मैन वाला किरदार थोड़ा निगेटिव था। वह सत्ता को उखाड़ फेंकने को तत्पर रहता था। पर हमारे युवा सत्ता को उखाड़ फेंकने के बजाए सिस्टम को बदलने की
तरफ बढ़ रहे हैं। वे पुराने ढर्रों से बाहर निकल रहे हैं।
आज की युवा पीढ़ी का न कोई रोल मॉडल है, न वे किसी के जैसा बनना चाहते हैं। वे सिर्फ और सिर्फ जो खुद हैं वही बनना चाहते हैं। वे राहुल गांधी के भाषणों पर ताली पीट सकते हैं, धोनी से सीख सकते हैं, साइना नेहवाल से कुछ नया हासिल कर लेंगे। पर वे इनमें से किसी की कापी नहीं बनेंगे। वे अपनी पहचान खुद बना रहे हैं। उन्हें रोल मॉडल की कोई जरूरत नहीं है। वे इस समाज में अपना रोल खुद लिख रहे हैं। वे एंग्री हैं पर अपनी जगह बनाने के लिए। उनका गुस्सा एक जुनून एक ऊर्जा है। उनमें एक तड़प है कुछ कर दिखाने की। इसके उदाहरण सैकड़ों हैं। एक बस ड्राइवर के बेटे सुशील कुमार ने अपने पसीने से कुश्ती के एरिना में नई कहानी लिखी। वहीं रिक् शा चालक की बेटी दीपिका कुमारी ने तीरंदाजी में जीत का निशाना लगाया। इन युवाओं का एक ही फलसफा है- समझौता नहीं करना, जो दिल कहे वो करो, जो दिमाग को ठीक लगे उस राह पर चलो और कामयाबी जब तक न मिल जाए चलते रहो। थककर बैठना इन्होंने नहीं सीखा। वे जो भी सीख रहे हैं अपनी गलतियों से।
दिमाग पर ऐसा कोई बोझ नहीं रखना चाहते कि मेरा मन ये था पर मैंने वो कर लिया। ऐसे युवाओं मे हैं देश के रूपए को चिन्ह देने वाले उदय कुमार। फार्मूला वन रेस के विजेता करुण चंडोक। 26 साल की उम्र में संसद में पहुंचने वाले हमीदुल्ला सईद। 33 की उम्र में मैक्स मोबाइल जैसी कंपनी खड़ी करने वाले अजय अग्रवाल। कश्मीर के दर्द पर कफ्र्यू नाइट जैसी किताब लिखने वाले 34 साल के बशरत पीर। 15 साल की उम्र में 32 घंटे लगातार वायलिन बजाकर गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में स्थान बनाने वाली अथिरा कृष्णा। देश में ऐसे होनहार युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है।

आर्थिक उदारीकरण के बाद जन्मी इस पीढ़ी में जिम्मेदारी का भाव है। वह तकनीकी ज्ञान के साथ सामाजिक सरोकार भी समझती है। वोट की कीमत और नौकरी के पीछे दौडऩे के बजाय अपना खुद का कारोबार करने में यकीन रखती है। अभी तो देखिए 2015 तक ये गुस्सा और जुनून कैसे देश की किस्मत संवार देगा। उस वक्त हमारी कुल युवा आबादी का लगभग 75 फीसदी शिक्षित होगा। युवाओं के इस जज्बे को समझते हुए गांधीजी ने
उन्हें समाज और इतिहास बदलने की क्षमता रखने वाला बताया। शिवाजी सावंत की मृत्युजंय में युवाओं की पहचान के कुछ आधार दिए गए है।आज का भारतीय युवा उन मानदंडों पर पूरा खरा उतरता है। आइए सिलसिलेवार उन आधारों को जानें-
- पुरूषार्थ-पुरुषार्थ थोड़ा सा ही क्यों न हो। यह हजार बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। बातों से भावनाएं जाग सकती है किंतु उस सिद्घांत की अनुभूति के लिए पुरुषार्थ नहीं किया गया तो समझो समय और भावना बेकार नष्टï हुई। अर्जुन ने मछली की आंख के प्रतिबिंब पर ही ध्यान केंद्रित किया, तीर छोड़ा और स्वयंवर की शर्त पूरी कर ली। द्रोपदी को प्राप्त किया। यहां बाण पुरुषार्थ का, मछली लक्ष्य का प्रतीक है।
- निर्भयता- निर्भयता युवा के जीवन संगीत का सबसे उंचा स्वर है। इस स्वर की बेसुरी और बिखरी हुई ध्वनि है भय। जग ऊंचे स्वर की तान सुनने को उत्सुक होता है, फटी हुई आवाज नहीं। साहस और खेल में कामयाबी केलिए एटीकेटी नहीं चलती, असफल होने के डर से भागने के बजाय , साहस के साथ डटे रहें, सफलता आपके सामने होगी।
-अभिमान- ये है युवावस्था की आत्मा। जिस मनुष्य में श्रद्घा नहीं है, वह मनुष्य नही है। और जिस युवा में अभिमान नहीं है, वह युवा नहीं है।
- महत्वकांक्षा-ये हर युवा का स्थायी भाव है। मैं महान बनूंगा। परिस्थिति के मस्तक पर पैर रखकर मैं उसे झुका दूंगा। यह विचारधारा ही युवा को ऊँचा उठाती है। जीवन में असफल होने का बड़ा कारण लक्ष्य का न होना है। स्वयं को जानो सुकारात का यह कथन ही जिंदगी बदलने को काफी है।
-उदारता- उदारता युवावस्था का अलंकार है। अपनी शक्ति का अन्य दुर्बलों के संरक्षण में उपयोग। स्वयं जीवित रहकर दुसरों को जीने का अमूल्य साधन।
आज का भारतीय युवा इन सभी कसौटयों पर खरा उतरता है। ऐसे युवाओं के जोश से भरे हिंदुस्तान को कोई नहीं रोक सकता। साथियों उठो, आगे बढ़ो कल हमारा है।

Thursday, January 6, 2011

सातवीं पास किसान ने खोजा 'गुणा' का आसान फार्मूला




हरियाणा/कैथल. गांव सौंगल के महज सातवीं पास किसान लछमन सिंह ने गुणा करने का आसान तरीका ढूंढ निकाला है। उसके फार्मूला से विद्यार्थी जल्द गुणा करना सीख जाते हैं। लछमन इसकी सीडी तैयार स्कूलों में वितरित करेगा। उसकी खोज जल्द ही पेटेंट होने वाली है। बुधवार को लछमन ने राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय कैथल में दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों को मौखिक रूप से बड़ी गुणा करने के गुर सिखाए। उन्होंने बाकायदा ब्लैक बोर्ड पर भी विद्यार्थियों को गुणा करके दिखाई और मौखिक रूप से भी गुणा की। सभी विद्यार्थी लछमन के गुणा करने की स्पीड से हतप्रभ थे। गांव सोंगल का रहने वाला लछमन सिंह सातवीं जमात तक पढ़ा है और उसकी गणित में खासी रुचि है। इसी कारण उसने गणना करने के आसान तरीके ईजाद किए। निरंतर अभ्यास से यह संभव हुआ है।

ऐसे करता है गणना

गणना के फार्मूला में दोनों ही संख्याओं के पहले एवं दूसरे अंकों से गणना की शुरुआत की जाती है, चाहे कितनी भी बड़ी गणना क्यों न हो, यह कुछ ही क्षण में की जा सकती है। उसने अपने फार्मूला से तैयार की गई गणना के बाद दोनों संख्याओं में से एक को गणना के परिणाम से भाग देकर जांच की, तो दूसरी संख्या उसके भागफल में आ गई। इससे उसकी गणना का फार्मूला स्वत: सिद्ध हो गया। उसने बताया कि गणित एक ऐसा शास्त्र है, जिसमें परिणाम सही पाए जाने के बाद और कोई सुबूत देने की अवश्यकता नहीं होती।

साभार- दैनिक भास्कर

Saturday, January 1, 2011

भूलना मना है


मैं एक बार कमिटमेंट कर देता हूं तो फिर अपने आप की भी नहीं सुनता। आपका मन जब भी संकल्प से पीछे हटे, तब इस संवाद को दिल से बोलिए...

भूलना मना है
एक और नया साल। एक और नई सुबह। रातभर जश्न, सुबह हैप्पी न्यू ईयर। दोपहर तक तमाम संकल्प। इस बार मैं सिगरेट छोड दूंगा, तुम शराब छोड़ दो, हम डटकर पढ़ेंगे, मैं अपना वजन कम कर लूंगी, हम आपस में नहीं लड़ेंगे, बचत करेंगे, फ्लर्ट नहीं करूंगा/करूंगी आदि इत्यादि जैसी लंबी लिस्ट। सब संकल्प ले रहे हैं। वादे करते हैं। पर एक जनवरी की शाम आते-आते याद का परदा सरकने लगता है। अपने संकल्प का कायाकल्प करने लगते हैं। मैंने सिर्फ सिगरेट छोडऩे का कहा था, सिगरेट शराब दोनों नहीं।
और एक सप्ताह बीतते-बीतते फिर वही कहानी। न कुछ छूटा न कुछ बदला। लंदन में एक रिसर्च ने भी इसे साबित किया है कि सत्तर फीसदी से ज्यादा लोग अपने न्यू ईयर रिजाल्यूशन यानी संकल्प सात दिन में भूल जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण उनमें बदलाव की तड़प ना होना है। साथ ही वे इस बदलाव के लिए अकेले जुझते रहते हैं। वे अपने रिश्तेदारों, दोस्तों की मदद नहीं लेते। जरूरत है करीबियों की मदद लें, देखिए आपके सारे संकल्प पूरे होंगे। वैसे भी यह साल तो ग्यारह अंक का है। ग्यारह यानी एक और एक यानी सहयोग का साल। ग्यारह वो अंक है जिसे हमेशा से शुभ माना गया है। पंडित को दक्षिणा देनी हो, या दान, भगवान को लड्डू चढ़ाना हो या दुर्वा सब ग्यारह हो तो क्या बात है। मंत्रों का जाप भी एक और एक से ही बढ़ता है। ग्यारह, एक सौ एक एक हजार एक, एक लाख एक और जितना चाहो पर एक और एक जरूर होगा। भारत के लिए खेल में भी अभी ग्यारह का जलवा है। सही समझे क्रिकेट में ग्यारह खिलाड़ी और इसी खेल में भारत है दुनिया का नंबर वन । हिंदू व्रत में सबसे फलदायी व्रत एकादशी। हां, धर्मग्रंथों में जरूर दस दिशाओं का जिक्र है। पर हम सफल तभी होंगे जब इसमें एक हमारी अपनी बनाई दिशा भी जुड़े। दस बीत चुका है, ग्यारह में संकल्प करें कि आप कुछ नहीं भूलेंगे। सारे संकल्प निबाहेंगे। सारी बुरी आदतों को नौ दो ग्यारह कहेंगे। वरना फिर वही कहानी। इस बार ठान लीजिए जो संकल्प लिया है, उसे नहीं छोड़ेंगे। सबसे पहले संकल्प लीजिए कि अब मैं इसे कभी नहीं भूलूंगा। फिर भी याद नहीं रहता हो तो सलमान का वह डॉयलाग याद कर लीजिए - मैं एक बार कमिटमेंट कर देता हूं तो फिर अपने आप की भी नहीं सुनता। आपका मन जब भी संकल्प से पीछे हटे तब इस संवाद को दिल से बोलिए।

Saturday, December 25, 2010

प्याज,इनकार,इकरार


प्याज,इनकार,इकरार

देश में तीन क बेहद चर्चा में हैं। कीमत, कलमाडी, क्रिकेट। खास यह है कि तीनों की चर्चा का कारण एक ही है। हैसियत से ज्यादा दाम हासिल करना। प्याज किसान के घर से तीन रुपए में चला और हमारे किचन तक आते-आते अस्सी रुपए तक पहुंच गया। क्रिसमस का मौका है, आम गृहिणी प्याज की कीमत से वैसे ही गुस्से में लाल थी कि अचानक सेंटा के लाल रंग को देखकर टमाटर भी इतरा गया। उसने भी छलांग लगाई और कीमत के पेड़ पर जा बैठा। इस समय आम आदमी कीमत बढऩे से परेशान है। पेट्रोल, सब्जी, दाल और न जाने क्या-क्या कितना माथा खपाए। किचन से बचाए तो पेट्रोल में लूट जाए। कितनी चीजे छोड़ दें। दूसरे क पर सवार है सुरेश कलमाड़ी। उनके घर पर भी सीबीआई ने छापा मारा। आरोप है कि खूब पैसा बनाया। पर कॉमनवेल्थ के खिलाड़ी कलमाड़ी ने सीबीआई के गेट के बाहर होते ही कहा-सब झूठ। मैंने पाई-पाई का हिसाब दे दिया है, मेरा इस घोटाले से कोई लेना देना नहीं है। सब जानते हैं मेरा काम सिर्फ पांच फीसदी था। इसे कहते हैं सच्चा इनकार। तीसरे क के खिलाड़ी है ललित मोदी। जो आईपीएल के घपले के बाद देश छोड़कर लंदन में जा बैठे हैं। भारत में किसी भी घपले से इनकार करने वाले मोदी लंदन में एकदम संत बन गए। एक अखबार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया कि आईपीएल में मेरे परिवार ने पैसा कमाया। इसे कहते हैं सुपर इकरार। केंद्र सरकार इस बात से परेशान है कि अपनी औकात से कई गुना ज्यादा पैसा बना चुके मंत्री, अफसरों और आम आदमी की जरूरत की चीजों की कीमत कैसे नियंत्रित की जाए। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा, केंद्रीय मंत्री रहे ए राजा, सुरेश कलमाड़ी, नीरा राडिया, ललित मोदी जैसे न जाने कितने नाम। अब जरूरत है प्रधानमंत्री पूरे तंत्र को सुधारें। आम आदमी की जरूरत की चीजों से लेकर पूरे मंत्रिमंडल और नौकरशाही को काबू में रखने का कोई साफ्टवेयर तैयार करें ताकि कोई भी हद पार न कर सके। परमाणुु समझौते, संयुक्त राष्टï्र में स्थायी सदस्यता। अमेरिका और चीन के लिए नौकरी और बाजार खोलना। फ्रांस के राष्टï्रपति का भारत आकर देश के गुणगाना और रूस के सुप्रीमो का भारत को सुपरपावर बताना। ये सब तमगे तभी सुहाते हैं, जब आम आदमी खुश रहे। देश का हर तबका कामयाबी हासिल करे, वरना ऐसे ही प्याज, इनकार, इकरार के ड्रामें आंसू निकलवाते रहेंगे।

Tuesday, November 30, 2010

ग्रामीण भारत के ताकतवर सात सितारे


ग्रामीण भारत के ताकतवर सात सितारे

इस महीने जब पूरा देश दीपावली की खरीदारी, पटाखों के बारूद, केंद्रीय मंत्री ए राजा के घोटाले और सोने-चांदी की बढ़ती कीमत, शेयर मार्केट के उतार चढ़ाव, भारतीय क्रिकेट टीम की जीत हार का गणित लगाने में माथा खपा रहा था, दुनिया के किसी हिस्से में नए भारत की कहानी लिखी जा रही थी। दुनिया भर के अमीरों की सूची के लिए प्रख्यात फोब्र्स पत्रिका में एक ग्रामीण भारत अपनी जगह बना रहा था। शाइनिंग इंडिया की चमक और अमेरिकी राष्टï्रपति ओबामा की भारत यात्रा और देश की प्रंशसा से गदगद मीडिया अमेरिका के गुण गा रहा था। ठीक उसी वक्त अमेरिका की चमकीली ईमारत में तमाम विदेशी एक्सपर्ट भारत के आम आदमी के अविष्कारों की इबारत को रंगीन पन्नों पर लिख रहे थे। देव दीपावली के दो दिन पहले फोब्र्स ने ग्रामीण भारत के सात शक्तिशाली लोगों की सूची जारी की। ये वे लोग हैं जिन्होंने किताबी ज्ञान और डिग्री के बजाए अपने अनुभव, आम आदमी की तकलीफों को समझा और उन तकलीफों को दूर करने में जुट गए। इन्होंने अपनी स्मृतियों को आधार बनाया और भारतीय पुराणों के इस वाक्य को सार्थक कर दिया कि - स्मृति को अविष्कार में बदलने वाले ही देवता कहलाते हैं।
ये सातों भारतीय आधुनिक भारत के सप्तऋषि हैं । ऋषि शहरी जीवन से दूर बिना लाभ हानि की चिंता किए समाज में ज्ञान के विस्तार के लिए समाधि लगाए रहते थे। ठीक वैसे ही इनका काम हैं। सुदूर गांवों में अपने ें कर्म से इन अविष्कारकों ने भारतीय समाज को अपने यंत्रों का वरदान दिया। खास बात यह है कि इस सूची में शामिल तीन के नाम मनसुखभाई हैं। मनसुखभाई जगनी, मनसुखभाई पटेल, मनसुखभाई प्रजापति, अंशू गुप्ता, रामाजी खोबरागढ़े, मदनलाल कुमावत, चिंताकिंडी मल्लेशाम ये वो नाम हैं जिन्होंने काम से अपने नाम को सार्थक किया। इन्होंने ऐसे सवालों के जवाब ढूंढ निकाले हैं जो हमारे लिए अक्सर मजाक होते हैं। जैसे हममें से ज्यादातर लोग मटके को गरीबों का फ्रीज कहते रहे हैं। बस इसी शब्द को सिद्घ करते हुए बिना बिजली का फ्रिज सामने आया तो पत्नी को तवे पर रोटी सेंकते हुए होने वाली परेशानी से फ्राइंग पेन। गांवों में अक्सर अमीर लोग गरीबों को ताना मारा करते हैं। टै्रेक्टर नहीं है तो मोटरसाइकिल से खेत जोत लो। बस इसी से प्रेरणा ली और बना दिया मोटरसाइकिल वाला ट्रेैक्टर।

आइए, सिलसिलेवार इसे देखें। राजकोट गुजरात के मनसुखभाई प्रजापति पारिवारिक पेशे से कुम्हार हैं। पीढिय़ों से मिट्टïी के बर्तन परिवार बनाता रहा है। पर मिट्टïी को सोना करने की कहावत चरितार्थ की मनसुखभाई ने। उन्होंने बिना बिजली का मिट्टïी का फ्रीज बनाया। 2001 में गुजरात में आए भूंकप में हजारों लोगों के मटके तक नष्टï हो गए थे। लोगों को उन्होंने कहते सुना इस भूकंप ने गरीबों का फ्रीज तक छीन लिया। बस यहीं से प्रजापति ने काम शुरू किया और मिट्टïीकुल नाम से बिना बिजली का फ्रीज तैयार कर दिया। 2001 से 2004 तक वे इस पर लगातार प्रयोग करते रहे। 2005 में उन्होंने अपनी पत्नी को नान स्टिक तवे के लिए परेशान होते देखा। यह महंगा था इसलिए वे खरीद नहीं पा रही थी। इसे देखते हुए प्रजापति ने मिट्टïी के पुराने तवे पर कुछ प्रयोग किए और नान स्टिक तवा तैयार कर दिया। वो भी मात्र सौ रूपए में। अमेरिकी राष्टï्रपति ओबामा ने अपनी यात्रा के दौरान संसद के सेट्रंल हाल में अपने भाषण में कहा भी था कि आप कौन हैं और कहां से आते हैं, इससे फर्क नहीं पड़ता। सभी इश्वर द्वारा प्रदत्त क्षमता से अपनी पहचान बना सकते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण डॉ भीमराव अंबेडकर हैं जिन्होंने दलित होते हुए भी भारत का संविधान लिखा। प्रजापति ने भी एक बार फिर इसे सिद्घ किया है कि क्षमतावान को कोई रोक नहीं सकता। जरूरत है उसे पहचानने की।
मनसुखभाई पटेल भी पीछे नहीं रहे। कपास के पूरे बंद और अधखुले फूल में से कपास निकालना बेहद समय लेने वाला और थका देने वाला काम है। दसवीं तक पढ़े पटेल ने इसे दूर करने के लिए कपास की छंटाई मशीन तैयार की। वे देश के ऐसे पहले ग्रामीण अविष्कारक बने जिन्हें अमेरिकी पेटेंट भी हासिल हुआ। इसके अलावा उन्होंने कपास की उन्नत तकनीक भी विक सित की। इससे किसानों का मुनाफा बढ़ा। कपास ने हमेशा ही भारत को सम्मान दिलाया है जब सिंकदर की फौज यहां आई तो सिंधु घाटी की सभ्यता और खेतों में कपास देखकर उन्होंने दातों तले उंगली दबा ली थी। वे आश्चर्य चकित थे कि जो ऊन वो भेड़ो से हासिल करते हैं हिंदुस्तानियों ने उसे खेतों में उगा रखा है।

खेत जोतने की बात आती है तो दो ही दृश्य उभरते हैं। बैल जोड़ी लेकर पसीना बहाता किसान या ट्रैक्टर पर बैठा समृद्घ काश्तकार। इस दृश्य को फे्रम से हटाने का काम किया है गुजरात के ही मनसुखभाई जगनी ने। जगनी ने मोटरसाइकिल खेत जोतने का यंत्र तैयार किया है। ये बिल्कुल ट्रैक्टर की तरह ही काम करता है। ये देा लीटर ईंधन में आधे घंटे में करीब एक एकड़ जमीन जोत सकता है। जब विदेशों में इसे दिखाया गया तो करीब 3़18 डॉलर के इस ट्रैक्टर को सबने सराहा। इसे 325 सीसी की मोटरसाइकिल पर बनाया गया है और पिछले हिस्से में दो पहिए लगाए गए ताकि ट्रैक्टर जैसा काम कर सके। चार साल के लगातार परीक्षण के बाद तैयार इस अविष्कार को नाम दिया गया है बुलेट हल।

अपनी अंगुलियों को दर्द देकर लोगों को सुंदर कपड़ा देने वाले बुनकरों की जिंदगी को खूबसूरत बना रहे हैं आंध्र पद्रश के चिंताकिंडी मल्लेशाम। उनके व्दारा तैयार लक्ष्मी आसू मशीन ने बुनकरों को लूम की खट- -खट से मुक्ति दिलाई है। एक साड़ी तैयार करने में बुनकरों को हजारों बार हाथ घुमाना पड़ता था। नई मशीन में उन्हें सिर्फ धागे एडजस्ट करना होते हैं। पहले बुनकर पूरा दिन काम करके सिर्फ एक साड़ी का मटेरियल तैयार कर पाते थे, अब वे एक दिन में 6 साड़ी तैयार कर सकते हैं। पर दुर्भाग्य है कि देश में बुनकरो की हालत इतनी खराब है कि वे इस मशीन को भी नहीं खरीद पा रहे हैं। सरकारी दावे के अलावा फिल्म स्टार आमिर खान और करीना कपूर भी थ्री इडियट के प्रमोशन के दौरान बुनकरों के घर पहुंचे थे और उनके लिए कुछ करने का वादा किया था। आमिर ने करीना को एक साड़ी भी गिफ्ट की थी। अभी भी बुनकरों की पहुंच से यह मशीन दूर है।
एक तरफ देश में कपड़ा बुनने वाले दुदर्शा के शिकार है दूसरी तरफ लाखों ऐसे लोग हैं जिन्हें पहनने को कपडे तक नसीब नहीं है। गरीब बच्चे सड़कों पर ठंड में रात काटते हैं। ऐसी परेशानियों को महसूस करते हुए समाजसेवी अंशू गुप्ता ने गूंज संस्था के जरिए गरीबों को कपडे उपलब्ध करवाने का काम शुरू किया। फोब्र्स की सूची में वे भी शामिल हैं। अंशू अमीरों के पुराने कपड़ो को इक_ïा कर गरीबों में बंटवाने का जिम्मा संभाल रहे हंै। उनकी संस्था प्रतिमाह करीब 30 टन कपड़े इक_ïा कर बीस राज्यों में बंटवाते हैं। भारतीय समाज की इस पीड़ा को देखते हुए ही गांधीजी ने केवल एक कपड़ा पहनने का संकल्प लिया था।

राजस्थान के सीकर के मदनलाल कुमावत ने भी ज्ञान के लिए डिग्री जरूरी नहीं इसे सिद्घ किया है। चौथी कक्षा तक पडे कुमावत ने एक ऐसा थ्रेशर विकसित किया है जो कई फसलों के लिए काम आ सकता है। इसे पेटेंट केलिए आवेदन दिया हुआ है।

खेती, कपड़े के उपकरण बने हैं तो भला खाने में पीछे कैसे रहा जा सकता है। महाराष्टï्र के रामाजी खोबरागढ़े ने चावल की एक नई प्रजाति विकसित की है। बिना किसी वैज्ञानिक सहायता के रामाजी ने इस पर काम किया। चावल की इस किस्म को एचएमटी नाम दिया गया है। इस बीज से करीब 80 फीसदी ज्यादा फसल मिल रही है। साथ ही इसका दाना बारीक और खुशबुदार है। देशभर के किसान इस चावल क्रांति का लाभ ले रहे हैं।


भारत गांवों का देश है और ग्रामीण ही इस देश की जान इसे एक बार फिर साबित कर रहे हैं हिंदुस्तानी। इसके और भी उदाहरण है जैसे कौन बनेगा करोडपति की इस सीजन की करोड़पति गृहिणी तसलीम राहत। तसलीम ने सिद्घ किया कि हाउस वाइफ ज्ञान में कम नहीं होती। एशियाड में इलाहबाद केआशीष कुमार, नासिक की बेटी और वाराणसी की बहू कविता राउत और रायबरेली की सुधा ने दौड़ में देश का नाम रोशन किया। भारत की इसी ताकत ने दुनिया केदादा को भी बोलने पर मजबूर किया जयहिंद।

Thursday, November 25, 2010

रात गई बात गई


ज की ताजा खबर- एक और बड़ा घोटाला। लगाओ पुराने पर ताला। हर पुराने घोटाले पर एक नया घोटाला ऐसा ही ताला ठोंक रहा है। एक तरह से हर नया घोटाला पुराने को निपटाने की चाबी बनता जा रहा है। हर नए के साथ कुछ ऐसे शब्द जुड़ जाते हैं- अब तक का सबसे बड़ा घोटाला, देश को बेच डालने का इससे बड़ा उदाहरण दूसरा नही, इतना शर्मसार तो देश पहले कभी नहीं हुआ, इस खुलासे ने देश को कलंकित कर दिया। ऐसा लगता है मानो इसके पहले देश में अब तक जो घटा वो तो कुछ था ही नहीं। असल में ताले उन घोटालों पर नहीं हमारी याददाश्त, हमारी सोच हमारे सरोकारों पर लगते हैं। कुछ घंटो, दिनों या सप्ताह भर पहले तक हम जिस मुद्दे पर घंटों घर, दफ्तर, पान की दुकानों पर बहस करते नजर आते थे। राजनीतिक दल पुतला फूंक तमाशा, धरने, रैली, भाषण सब झोंक देते थे। जनता की अदालत में ऐसा माहौल बन जाता था कि आवाज निकलने लगती थी कि ऐसे शर्मनाक व्यक्ति या घोटाले बाज को सरेआम फांसी देनी चाहिए, चौराहे पर 'सार्वजनिक अभिनंदन करनाÓ चाहिए, देशप्रेम से भरे हम मु_ïी ताने, आंखों में खून उतर आने की हद तक बहस करते हैं। फिर अचानक एक नया मामला और पुराना गुस्सा, विरोध सब हम ऐसे याददाश्त से हटा देते हैं जैसे दिमागी कंप्यूटर के डिलीट का बटन दबा दिया गया हो। शायद हम भारतीय विरासत में मिली इन पंक्तियों को भी जीवन में आत्मसात कर चुके हैं- बीती ताहि बिसार दे।
अब घोटाले के बदलते रूप और उसके बढ़ते कद, घटती शर्म को देखते हैं। अभी कुछ सप्ताह पहले तक कॉमनवेल्थ खेलों के घपले पर पूरा देश शर्मिंदगी महसूस कर रहा था। इस पर जितना बवाल हुआ उसके बाद मुख्य कर्ताधर्ता सुरेश कलमाडी खलनायक दिखाई दे रहे थे। खेल के ओपनिंग में भी उनकी जमकर हूटिंग हुई। पर वे पूरी शान से सूट-बूट डालकर जमे रहे। बार-बार कहा मैं बेदाग हूं, रहूंगा। ये आत्मविश्वास उनमें था क्योंकि वे बड़े खिलाड़ी जमे, तपे राजनेता हैं। वे आम भारतीय नहीं हैं जो दरवाजे पर हवलदार की दस्तक से ही खाना-पीना छोड़ देता है। कलमाडी ने आने वाला कल देख लिया था। वे निश्चिंत रहे होंगे कि एक घोटाला आएगा और मेरे कु-कर्म सब भूल जाएंगे। सरकार ने भी कुछ संकेत दिए उनसे दूरी बनाने के। जैसे डिनर पर नहीं बुलाया, खिलाडिय़ों के सम्मान समारोह से दूर रखा। अरे ऐसा आदमी जिसने देश का सम्मान दांव पर लगा दिया उसे क्या फर्क पड़ेगा ऐसे कार्यक्र मों के आमंत्रण न मिलने से। हर विवादित आदमी किसी अन्य विवादित का भला ही करता है। जैसे आईपीएल के गवर्नर ललित मोदी को राहत दी कलमाडी ने और कलमाडी को पछाड़ कर सामने आए नए खलनायक महाराष्टï्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण। आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला लेकर। एक वाक्य है- दुनिया में सारे रिकॉर्ड टूटने के लिए ही बनते हैं और कोई भी शिखर पर लंबे समय तक नहीं रह सकता। ऐसे में घोटाले के शिखर पुरुष भी बदलने ही है। आजकल तो होड़ लगी है। झारखंड से निपटो तो कर्नाटक का नाटक वहां से निकले तो खेलगांव और अब महाराष्टï्र। अगले कुछ महीने, सप्ताह तक अशोक चव्हाण 'आदर्श मेडलÓ लेकर घूमते रहेंगे। देश के किसी कोने में, किसी दफ्तर में या किसी सदन में कोई नया घोटालेबाज अशोक चव्हाण को रिप्लेस करने के लिए दंड पेल ही रहा होगा। इंतजार करिए जल्द सामने होगा एक नया आदर्श। ऐसा कि आप भूल जाएंगे सारी पुरानी बातें। नया दौर नई कहानी।
अब जरा और पीछे पलटकर देख लेें। उनको याद कर लें जो अपने-अपने वक्त में इस खेल के महानायक रह चुके हैं। आईपीएल के कर्ताधर्ता ललित मोदी पर एक साथ कई जांच कमेटियों ने नकेल कसने का दिखावा किया। बावजूद उसके उन्हें सेफ पैसेज दिया गया देश छोडऩे का। जब वे सात समंदर पार जाकर बैठ गए उनके खिलाफ इंटरनेशनल वारंट जारी कर दिया गया। अब ढूंढ़ते रहो। कोई आश्चर्य नहीं थोड़े दिन बाद मोदी किसी दूसरे देश में अपनी एक अलग क्रिकेट लीग चलाते नजर आएं। गुलशन कुमार हत्या के आरोपी नदीम भी लंदन में बैठे हैं। वे वहां से बाकायदा भारतीय फिल्मों में संगीत भी दे रहे हैं। पर हम उन्हें देश नहीं ला सके। आज जनता इस मामले को भूल चूकी है। असल में हर घोटाले या लापरवाही पर सजा के नाम पर सिर्फ स्थान परिवर्तन होता है। यानी लाइन अटैच। देश पर हुए सबसे बड़े आतंकी हमले को भी हमने वैसे ही भुला दिया। उस वक्त महाराष्टï्र के गृहमंत्री रहे आर आर पाटिल हटा दिए गए थे। आज वे फिर उसी महाराष्टï्र में गृहमंत्री हैं। मुख्यमंत्री पद से हटाए गए विलासराव देशमुख अब एक कदम आगे केंद्र में भारी मंत्री हैं। अशोक चव्हाण यदि राज्य से हटाए गए तो वे केंद्र में दिखेंगे। कलमाड़ी, संभव है ओलिपिंक की तैयारी में लग जाएं और ललित मोदी विश्वकप क्रिकेट टूर्नामेंट में दिख जाएं। कभी भारतीय टीम से मैच फिक्ंिसग के बाहर धकेले गए मोहम्मद अजहरुद्दीन और उनके सहयोगी आज पहले से बड़े मुकाम पर हंै। सबसे बड़ी बात इन्हें जनता ने ही फिर चुना है। अजहर सांसद बन गए तो उनके साथी क्रिकेट एक्सपर्ट और काम भी ऐसा कि रोज टीवी पर दिखते हैं पूरी शान से। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को हम फांसी नहीं दे पा रहे। हर्षद मेहता, सत्यम के संस्थापक राजू, सांसद खरीदी और हत्या में उलझे शिबू सोरेन, सदन में सवाल पूछने के बदले पैसा लेने वाले सांसद सब धीरे-धीरे फिर उसी चाल और चतुराई से सामने दिखाई दे रहे हैं। फिल्म स्टार्स को देखिए संजय दत्त, सलमान खान पर बड़े मामले चल रहे हैं। फिर भी दोनों जनता के लाडले बने हुए हैं। उन्हें फिर मौका मिल गया अकड़ कर दबंगई करने का। जिन्हें कहीं मौका नहीं मिलता उनके लिए बिगबॉस है ही।
दरअसल इस सबमें पब्लिक का भी ज्यादा दोष नहीं। कोई भी चीज लंबे समय तक टिकती ही नहीं। सत्तर के दशक में घोटाला बे्रकफास्ट की तरह था तो 80 में लंच की तरह स्वीकार्य हो गया। 90 में लंच डिनर दोनों हुआ तो 2000 के बाद यह आल इंडिया भंडारे की तरह हर कोने में आयोजित होने लगा। चीजें टिकाउ थीं, याद रहती थीं अब इतनी तेजी से बदलाव होता है कि क्या-क्या याद रखें। पहले वनस्पति घी यानी डालडा, घोटाला यानी बोफोर्स, रथयात्रा यानी आडवाणी, भाषण तो अटल बिहारी, फिल्म...शोले तो हीरो...अमिताभ बच्चन, क्रिकेटर... कपिलदेव! देश ने इनके साथ ही करीब बीस साल गुजार दिए। फिर ऐसा दौर आया , तरह तरह के वनस्पति घी, रिफाइंड तेल। हीरो हर दिन नया। घोटालों की लाइन लग गई। हर राजनेता यात्री बन बैठा। क्रिकेट में इतने मैच कि हर घंटे नया हीरो। हाल ही में आगरा के दीपक ने दस रन देकर आठ विकेट लेकर नया रिकॉर्ड बना दिया। फिल्में टिकती ही नहीं। 25 साल तक शोले नंबर वन रही फिर उसका रिकॉर्ड दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे ने तोड़ा। इसके बाद कोई रिकार्ड नहीं बचा, गजनी, थ्री इडियट और ताजा हिट रोबोट। अब बेचारा आदमी कितना याद रखे। कुल मिलाकर यह देश, जांच समितियां और जनता फिल्म गजनी की तरह शार्ट टर्म मेमोरी लॉस के शिकार हो गए हैं। वे उन्हीं चीजों को याद रखते हैं जो उन्हें सामने दिखाई देती है। जैसे गजनी में आमिर खान को अपनी याददाश्त बनाए रखने के लिए शरीर पर नाम, नंबर गुदवाकर रखने पड़ते थे। वह दर्पण के सामने खड़ा होकर उन्हें देखता था और फिर याददाश्त ताजा और दुश्मन का खेल खत्म। जरूरत है गजनी की तरह पूरा देश अपने पास घोटालेबाजों के नाम, नंबर और तस्वीर रखे। उन्हें रोज देखता रहे ताकि वे बच न सके और देश की सही तस्वीर बन सके, नहीं तो यही कहते रहेंगे रात गई बात गई।