जिद कुछ कर दिखाने की

जिद कुछ कर दिखाने की

Thursday, March 22, 2012

गोवा विधानसभा चुनाव रिपोर्टिंग

मैंने २३ फरवरी से ३ मार्च के दौरान गोवा विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग की। इस दौरान
गोवा की सभी ४० विधानसभा सीटों में घूमा। गोवा को समझा, जाना। हम गोवा को जिस
रूप से केवल समुद्र तट और उसकी मौज मस्ती के लिए जानते हैं। हकीकत में वह केवल
पर्यटकों की दृष्टिï का गोवा है। हकीकत में गोवा एक संस्कृति से भरा, जिंदादिल और संस्कारवान
लोगों का प्रदेश है। आम गोवा का आदमी पूरी तरह से भारतीय है। पर यहां कि राजनीति
भारत के दूसरे छोटे राज्यों की तरह ही बेहद भ्रष्टïाचार और घोटाले की राजनीति है। सरकारों
का काम सत्ता में आने पर लूट ही रह गया है। गोवा का आम आदमी चुप रहता है पर वह भ्रष्टï
सरकारों को पसंद भी नहीं करता। देखिए कैसे गोवा ने कांग्रेस की माइनिंग और परिवारवाद
में फंसी सरकार को उखाड़ फेंका। मेरी कुछ चुनिंदा रिपोर्ट यहां प्रस्तुत है










Friday, December 9, 2011

मिड डे के संपादक क े इस इस्तीफे को पढ़कर आप भी रो देंगे

दर्जनों मीडियाकर्मियों की नौकरी चली गयी लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया के किसी भी मंच पर एक लाइन की खबर नहीं : मिडे डे के संपादक दीप हलधर ने अपनी नौकरी जाने की बात जिस तरह से अपनी एफबी वॉल पर लिखी है, पढ़कर आंखों में आंसू आ गए। मेरा मन दहाड़े मारकर रोने का हो रहा है। बहुत कम ऐसे मौके होते हैं, जब अंग्रेजी की पंक्तियों को पढ़कर आंखों में अपने आप आंसू आते हों। आज तो रहा नहीं जाएगा, मैं तो जार-जार रोउंगा। एक-एक पंक्ति पढ़ते हुए हिचकी निकल रही है। हलधर ने लिखा कि उनसे कागजातों पर गलत तरीके से साइन कराया गया और उन्होंने किया। आप भी पढ़िए न, मेरी बात पर आपको यकीन न हो तो...


A big thanks to my ex-bosses Abhijit Majumder, Pradyuman Maheshwari and Avirook Sen for taking time out and showing concern for what happened in Midday Delhi. Big hug to my brother Yasser Ali for posting that comment. Very reckless, Yaseerbhai, but feels good. I have been in the game long enough to know how hard it is to be working in the media and still stick your neck out for others. And Jayita Sinha, I am trying to achieve nothing through all this. I am just pissed at the way two editions were shut through an insensitive email. And no one bothered to even address the teams. And then asked to sign an illegal document. There is a way to deal with such sensitive issues. Maybe MiD DAY management needs to watch that George Clooney film Up in the Air!




मिड डे का ये पहला मौका नहीं है कि जब उसने बेरहमी से संस्करण बंद करके दर्जनों पत्रकारों को सड़क पर ला दिया। साल २००८-०९ में हमने सैंकड़ों मीडियाकर्मियों का करिअर और कुछ की तो समझिए जिंदगी ही खत्म होते देखी है। व्ऑइस ऑफ इंडिया चैनल का नाम सुनकर मुझे भोपाल गैस कांड की याद आ जाती है। मिड डे के पत्रकार अभी सोच रहे होंगे कि काश वो किसी अखबार/मीडिया संस्थान में काम करने के बजाय किसी फैक्ट्री या चीनी मिल में काम कर रहे होते। कुछ नहीं तो रातोंरात रोजी-रोटी छिन जाने की खबर अखबार और चैनलों में तो आती। गांव-देहात में आस लगायी मां को पता तो चल पाता कि मेरा बेटा बेरोजगार हो गया है, अब लाल इमली इस साल नहीं, अगले साल लेंगे। सच में कितने निरीह हैं हमारे देश के पत्रकार जिनके बेरोजगार होने से लेकर मरने तक की खबर अपने ही मीडिया का हिस्सा नहीं बनने पाती। मिड डे का दिल्ली और बैंग्लोर संस्करण बंद कर दिया गया। दिल्ली के संपादक दीप हलधर सहित दर्जनों मीडियाकर्मियों की नौकरी चली गयी लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया के किसी भी मंच पर एक लाइन की खबर नहीं है। यही काम किसी दूसरे सेक्टर में होता तो मीडिया का सरोकार उफान मारने लग जाता। इतना ही नहीं, देश के बाहर के किसी अखबार को लेकर ऐसी घटना होती तो इंटरनेशनल एजेंड़ा, देश-दुनिया और सात समंदर पार जैसे कार्यक्रमों की प्रमुख खबर बनती। मीडिया का सरोकार मीडियाकर्मियों के काम नहीं आता। ठीक उसी तरह नाइकी, रिबॉक के जूते बनानेवाला मजदूर उस जूते को कभी पहन नहीं पाता।.


विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से साभार

वीरू के शोले, जय हो



सचिन के शब्दों को सहवाग ने सही साबित कर दिया। सहवाग ने अपने ओपनिंग पार्टनर का रिकॉर्ड भी तोड़ा और उनकी बात का मान भी रखा। खुद सचिन ने कहा था सहवाग ही मेरा 200 का रिकार्ड तोड़ सकते हैं। क्रिकेट में हर रिकॉर्ड टूटने को बनता है। क्रिकेट के भगवान भी इससे नहीं बच सकते। किसने सोचा था कि 300 गेंदों की पारी कोई एक बल्लेबाज 200 रन बना सकेगा। पर उस सोच को पूरी तरह रौंदते हुए सचिन तेंदुलकर ने 24 फरवरी 2010 को ग्वालियर में दोहरा शतक बनाया। तब पूरी दुनिया के क्रिकेट दीवाने बोले-असंभव को संभव कर दिया। अब इस रिकॉर्ड को कोई नहीं तोड़ सकेगा। पर क्रिकेट के देवता का यह कारनामा सिर्फ 21 महीने में पुराना पड़ गया। रिकॉर्ड बुक में अब नया नाम उनसे ऊपर दर्ज हो गया। वीरेंद्र सहवाग। सचिन अब नंबर दो पर आ गए। इसके मायने यह नहीं है कि अब सचिन महान खिलाड़ी या भगवान नहीं रहे। सचिन अब भी महान हैंं। सिर्फ उनके बनाए रनों के रिकॉर्ड को एक खिलाड़ी ने पीछे छोड़ा है सचिन को नहीं। सहवाग ने इंदौर के होलकर स्टेडियम में चौका लगाकर 200 रन पूरे किए। इस रिकॉर्ड में कई बातें समान है, जो अपने आप में रोचक है। जैसे वन-डे इतिहास के दोनों दोहरे शतक भारतीयों ने बनाए। दोनों दोहरे शतक ओपनिंग बल्लेबाजों ने बनाए। दोनों ही भारत की जमीं पर और मध्यप्रदेश के शहरों में लगे। दोनों ही डे-नाइट के मैच थे। सचिन और सहवाग दोनों ने ऐसे वक्त ये शतक लगाए जब तमाम आलोचक और सहयोगी भी कहने लगे थे कि ये चूक गए हैं, उम्र उनपर हावी है, ये अब बड़े स्कोर नहीं बना सकते। सचिन ने जब दोहरा शतक लगाया तब वे भी ऐसी ही आलोचना के शिकार थे और आज सहवाग का भी हाल यही है। दोनों ने दिखा दिया कि शून्य से शिखर पर जाने का जज्बा उनमें अब भी है। हर दिन वे नई इबारत और नए रिकॉर्ड बनाने का माद्दा रखते हैं। क्रिकेट के खेल में 33 वह उम्र है जब आपको बल्ला खूंटी पर टांग देने की सलाह दी जाती है। खिलाड़ी रन आउट होने लगते हैं। गेद से नजरें चूक जाना सामान्य बात हो जाती है। पैंतीस की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते सिर्र्फरिकॉर्ड और पुराने दिनों की यादगार पारियां आपके पीछे होती हैं। लेकिन सहवाग यहां भी सबसे अलग नजर आते हैं वे कुछ भी पीछे नहीं छोडऩा चाहते। उपलब्धियों के साथ दौड़ लगाते हुए वे उम्र से होड़ लेते नजर आते हैं। उनके बारे में सोचते हुए एक ही शब्द उभरता है-अद्भुत। जिस सहजता से वे बल्ले को घुमाते हैं और जिस ढंग से उन्होंने अपने कैरियर को गढ़ा है वह चौंकाने वाला है। क्रिकेट के तमाम स्टाइलिश बल्लेबाज उन्हें नकार देते हैं, क्रिकेट बुक के हिसाब से उनकी बल्लेबाजी एकदम उलट है। वे अपने अंदाज में खेलते हैं, न उन्हें कोई स्टाइल की परवाह है, न स्टांस की न कोई खास तरीके की उनका तो एक ही अंदाज है गेंदबाज की धुलाई। गेंद बाउंड्री पार करे, रन बने, टीम जीते। वो रन कैसे बने, कौन सा शॉट खेला इस सबका हिसाब किताब वीरू नहीं रखते। उनके शॉट अपने हैं और एकदम नए हैं। आप क्रिकेट की किताब में ढूंढते रहिए उस शॉट का नाम। सिर्फ सिर खुजाते रहेंगे वो कहीं नहीं मिलेगा क्योंकि वो वीरू का अपना शॉट, अपना स्टाइल है। सहवाग का रिकॉर्ड और इतने लंबे समय तक टीम में टिके रहना इसलिए भी महत्व रखता है कि उन्होंने देश के टॉप बल्लेबाजों के दौर में अपनी जगह बनाई है। सौरव-सचिन की ओपनिंग जोड़ी के दौर में किसी तीसरे खिलाड़ी का ओपनिंग में जगह बना पाना असंभव था। उस दौर में भी सहवाग जमे रहे और लगातार आगे बढ़े। कई दौर ऐसे भी आए जब उनके फुटवर्क, हेड मूवमेंट पर सवाल उठे। कहा गया कि दुनिया के सारे गेंदबाज जान गए हैं कि सहवाग को एक ही स्टाइल में खेलना आता है और अब वे कभी उबर नहीं पाएंगे। उनका दौर खत्म हो गया। ये दोहरा शतक तमाम आलोचकों को बाउंड्री के बाहर का रास्ता दिखाता है। सहवाग एक बार मैदान पकड़ लेते हैं तो फिर आसानी से मैदान नहीं छोड़ते। गेंदबाज उनके आगे दम तोड़ देते हैं, वे शतक के करीब जाकर भी अपना स्वाभाविक खेल खेलते हैं। कभी कोई प्रेशर उनके ऊपर नहीं दिखता। मैच बड़ा हो या छोटा रन 4 हो या 99 उनके खेलने के अंदाज में कोई फर्क नहीं पड़ता। भारतीय क्रिकेट के दो ही जय और वीरू हैं सचिन और सहवाग। दोनों ने हमेशा बल्लेबाजी से मैदान में शोले बरसाए हंै। जय जयकार हासिल की है। जब भी दोहरे शतक की बात आएगी जय-वीरू दोनों का नाम साथ ही आएगा।



Friday, December 2, 2011

तो थप्पड़ो का सिलसिला शुरू हो जाएगा

पिछले सप्ताह केंद्रीय मंत्री शरद पवार को एक युवक ने थप्पड़ जड़ दिया। कारण। उसने कहा कि मंहगाई बढ़ रही है और ये (मंत्री महोदय) जवाब देने को भी तैयार नहीं। हर सवाल पर जवाब एक ही -मुझे नहीं पता। शरद पवार ने पहली बार महंगाई के मुद्दे पर पल्ला नहीं झाड़ा है। इसके पहले भी कई मौकों पर वे महंगाई का मजाक उड़ा चुके हैं। कभी कहा मैं भगवान नहीं हूं , कभी बोले इसे कंट्रोल करना हमारे बस में नहीं, कभी उछलकर बोल पड़े लोग ज्यादा खा रहे हैं इसलिए महंगाई बढ़ रही है। एक आम हिंदुस्तानी जो सुबह शाम दो सूखी रोटी की जुगाड़ क े लिए परेशान है, उसे अपने नेता ऐसे जवाब देंगे तो क्या होगा? थप्पड़ मारना सहीं नहीं है, पर आम आदमी की बेबसी का मजाक उड़ाना, उसके दर्द को अंतरराष्टï्रीय बाजार के भरोसे छोड़ देना। उसें रोटी मिल सके इसकी व्यवस्था करने के बजाए उसे मुद्रा स्फीती, महंगाई दर, आर्थिक व़द्घि की खबरें दिखाना। मंच पर चढ़कर सरकारी आंकड़े दिखाना, भूख से मरते आदमी के सामने अकड़ से खड़े होकर देश की सम़द्घि, वैभव के गुण गाना ऐसे ही कई और थप्पड़ पैदा करेे तो बड़ी बात नहीं। इस सरकार के अलावा विपक्ष में बैठे राष्टï्रीय नेता भी केवल अपने एसी कमरों में बैठकर चिंता जताते हैं। नमक लगे काजू, बादाम के शर्बत के साथ महंगाई पर चिंतन करते हैं और बाहर आकर कहते हैं- आम आदमी ज्यादा खाने लगा है इसलिए महंगाई बढ़ रही है। ये मजाक नहीं तो क्या है। सरकार खुद को करोड़ो के घोटाले को बढ़ावा दे रही है, केंद्र में सत्ता के खिलाफ अभियान उठाने वाला विपक्ष अपने सत्ता वाले राज्यों में भ्रष्टïाचार की खदाने खोलकर बैठा है। यात्राओं के नाम पर राजनीति और गरीबों का दर्द बांटने का ड्रामा हो रहा है। गरीबों, दलितों के हित की बात करने वाली बसपा हाथी, पार्क, अपनी पार्टी की संभाओं के बड़े तंबू लगवाने में पैसा फूंक रही है। जबकि उनके राज्य में दलित रोटी को तरस रहे हैं। गाजियाबाद और आगरा में विवाह समारोह में रोटी खाने को घुसे किशोरों को भीड़ ने पीट पीटकर मार डाला। ये है बहुजन की जीत। भाजपा शासित राज्यों में खदानों से पैसा उलीचा जा रहा है, लोकायुक्त की नाक के नीचे मंत्री अपराध कर रहे है। कांग्रेस शासित राज्यों में सीड़ी सामने आ रही है तो कहीं मंत्री शहीदों का पैसा खा रहे हैं। अन्ना के आंदोलन की भी चमक ठंडी पड़ गई है। उनके सिपाहसालार भी जनता को ही लूट रहे हैं। ऐसे में पवार को पड़ा थप्पड़ नेताओं की पूरी कौम के लिए एक अलर्ट है। संभलिए, देश सत्तर के दशक की तरह फिर गुस्से में हैं। ऐसे थप्पड़ृों की बौछार हर गली मोहल्ले में दिखाई दे सकती है। जल्दी ही सरकार और नेता नहीं सुधरे तो इस देश का हर आदमी एंग्री यंगमैन बन जाएगा और हर नेता के गाल पर एक थप्पड़ होगा।

Sunday, February 13, 2011

ये मेरा प्यार है


प्रेमिका से झगड़ा करना आसान नहीं है
अपनी प्रेमिका से रूठकर जैसे व्यक्ति अपने आप
से रूठ जाता है, अपने जीवन से रूठ जाता है
प्रेमिका से रूठा हुआ प्रेमी तो अभिशप्त होता है
उसके लिए जीवन के हर सुख पर शाप कुंडली
मारकर बैठ जाता है। उसका कोई विकल्प नहीं है
चुपचाप प्रेमिका को मनाओ !
(नरेन्द्र कोहली के उपन्यास प्रीति कथा से)

प्रेमिका, प्रेम, और उनके बीच का रूठना, मनाना
प्यार की गहराई, एक दूजे के बिना जीवन के सुख
पर शाप लग जाना, प्रेमिका नहीं मानी तो जीवन
का कोई मोल नहीं। ये सच्चाई (थी)जीवन की, बीस
साल पहले तक। तकनीक की छलांग और वक्त की रफ्तार
में प्यार का स्पर्श, समर्पण, नजरें, नजाकत, इंतजार, इकरार, खामोशी,
अदाएं मिलने की खुशी बिछुडऩे का गम सब धीरे-धीरे कल की बात
हो गया है। अब जमाना फटाफट का है। क्रिकेट के ट्वंटी-20 की तरह।
जिसमें ग्लैमर है, चकाचौंध है, दिखावा है, चीयर गल्र्स हैं। पर फिर
भी वह क्रिकेट नहीं है। है सिर्फ क्रिकेट जैसा। क्रिकेट तो टेस्ट मैच ही
है। प्यार भी अब उसी राह पर है। दिखने को बहुत कुछ। जित देखूं,
तित प्रेमी। सच है शहर में जिधर नजर घूमाएंगे। आपको प्रेमी जोड़
मिल जाएंगें। पर उनमें से ज्यादातर के बीच प्यार नहीं है। वो सिर्फ
प्यार जैसा है।

चार दिन बाद वेलेंटाईन डे है। प्यार का दिन। व्यापार वाले भी तैयार
हैं। एक प्रेमी/पे्रमिका जितने ज्यादा प्रपोज करे उतना ज्यादा लाभ। गिफ्ट शॉप,
शॉपिंग मॉल से लेकर छोटी-मोटी दुकाने तक सज चुकी है। प्यार किया नहीं
जाता हो जाता है की गीत को भूल जाइए। अब प्यार को बाकायदा आमंत्रित
किया जाता है। वो होता नहीं करवाया जाता है। प्रेम पत्रिका (वेलेंटाइन ग्रीटिंग कार्ड)
छपाई जाती है, बांटी जाती है। एक से एक खुबसूरत और महंगे। किसी में म्यूजिक
है, तो किसी में फ ूल। इन पत्रिकाओं के शब्द, रंग, रूप कुछ भी प्रेम करने वाला
का नही। सब रेडीमेड। बहुत सारे प्रेम पंछियों को तो इनके भीतर लिखें शब्दों के
अर्थ भी पता नहीं होते। वे अंग्रेजी में जो होते हैं। लाल, पीला रंग साईज देखा
और खरीद लिया। दे आए जिस पर दिल आया। हो सकता है उसे भी पढ़कर कुछ
समझ न आए। पर वो ये समझता है ये किसलिए दिया। इसे ही कहते हैं प्यार में
भाषा की कोई जरूरत नहीं। ये है आजकल का रेडीमेड प्रेम निवेदन। इस आधुनिक प्यार में
न खुशबू है न दिल। वो इजहार के पहले की शरम है न इकरार की खुशी। कार्ड पकड़ाया और
तत्काल मांग लिया जवाब। इस हाथ दे उस हाथ ले। पहले घर से निकलना मंदिर जाने के बहाने
फिर चुपचाप, नजरों के इशारे से फूल किसी दीवार पर रखकर वो चली जाती थी। सबसे नजरें
चुराकर उसे उठाना। जवाब के मौके तलाशते महीनों गुजर जाते थे। पर वो इजहार और इकरार
के बीच का वक्त जिस्म में एक खुशी भरी तडप देता है। सामने आते ही धड़कनों का बढ़ जाना।
नजरों के इशारों को पढऩे की बेताबी।

पहले किसी शादी, त्योहार, मेले पर उससे नजरें चार होती थी। ऐसे आयोजनों पर
जाने का बड़ा इंतजार होता था वहां वो मिलेगी। अब डिस्को है, मॉल है। प्यार की बची-खुची
संवेदना को मोबाइल की तरंगों ने धो ड़ाला। दिनभर में न जाने कितने मैसेज इधर-उधर
फारवर्ड होते रहते हैं। पता ही नहीं चलता किसने किसके लिए लिखा था। मोबाईल संदेश से कई गुना
ज्यादा मजा देते हैं नजरों और ईशारों के संदेश। अब मिलन के नाम पर ई-मिलन, ई-चैटिंग, ई-डेटिंग
और न जाने कितने अ, आ, ई, ऊ हो गए है। लैपटॉप खोला धड़धड़ाते उंगलियां चलाई, दिल में कोई
इच्छा नहीं मिलने की, चेहरे पर गुस्सा, बाहों में कोई और फिर भी लिख दिया- डियर मिस यू, तुम्हारे
बिना मन नहीं लगता, मैं बिल्कुल अकेला, तन्हा हूं। दिनभर अपने मेल चेक करता रहता हूं। तुम्हारा
मेल कब आएगा। अब मैं सोने जा रहा हूं गुड नाईट, टेक केअर। मेल सेंट किया फिर मोबाइल से मैसेज
किया आई हेव सेंट यू ए मेल, लव यू, मिस यू। इस झूठे मेल-मिलाप के बाद चल पड़े बगल में बैठी
लड़की के साथ फिल्म देखने-आई हेट लव स्टोरीज। पहले प्यार में नींद उड़ जाया करती थी, अब खुद
तो जागते हैं पर मोबाइल स्विच ऑफ हो जाता है। मैसेज के साथ- मैं थक गया हूं, गुड नाईट। न वादे,
न कसमें, न सात जन्मों का रिश्ता। सुबह चैटिंग, दोपहर को मीटिंग और शाम को गुडबाय।
कई बार तो ऑनलाईनचैटिंग से ही प्यार पनपता है और ऑन लाईन ही ऑफ हो जाता है। सिर्फ एक शब्द
के साथ-ब्रेकअप।

अब आते हैं पहले प्यार पर। एक जमाना था जब आपने पहले प्यार की अनंत कथाएं सुनी होगी।
पूरी जिंदगी पहले प्यार को न पा सक ने का मलाल रहता था। अब पहले, दूसरे, तीसरे का कोई गम नहीं।
याद करिए, प्रेम संदेश के वो दरख्त वो मंदिर। मंदिर की दीवारों पर भोलेपन से प्यार पाने की तडप।
इन दीवारों लिखी इबारत-मेरी उनसे शादी करा दो, मुझे उससे मिला दो। दरख्तों पर बने दिल जिनमें
लिखे नाम। अब न वो प्रेम के छायादार दरख्त हैं, न आस्था और विश्वास के मंदिर। इन दीवारों और दरख्तों
के साथ ही प्रेम भी धुंधला पड़ता जा रहा है। मोबाइल पर आई लव यू का इजहार भी छोटा हो गया
है सिर्फ आईएलयू लिख कर भेज देते हैं। ये है प्रेम का शार्टकर्ट जो सिर्फ मैसेज ही नहीं हमारे जीवन
में भी उतर आया है। अब दिल की दीवार पर कुछ नहीं लिखा होता है। जो भी लिखा पढ़ा जा रहा है
वो सब फेसबुक की वॉल पर है। चेहरे पढऩे से हम दूर हो गये हैं सिर्फ फेसबुक पढ़ रहे हैं। फेसबुक
ही हमारे प्रेम के बदलते चेहरे का गवाह है। हम आंखों की नमी दिल की तपिश सेहमारा कोई मतलब नहीं।
कोई हमारे साथी पर टिप्पणी करे हमें फर्क नहीं पड़ता। प्रेम गोपनीय या निजी नहीं रहा। इजहार और अलगाव दोनों की
सूचना फेसबुक पर सबके लिए ओपन है। कोई भी आए, लॉग इन करें और घुस जाए हमारी प्रेम की कहानी में। इस वेलेंटाइन डे पर एक दिन के लिए मोबाइल, ई-मेल, फेसबुक सब बंद कर दीजिए। जिसे आप अपना प्यार कहते हैं, उसके मैसेज, मेल,के बिना कैसा दिन गुजरता है। आपको प्यार की तडप, बेताबी, मिलने की बेकरारी, जुदाई का गम सब महसूस करिए। मशीन को छोड़ कर मनुष्य बनिए। यदि आपके भीतर वाकई तूफान उठता है, आपका दिल उससे मिलने को बेकरार हो जाता है। तो मानिए आप प्यार है। वरना जिसे आप आई लव यू के मैसेज भेज रहे हैं, वो सिर्फ टाईम पास है। जल्दी कीजिए, सच्चा प्यार आपका इंतजार कर रहा है।

Wednesday, January 12, 2011

उठो, कल हमारा है


उठो, कल हमारा है
हिंदुस्तान इस वक्त दुनिया का सबसे युवा देश है। लगभग पचपन करोड़ युवा। यानी तेरह से 35 साल की आबादी वाला समूह। यह समूह दुनिया का सबसे तेज, ताकतवर, ऊर्जावान और कामयाबी की और बढ़ता समूह है। जापान को गणित, अमेरिका को टेक् नॉलाजी तो अंग्रेजों को डॉक्टरी की दुनिया में भी हमारे युवा पछाड़ चुके हैं। एक दशक पहले तक जापान गणित में अव्वल था तो अब हम हैं। हमारे युवा जितनी तेजी से पहाड़े याद रखते हैं वह किसी के बस की बात नहीं। बड़ी से बड़ी संख्या का गुणा वे चुटकी बजाते कर देते हैं। बिना मशीनी सहायता के। अमेरिकी राष्टï्रपति बार-बार अपनी आबादी को चेता रहे हैं। संभलो, भारतीय युवा आ रहे हैं। अपनी नौकरी बचाओ, ज्ञान बढ़ाओ। यानी हमारे युवाओं की बुद्घि को सब जान, मान रहे हैं। वे सम्मान हासिल कर रहे हैं। ये पचपन करोड़ युवा सिर्फ संख्या नहीं है। ये है ऊर्जा के भंडार। देश को रोशन करने वाले लैम्प। एक तरह से ये नये एंग्री यंग मैन हैं जो भारत को नई ऊंचाई देंगे। अमिताभ बच्चन का फिल्मी एंग्री यंग मैन वाला किरदार थोड़ा निगेटिव था। वह सत्ता को उखाड़ फेंकने को तत्पर रहता था। पर हमारे युवा सत्ता को उखाड़ फेंकने के बजाए सिस्टम को बदलने की
तरफ बढ़ रहे हैं। वे पुराने ढर्रों से बाहर निकल रहे हैं।
आज की युवा पीढ़ी का न कोई रोल मॉडल है, न वे किसी के जैसा बनना चाहते हैं। वे सिर्फ और सिर्फ जो खुद हैं वही बनना चाहते हैं। वे राहुल गांधी के भाषणों पर ताली पीट सकते हैं, धोनी से सीख सकते हैं, साइना नेहवाल से कुछ नया हासिल कर लेंगे। पर वे इनमें से किसी की कापी नहीं बनेंगे। वे अपनी पहचान खुद बना रहे हैं। उन्हें रोल मॉडल की कोई जरूरत नहीं है। वे इस समाज में अपना रोल खुद लिख रहे हैं। वे एंग्री हैं पर अपनी जगह बनाने के लिए। उनका गुस्सा एक जुनून एक ऊर्जा है। उनमें एक तड़प है कुछ कर दिखाने की। इसके उदाहरण सैकड़ों हैं। एक बस ड्राइवर के बेटे सुशील कुमार ने अपने पसीने से कुश्ती के एरिना में नई कहानी लिखी। वहीं रिक् शा चालक की बेटी दीपिका कुमारी ने तीरंदाजी में जीत का निशाना लगाया। इन युवाओं का एक ही फलसफा है- समझौता नहीं करना, जो दिल कहे वो करो, जो दिमाग को ठीक लगे उस राह पर चलो और कामयाबी जब तक न मिल जाए चलते रहो। थककर बैठना इन्होंने नहीं सीखा। वे जो भी सीख रहे हैं अपनी गलतियों से।
दिमाग पर ऐसा कोई बोझ नहीं रखना चाहते कि मेरा मन ये था पर मैंने वो कर लिया। ऐसे युवाओं मे हैं देश के रूपए को चिन्ह देने वाले उदय कुमार। फार्मूला वन रेस के विजेता करुण चंडोक। 26 साल की उम्र में संसद में पहुंचने वाले हमीदुल्ला सईद। 33 की उम्र में मैक्स मोबाइल जैसी कंपनी खड़ी करने वाले अजय अग्रवाल। कश्मीर के दर्द पर कफ्र्यू नाइट जैसी किताब लिखने वाले 34 साल के बशरत पीर। 15 साल की उम्र में 32 घंटे लगातार वायलिन बजाकर गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में स्थान बनाने वाली अथिरा कृष्णा। देश में ऐसे होनहार युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है।

आर्थिक उदारीकरण के बाद जन्मी इस पीढ़ी में जिम्मेदारी का भाव है। वह तकनीकी ज्ञान के साथ सामाजिक सरोकार भी समझती है। वोट की कीमत और नौकरी के पीछे दौडऩे के बजाय अपना खुद का कारोबार करने में यकीन रखती है। अभी तो देखिए 2015 तक ये गुस्सा और जुनून कैसे देश की किस्मत संवार देगा। उस वक्त हमारी कुल युवा आबादी का लगभग 75 फीसदी शिक्षित होगा। युवाओं के इस जज्बे को समझते हुए गांधीजी ने
उन्हें समाज और इतिहास बदलने की क्षमता रखने वाला बताया। शिवाजी सावंत की मृत्युजंय में युवाओं की पहचान के कुछ आधार दिए गए है।आज का भारतीय युवा उन मानदंडों पर पूरा खरा उतरता है। आइए सिलसिलेवार उन आधारों को जानें-
- पुरूषार्थ-पुरुषार्थ थोड़ा सा ही क्यों न हो। यह हजार बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। बातों से भावनाएं जाग सकती है किंतु उस सिद्घांत की अनुभूति के लिए पुरुषार्थ नहीं किया गया तो समझो समय और भावना बेकार नष्टï हुई। अर्जुन ने मछली की आंख के प्रतिबिंब पर ही ध्यान केंद्रित किया, तीर छोड़ा और स्वयंवर की शर्त पूरी कर ली। द्रोपदी को प्राप्त किया। यहां बाण पुरुषार्थ का, मछली लक्ष्य का प्रतीक है।
- निर्भयता- निर्भयता युवा के जीवन संगीत का सबसे उंचा स्वर है। इस स्वर की बेसुरी और बिखरी हुई ध्वनि है भय। जग ऊंचे स्वर की तान सुनने को उत्सुक होता है, फटी हुई आवाज नहीं। साहस और खेल में कामयाबी केलिए एटीकेटी नहीं चलती, असफल होने के डर से भागने के बजाय , साहस के साथ डटे रहें, सफलता आपके सामने होगी।
-अभिमान- ये है युवावस्था की आत्मा। जिस मनुष्य में श्रद्घा नहीं है, वह मनुष्य नही है। और जिस युवा में अभिमान नहीं है, वह युवा नहीं है।
- महत्वकांक्षा-ये हर युवा का स्थायी भाव है। मैं महान बनूंगा। परिस्थिति के मस्तक पर पैर रखकर मैं उसे झुका दूंगा। यह विचारधारा ही युवा को ऊँचा उठाती है। जीवन में असफल होने का बड़ा कारण लक्ष्य का न होना है। स्वयं को जानो सुकारात का यह कथन ही जिंदगी बदलने को काफी है।
-उदारता- उदारता युवावस्था का अलंकार है। अपनी शक्ति का अन्य दुर्बलों के संरक्षण में उपयोग। स्वयं जीवित रहकर दुसरों को जीने का अमूल्य साधन।
आज का भारतीय युवा इन सभी कसौटयों पर खरा उतरता है। ऐसे युवाओं के जोश से भरे हिंदुस्तान को कोई नहीं रोक सकता। साथियों उठो, आगे बढ़ो कल हमारा है।

Thursday, January 6, 2011

सातवीं पास किसान ने खोजा 'गुणा' का आसान फार्मूला




हरियाणा/कैथल. गांव सौंगल के महज सातवीं पास किसान लछमन सिंह ने गुणा करने का आसान तरीका ढूंढ निकाला है। उसके फार्मूला से विद्यार्थी जल्द गुणा करना सीख जाते हैं। लछमन इसकी सीडी तैयार स्कूलों में वितरित करेगा। उसकी खोज जल्द ही पेटेंट होने वाली है। बुधवार को लछमन ने राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय कैथल में दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों को मौखिक रूप से बड़ी गुणा करने के गुर सिखाए। उन्होंने बाकायदा ब्लैक बोर्ड पर भी विद्यार्थियों को गुणा करके दिखाई और मौखिक रूप से भी गुणा की। सभी विद्यार्थी लछमन के गुणा करने की स्पीड से हतप्रभ थे। गांव सोंगल का रहने वाला लछमन सिंह सातवीं जमात तक पढ़ा है और उसकी गणित में खासी रुचि है। इसी कारण उसने गणना करने के आसान तरीके ईजाद किए। निरंतर अभ्यास से यह संभव हुआ है।

ऐसे करता है गणना

गणना के फार्मूला में दोनों ही संख्याओं के पहले एवं दूसरे अंकों से गणना की शुरुआत की जाती है, चाहे कितनी भी बड़ी गणना क्यों न हो, यह कुछ ही क्षण में की जा सकती है। उसने अपने फार्मूला से तैयार की गई गणना के बाद दोनों संख्याओं में से एक को गणना के परिणाम से भाग देकर जांच की, तो दूसरी संख्या उसके भागफल में आ गई। इससे उसकी गणना का फार्मूला स्वत: सिद्ध हो गया। उसने बताया कि गणित एक ऐसा शास्त्र है, जिसमें परिणाम सही पाए जाने के बाद और कोई सुबूत देने की अवश्यकता नहीं होती।

साभार- दैनिक भास्कर

Saturday, January 1, 2011

भूलना मना है


मैं एक बार कमिटमेंट कर देता हूं तो फिर अपने आप की भी नहीं सुनता। आपका मन जब भी संकल्प से पीछे हटे, तब इस संवाद को दिल से बोलिए...

भूलना मना है
एक और नया साल। एक और नई सुबह। रातभर जश्न, सुबह हैप्पी न्यू ईयर। दोपहर तक तमाम संकल्प। इस बार मैं सिगरेट छोड दूंगा, तुम शराब छोड़ दो, हम डटकर पढ़ेंगे, मैं अपना वजन कम कर लूंगी, हम आपस में नहीं लड़ेंगे, बचत करेंगे, फ्लर्ट नहीं करूंगा/करूंगी आदि इत्यादि जैसी लंबी लिस्ट। सब संकल्प ले रहे हैं। वादे करते हैं। पर एक जनवरी की शाम आते-आते याद का परदा सरकने लगता है। अपने संकल्प का कायाकल्प करने लगते हैं। मैंने सिर्फ सिगरेट छोडऩे का कहा था, सिगरेट शराब दोनों नहीं।
और एक सप्ताह बीतते-बीतते फिर वही कहानी। न कुछ छूटा न कुछ बदला। लंदन में एक रिसर्च ने भी इसे साबित किया है कि सत्तर फीसदी से ज्यादा लोग अपने न्यू ईयर रिजाल्यूशन यानी संकल्प सात दिन में भूल जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण उनमें बदलाव की तड़प ना होना है। साथ ही वे इस बदलाव के लिए अकेले जुझते रहते हैं। वे अपने रिश्तेदारों, दोस्तों की मदद नहीं लेते। जरूरत है करीबियों की मदद लें, देखिए आपके सारे संकल्प पूरे होंगे। वैसे भी यह साल तो ग्यारह अंक का है। ग्यारह यानी एक और एक यानी सहयोग का साल। ग्यारह वो अंक है जिसे हमेशा से शुभ माना गया है। पंडित को दक्षिणा देनी हो, या दान, भगवान को लड्डू चढ़ाना हो या दुर्वा सब ग्यारह हो तो क्या बात है। मंत्रों का जाप भी एक और एक से ही बढ़ता है। ग्यारह, एक सौ एक एक हजार एक, एक लाख एक और जितना चाहो पर एक और एक जरूर होगा। भारत के लिए खेल में भी अभी ग्यारह का जलवा है। सही समझे क्रिकेट में ग्यारह खिलाड़ी और इसी खेल में भारत है दुनिया का नंबर वन । हिंदू व्रत में सबसे फलदायी व्रत एकादशी। हां, धर्मग्रंथों में जरूर दस दिशाओं का जिक्र है। पर हम सफल तभी होंगे जब इसमें एक हमारी अपनी बनाई दिशा भी जुड़े। दस बीत चुका है, ग्यारह में संकल्प करें कि आप कुछ नहीं भूलेंगे। सारे संकल्प निबाहेंगे। सारी बुरी आदतों को नौ दो ग्यारह कहेंगे। वरना फिर वही कहानी। इस बार ठान लीजिए जो संकल्प लिया है, उसे नहीं छोड़ेंगे। सबसे पहले संकल्प लीजिए कि अब मैं इसे कभी नहीं भूलूंगा। फिर भी याद नहीं रहता हो तो सलमान का वह डॉयलाग याद कर लीजिए - मैं एक बार कमिटमेंट कर देता हूं तो फिर अपने आप की भी नहीं सुनता। आपका मन जब भी संकल्प से पीछे हटे तब इस संवाद को दिल से बोलिए।

Saturday, December 25, 2010

प्याज,इनकार,इकरार


प्याज,इनकार,इकरार

देश में तीन क बेहद चर्चा में हैं। कीमत, कलमाडी, क्रिकेट। खास यह है कि तीनों की चर्चा का कारण एक ही है। हैसियत से ज्यादा दाम हासिल करना। प्याज किसान के घर से तीन रुपए में चला और हमारे किचन तक आते-आते अस्सी रुपए तक पहुंच गया। क्रिसमस का मौका है, आम गृहिणी प्याज की कीमत से वैसे ही गुस्से में लाल थी कि अचानक सेंटा के लाल रंग को देखकर टमाटर भी इतरा गया। उसने भी छलांग लगाई और कीमत के पेड़ पर जा बैठा। इस समय आम आदमी कीमत बढऩे से परेशान है। पेट्रोल, सब्जी, दाल और न जाने क्या-क्या कितना माथा खपाए। किचन से बचाए तो पेट्रोल में लूट जाए। कितनी चीजे छोड़ दें। दूसरे क पर सवार है सुरेश कलमाड़ी। उनके घर पर भी सीबीआई ने छापा मारा। आरोप है कि खूब पैसा बनाया। पर कॉमनवेल्थ के खिलाड़ी कलमाड़ी ने सीबीआई के गेट के बाहर होते ही कहा-सब झूठ। मैंने पाई-पाई का हिसाब दे दिया है, मेरा इस घोटाले से कोई लेना देना नहीं है। सब जानते हैं मेरा काम सिर्फ पांच फीसदी था। इसे कहते हैं सच्चा इनकार। तीसरे क के खिलाड़ी है ललित मोदी। जो आईपीएल के घपले के बाद देश छोड़कर लंदन में जा बैठे हैं। भारत में किसी भी घपले से इनकार करने वाले मोदी लंदन में एकदम संत बन गए। एक अखबार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया कि आईपीएल में मेरे परिवार ने पैसा कमाया। इसे कहते हैं सुपर इकरार। केंद्र सरकार इस बात से परेशान है कि अपनी औकात से कई गुना ज्यादा पैसा बना चुके मंत्री, अफसरों और आम आदमी की जरूरत की चीजों की कीमत कैसे नियंत्रित की जाए। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा, केंद्रीय मंत्री रहे ए राजा, सुरेश कलमाड़ी, नीरा राडिया, ललित मोदी जैसे न जाने कितने नाम। अब जरूरत है प्रधानमंत्री पूरे तंत्र को सुधारें। आम आदमी की जरूरत की चीजों से लेकर पूरे मंत्रिमंडल और नौकरशाही को काबू में रखने का कोई साफ्टवेयर तैयार करें ताकि कोई भी हद पार न कर सके। परमाणुु समझौते, संयुक्त राष्टï्र में स्थायी सदस्यता। अमेरिका और चीन के लिए नौकरी और बाजार खोलना। फ्रांस के राष्टï्रपति का भारत आकर देश के गुणगाना और रूस के सुप्रीमो का भारत को सुपरपावर बताना। ये सब तमगे तभी सुहाते हैं, जब आम आदमी खुश रहे। देश का हर तबका कामयाबी हासिल करे, वरना ऐसे ही प्याज, इनकार, इकरार के ड्रामें आंसू निकलवाते रहेंगे।

Tuesday, November 30, 2010

ग्रामीण भारत के ताकतवर सात सितारे


ग्रामीण भारत के ताकतवर सात सितारे

इस महीने जब पूरा देश दीपावली की खरीदारी, पटाखों के बारूद, केंद्रीय मंत्री ए राजा के घोटाले और सोने-चांदी की बढ़ती कीमत, शेयर मार्केट के उतार चढ़ाव, भारतीय क्रिकेट टीम की जीत हार का गणित लगाने में माथा खपा रहा था, दुनिया के किसी हिस्से में नए भारत की कहानी लिखी जा रही थी। दुनिया भर के अमीरों की सूची के लिए प्रख्यात फोब्र्स पत्रिका में एक ग्रामीण भारत अपनी जगह बना रहा था। शाइनिंग इंडिया की चमक और अमेरिकी राष्टï्रपति ओबामा की भारत यात्रा और देश की प्रंशसा से गदगद मीडिया अमेरिका के गुण गा रहा था। ठीक उसी वक्त अमेरिका की चमकीली ईमारत में तमाम विदेशी एक्सपर्ट भारत के आम आदमी के अविष्कारों की इबारत को रंगीन पन्नों पर लिख रहे थे। देव दीपावली के दो दिन पहले फोब्र्स ने ग्रामीण भारत के सात शक्तिशाली लोगों की सूची जारी की। ये वे लोग हैं जिन्होंने किताबी ज्ञान और डिग्री के बजाए अपने अनुभव, आम आदमी की तकलीफों को समझा और उन तकलीफों को दूर करने में जुट गए। इन्होंने अपनी स्मृतियों को आधार बनाया और भारतीय पुराणों के इस वाक्य को सार्थक कर दिया कि - स्मृति को अविष्कार में बदलने वाले ही देवता कहलाते हैं।
ये सातों भारतीय आधुनिक भारत के सप्तऋषि हैं । ऋषि शहरी जीवन से दूर बिना लाभ हानि की चिंता किए समाज में ज्ञान के विस्तार के लिए समाधि लगाए रहते थे। ठीक वैसे ही इनका काम हैं। सुदूर गांवों में अपने ें कर्म से इन अविष्कारकों ने भारतीय समाज को अपने यंत्रों का वरदान दिया। खास बात यह है कि इस सूची में शामिल तीन के नाम मनसुखभाई हैं। मनसुखभाई जगनी, मनसुखभाई पटेल, मनसुखभाई प्रजापति, अंशू गुप्ता, रामाजी खोबरागढ़े, मदनलाल कुमावत, चिंताकिंडी मल्लेशाम ये वो नाम हैं जिन्होंने काम से अपने नाम को सार्थक किया। इन्होंने ऐसे सवालों के जवाब ढूंढ निकाले हैं जो हमारे लिए अक्सर मजाक होते हैं। जैसे हममें से ज्यादातर लोग मटके को गरीबों का फ्रीज कहते रहे हैं। बस इसी शब्द को सिद्घ करते हुए बिना बिजली का फ्रिज सामने आया तो पत्नी को तवे पर रोटी सेंकते हुए होने वाली परेशानी से फ्राइंग पेन। गांवों में अक्सर अमीर लोग गरीबों को ताना मारा करते हैं। टै्रेक्टर नहीं है तो मोटरसाइकिल से खेत जोत लो। बस इसी से प्रेरणा ली और बना दिया मोटरसाइकिल वाला ट्रेैक्टर।

आइए, सिलसिलेवार इसे देखें। राजकोट गुजरात के मनसुखभाई प्रजापति पारिवारिक पेशे से कुम्हार हैं। पीढिय़ों से मिट्टïी के बर्तन परिवार बनाता रहा है। पर मिट्टïी को सोना करने की कहावत चरितार्थ की मनसुखभाई ने। उन्होंने बिना बिजली का मिट्टïी का फ्रीज बनाया। 2001 में गुजरात में आए भूंकप में हजारों लोगों के मटके तक नष्टï हो गए थे। लोगों को उन्होंने कहते सुना इस भूकंप ने गरीबों का फ्रीज तक छीन लिया। बस यहीं से प्रजापति ने काम शुरू किया और मिट्टïीकुल नाम से बिना बिजली का फ्रीज तैयार कर दिया। 2001 से 2004 तक वे इस पर लगातार प्रयोग करते रहे। 2005 में उन्होंने अपनी पत्नी को नान स्टिक तवे के लिए परेशान होते देखा। यह महंगा था इसलिए वे खरीद नहीं पा रही थी। इसे देखते हुए प्रजापति ने मिट्टïी के पुराने तवे पर कुछ प्रयोग किए और नान स्टिक तवा तैयार कर दिया। वो भी मात्र सौ रूपए में। अमेरिकी राष्टï्रपति ओबामा ने अपनी यात्रा के दौरान संसद के सेट्रंल हाल में अपने भाषण में कहा भी था कि आप कौन हैं और कहां से आते हैं, इससे फर्क नहीं पड़ता। सभी इश्वर द्वारा प्रदत्त क्षमता से अपनी पहचान बना सकते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण डॉ भीमराव अंबेडकर हैं जिन्होंने दलित होते हुए भी भारत का संविधान लिखा। प्रजापति ने भी एक बार फिर इसे सिद्घ किया है कि क्षमतावान को कोई रोक नहीं सकता। जरूरत है उसे पहचानने की।
मनसुखभाई पटेल भी पीछे नहीं रहे। कपास के पूरे बंद और अधखुले फूल में से कपास निकालना बेहद समय लेने वाला और थका देने वाला काम है। दसवीं तक पढ़े पटेल ने इसे दूर करने के लिए कपास की छंटाई मशीन तैयार की। वे देश के ऐसे पहले ग्रामीण अविष्कारक बने जिन्हें अमेरिकी पेटेंट भी हासिल हुआ। इसके अलावा उन्होंने कपास की उन्नत तकनीक भी विक सित की। इससे किसानों का मुनाफा बढ़ा। कपास ने हमेशा ही भारत को सम्मान दिलाया है जब सिंकदर की फौज यहां आई तो सिंधु घाटी की सभ्यता और खेतों में कपास देखकर उन्होंने दातों तले उंगली दबा ली थी। वे आश्चर्य चकित थे कि जो ऊन वो भेड़ो से हासिल करते हैं हिंदुस्तानियों ने उसे खेतों में उगा रखा है।

खेत जोतने की बात आती है तो दो ही दृश्य उभरते हैं। बैल जोड़ी लेकर पसीना बहाता किसान या ट्रैक्टर पर बैठा समृद्घ काश्तकार। इस दृश्य को फे्रम से हटाने का काम किया है गुजरात के ही मनसुखभाई जगनी ने। जगनी ने मोटरसाइकिल खेत जोतने का यंत्र तैयार किया है। ये बिल्कुल ट्रैक्टर की तरह ही काम करता है। ये देा लीटर ईंधन में आधे घंटे में करीब एक एकड़ जमीन जोत सकता है। जब विदेशों में इसे दिखाया गया तो करीब 3़18 डॉलर के इस ट्रैक्टर को सबने सराहा। इसे 325 सीसी की मोटरसाइकिल पर बनाया गया है और पिछले हिस्से में दो पहिए लगाए गए ताकि ट्रैक्टर जैसा काम कर सके। चार साल के लगातार परीक्षण के बाद तैयार इस अविष्कार को नाम दिया गया है बुलेट हल।

अपनी अंगुलियों को दर्द देकर लोगों को सुंदर कपड़ा देने वाले बुनकरों की जिंदगी को खूबसूरत बना रहे हैं आंध्र पद्रश के चिंताकिंडी मल्लेशाम। उनके व्दारा तैयार लक्ष्मी आसू मशीन ने बुनकरों को लूम की खट- -खट से मुक्ति दिलाई है। एक साड़ी तैयार करने में बुनकरों को हजारों बार हाथ घुमाना पड़ता था। नई मशीन में उन्हें सिर्फ धागे एडजस्ट करना होते हैं। पहले बुनकर पूरा दिन काम करके सिर्फ एक साड़ी का मटेरियल तैयार कर पाते थे, अब वे एक दिन में 6 साड़ी तैयार कर सकते हैं। पर दुर्भाग्य है कि देश में बुनकरो की हालत इतनी खराब है कि वे इस मशीन को भी नहीं खरीद पा रहे हैं। सरकारी दावे के अलावा फिल्म स्टार आमिर खान और करीना कपूर भी थ्री इडियट के प्रमोशन के दौरान बुनकरों के घर पहुंचे थे और उनके लिए कुछ करने का वादा किया था। आमिर ने करीना को एक साड़ी भी गिफ्ट की थी। अभी भी बुनकरों की पहुंच से यह मशीन दूर है।
एक तरफ देश में कपड़ा बुनने वाले दुदर्शा के शिकार है दूसरी तरफ लाखों ऐसे लोग हैं जिन्हें पहनने को कपडे तक नसीब नहीं है। गरीब बच्चे सड़कों पर ठंड में रात काटते हैं। ऐसी परेशानियों को महसूस करते हुए समाजसेवी अंशू गुप्ता ने गूंज संस्था के जरिए गरीबों को कपडे उपलब्ध करवाने का काम शुरू किया। फोब्र्स की सूची में वे भी शामिल हैं। अंशू अमीरों के पुराने कपड़ो को इक_ïा कर गरीबों में बंटवाने का जिम्मा संभाल रहे हंै। उनकी संस्था प्रतिमाह करीब 30 टन कपड़े इक_ïा कर बीस राज्यों में बंटवाते हैं। भारतीय समाज की इस पीड़ा को देखते हुए ही गांधीजी ने केवल एक कपड़ा पहनने का संकल्प लिया था।

राजस्थान के सीकर के मदनलाल कुमावत ने भी ज्ञान के लिए डिग्री जरूरी नहीं इसे सिद्घ किया है। चौथी कक्षा तक पडे कुमावत ने एक ऐसा थ्रेशर विकसित किया है जो कई फसलों के लिए काम आ सकता है। इसे पेटेंट केलिए आवेदन दिया हुआ है।

खेती, कपड़े के उपकरण बने हैं तो भला खाने में पीछे कैसे रहा जा सकता है। महाराष्टï्र के रामाजी खोबरागढ़े ने चावल की एक नई प्रजाति विकसित की है। बिना किसी वैज्ञानिक सहायता के रामाजी ने इस पर काम किया। चावल की इस किस्म को एचएमटी नाम दिया गया है। इस बीज से करीब 80 फीसदी ज्यादा फसल मिल रही है। साथ ही इसका दाना बारीक और खुशबुदार है। देशभर के किसान इस चावल क्रांति का लाभ ले रहे हैं।


भारत गांवों का देश है और ग्रामीण ही इस देश की जान इसे एक बार फिर साबित कर रहे हैं हिंदुस्तानी। इसके और भी उदाहरण है जैसे कौन बनेगा करोडपति की इस सीजन की करोड़पति गृहिणी तसलीम राहत। तसलीम ने सिद्घ किया कि हाउस वाइफ ज्ञान में कम नहीं होती। एशियाड में इलाहबाद केआशीष कुमार, नासिक की बेटी और वाराणसी की बहू कविता राउत और रायबरेली की सुधा ने दौड़ में देश का नाम रोशन किया। भारत की इसी ताकत ने दुनिया केदादा को भी बोलने पर मजबूर किया जयहिंद।

Thursday, November 25, 2010

रात गई बात गई


आज की ताजा खबर- एक और बड़ा घोटाला। लगाओ पुराने पर ताला। हर पुराने घोटाले पर एक नया घोटाला ऐसा ही ताला ठोंक रहा है। एक तरह से हर नया घोटाला पुराने को निपटाने की चाबी बनता जा रहा है। हर नए के साथ कुछ ऐसे शब्द जुड़ जाते हैं- अब तक का सबसे बड़ा घोटाला, देश को बेच डालने का इससे बड़ा उदाहरण दूसरा नही, इतना शर्मसार तो देश पहले कभी नहीं हुआ, इस खुलासे ने देश को कलंकित कर दिया। ऐसा लगता है मानो इसके पहले देश में अब तक जो घटा वो तो कुछ था ही नहीं। असल में ताले उन घोटालों पर नहीं हमारी याददाश्त, हमारी सोच हमारे सरोकारों पर लगते हैं। कुछ घंटो, दिनों या सप्ताह भर पहले तक हम जिस मुद्दे पर घंटों घर, दफ्तर, पान की दुकानों पर बहस करते नजर आते थे। राजनीतिक दल पुतला फूंक तमाशा, धरने, रैली, भाषण सब झोंक देते थे। जनता की अदालत में ऐसा माहौल बन जाता था कि आवाज निकलने लगती थी कि ऐसे शर्मनाक व्यक्ति या घोटाले बाज को सरेआम फांसी देनी चाहिए, चौराहे पर 'सार्वजनिक अभिनंदन करनाÓ चाहिए, देशप्रेम से भरे हम मु_ïी ताने, आंखों में खून उतर आने की हद तक बहस करते हैं। फिर अचानक एक नया मामला और पुराना गुस्सा, विरोध सब हम ऐसे याददाश्त से हटा देते हैं जैसे दिमागी कंप्यूटर के डिलीट का बटन दबा दिया गया हो। शायद हम भारतीय विरासत में मिली इन पंक्तियों को भी जीवन में आत्मसात कर चुके हैं- बीती ताहि बिसार दे।
अब घोटाले के बदलते रूप और उसके बढ़ते कद, घटती शर्म को देखते हैं। अभी कुछ सप्ताह पहले तक कॉमनवेल्थ खेलों के घपले पर पूरा देश शर्मिंदगी महसूस कर रहा था। इस पर जितना बवाल हुआ उसके बाद मुख्य कर्ताधर्ता सुरेश कलमाडी खलनायक दिखाई दे रहे थे। खेल के ओपनिंग में भी उनकी जमकर हूटिंग हुई। पर वे पूरी शान से सूट-बूट डालकर जमे रहे। बार-बार कहा मैं बेदाग हूं, रहूंगा। ये आत्मविश्वास उनमें था क्योंकि वे बड़े खिलाड़ी जमे, तपे राजनेता हैं। वे आम भारतीय नहीं हैं जो दरवाजे पर हवलदार की दस्तक से ही खाना-पीना छोड़ देता है। कलमाडी ने आने वाला कल देख लिया था। वे निश्चिंत रहे होंगे कि एक घोटाला आएगा और मेरे कु-कर्म सब भूल जाएंगे। सरकार ने भी कुछ संकेत दिए उनसे दूरी बनाने के। जैसे डिनर पर नहीं बुलाया, खिलाडिय़ों के सम्मान समारोह से दूर रखा। अरे ऐसा आदमी जिसने देश का सम्मान दांव पर लगा दिया उसे क्या फर्क पड़ेगा ऐसे कार्यक्र मों के आमंत्रण न मिलने से। हर विवादित आदमी किसी अन्य विवादित का भला ही करता है। जैसे आईपीएल के गवर्नर ललित मोदी को राहत दी कलमाडी ने और कलमाडी को पछाड़ कर सामने आए नए खलनायक महाराष्टï्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण। आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला लेकर। एक वाक्य है- दुनिया में सारे रिकॉर्ड टूटने के लिए ही बनते हैं और कोई भी शिखर पर लंबे समय तक नहीं रह सकता। ऐसे में घोटाले के शिखर पुरुष भी बदलने ही है। आजकल तो होड़ लगी है। झारखंड से निपटो तो कर्नाटक का नाटक वहां से निकले तो खेलगांव और अब महाराष्टï्र। अगले कुछ महीने, सप्ताह तक अशोक चव्हाण 'आदर्श मेडलÓ लेकर घूमते रहेंगे। देश के किसी कोने में, किसी दफ्तर में या किसी सदन में कोई नया घोटालेबाज अशोक चव्हाण को रिप्लेस करने के लिए दंड पेल ही रहा होगा। इंतजार करिए जल्द सामने होगा एक नया आदर्श। ऐसा कि आप भूल जाएंगे सारी पुरानी बातें। नया दौर नई कहानी।
अब जरा और पीछे पलटकर देख लेें। उनको याद कर लें जो अपने-अपने वक्त में इस खेल के महानायक रह चुके हैं। आईपीएल के कर्ताधर्ता ललित मोदी पर एक साथ कई जांच कमेटियों ने नकेल कसने का दिखावा किया। बावजूद उसके उन्हें सेफ पैसेज दिया गया देश छोडऩे का। जब वे सात समंदर पार जाकर बैठ गए उनके खिलाफ इंटरनेशनल वारंट जारी कर दिया गया। अब ढूंढ़ते रहो। कोई आश्चर्य नहीं थोड़े दिन बाद मोदी किसी दूसरे देश में अपनी एक अलग क्रिकेट लीग चलाते नजर आएं। गुलशन कुमार हत्या के आरोपी नदीम भी लंदन में बैठे हैं। वे वहां से बाकायदा भारतीय फिल्मों में संगीत भी दे रहे हैं। पर हम उन्हें देश नहीं ला सके। आज जनता इस मामले को भूल चूकी है। असल में हर घोटाले या लापरवाही पर सजा के नाम पर सिर्फ स्थान परिवर्तन होता है। यानी लाइन अटैच। देश पर हुए सबसे बड़े आतंकी हमले को भी हमने वैसे ही भुला दिया। उस वक्त महाराष्टï्र के गृहमंत्री रहे आर आर पाटिल हटा दिए गए थे। आज वे फिर उसी महाराष्टï्र में गृहमंत्री हैं। मुख्यमंत्री पद से हटाए गए विलासराव देशमुख अब एक कदम आगे केंद्र में भारी मंत्री हैं। अशोक चव्हाण यदि राज्य से हटाए गए तो वे केंद्र में दिखेंगे। कलमाड़ी, संभव है ओलिपिंक की तैयारी में लग जाएं और ललित मोदी विश्वकप क्रिकेट टूर्नामेंट में दिख जाएं। कभी भारतीय टीम से मैच फिक्ंिसग के बाहर धकेले गए मोहम्मद अजहरुद्दीन और उनके सहयोगी आज पहले से बड़े मुकाम पर हंै। सबसे बड़ी बात इन्हें जनता ने ही फिर चुना है। अजहर सांसद बन गए तो उनके साथी क्रिकेट एक्सपर्ट और काम भी ऐसा कि रोज टीवी पर दिखते हैं पूरी शान से। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को हम फांसी नहीं दे पा रहे। हर्षद मेहता, सत्यम के संस्थापक राजू, सांसद खरीदी और हत्या में उलझे शिबू सोरेन, सदन में सवाल पूछने के बदले पैसा लेने वाले सांसद सब धीरे-धीरे फिर उसी चाल और चतुराई से सामने दिखाई दे रहे हैं। फिल्म स्टार्स को देखिए संजय दत्त, सलमान खान पर बड़े मामले चल रहे हैं। फिर भी दोनों जनता के लाडले बने हुए हैं। उन्हें फिर मौका मिल गया अकड़ कर दबंगई करने का। जिन्हें कहीं मौका नहीं मिलता उनके लिए बिगबॉस है ही।
दरअसल इस सबमें पब्लिक का भी ज्यादा दोष नहीं। कोई भी चीज लंबे समय तक टिकती ही नहीं। सत्तर के दशक में घोटाला बे्रकफास्ट की तरह था तो 80 में लंच की तरह स्वीकार्य हो गया। 90 में लंच डिनर दोनों हुआ तो 2000 के बाद यह आल इंडिया भंडारे की तरह हर कोने में आयोजित होने लगा। चीजें टिकाउ थीं, याद रहती थीं अब इतनी तेजी से बदलाव होता है कि क्या-क्या याद रखें। पहले वनस्पति घी यानी डालडा, घोटाला यानी बोफोर्स, रथयात्रा यानी आडवाणी, भाषण तो अटल बिहारी, फिल्म...शोले तो हीरो...अमिताभ बच्चन, क्रिकेटर... कपिलदेव! देश ने इनके साथ ही करीब बीस साल गुजार दिए। फिर ऐसा दौर आया , तरह तरह के वनस्पति घी, रिफाइंड तेल। हीरो हर दिन नया। घोटालों की लाइन लग गई। हर राजनेता यात्री बन बैठा। क्रिकेट में इतने मैच कि हर घंटे नया हीरो। हाल ही में आगरा के दीपक ने दस रन देकर आठ विकेट लेकर नया रिकॉर्ड बना दिया। फिल्में टिकती ही नहीं। 25 साल तक शोले नंबर वन रही फिर उसका रिकॉर्ड दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे ने तोड़ा। इसके बाद कोई रिकार्ड नहीं बचा, गजनी, थ्री इडियट और ताजा हिट रोबोट। अब बेचारा आदमी कितना याद रखे। कुल मिलाकर यह देश, जांच समितियां और जनता फिल्म गजनी की तरह शार्ट टर्म मेमोरी लॉस के शिकार हो गए हैं। वे उन्हीं चीजों को याद रखते हैं जो उन्हें सामने दिखाई देती है। जैसे गजनी में आमिर खान को अपनी याददाश्त बनाए रखने के लिए शरीर पर नाम, नंबर गुदवाकर रखने पड़ते थे। वह दर्पण के सामने खड़ा होकर उन्हें देखता था और फिर याददाश्त ताजा और दुश्मन का खेल खत्म। जरूरत है गजनी की तरह पूरा देश अपने पास घोटालेबाजों के नाम, नंबर और तस्वीर रखे। उन्हें रोज देखता रहे ताकि वे बच न सके और देश की सही तस्वीर बन सके, नहीं तो यही कहते रहेंगे रात गई बात गई।

बिग बेशर्मी बॉस

छोटे परदे पर इस वक्त बड़ा संस्कार (विहीन) सच्चाई का ड्रामा छाया हुआ है। रियलिटी शो और सेलिब्रिटीज की सच्चाईके नाम पर सेक्स, अश्लील संवाद से लेकर शादी, सुहागरात तक का सीधा प्रसारण हो रहा है। छोटे परदे पर बिग बॉस मेंऐसा ही ड्रामा जारी है। पिछले कुछ सालों में भारतीय टेलीविजन में रियलिटी शो के नाम पर क्रार्यक्रमों की बाढ़ आ गई है।टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में चैनल सारी हदें तोड़ रहे हैं। वे यह भी भूल रहे हैं कि वे सीधे ड्राइंग रूम और परिवार के बीचदेखे जाते हैं। बिग बॉस में पिछले सीजन में लडृकियों ने राजू श्रीवास्तव का तौलिया खींंचकर उन्हें निर्वस्त्र कर दिया था, तो इस बार पाक से आई वीना मलिक ने अपना तौलिया खुद सरका दिया। डाली बिंद्रा ने हर शब्द में अश्लीलता का तड़का लगाया।सारा अश्मित, वीना अश्मित तो पूरे समय बॉहों में बॉहें डाले प्रेमपर्व मनाते ही नजर आए। यहां तक भी ठीक था। फिर साराके मंगेतर की एंट्री हुई। बिग बॉस के घर में ही निकाह हुआ। फिर सुहागरात का भी सीधा प्रसारण कर दिया गया। इसे देखकरपरिवार के साथ टीवी देख रहे लोग इधर-उधर झांकने लगे। इधर परिवार शर्मसार हो रहे थे, उधर सारा के पति अली मर्चंेटसीना तानकर कह रहे थे इसमें गलत क्या किया। जो किया शादी के बाद किया। मानो शादी के बाद सारी दीवारें गिराकरसब कुछ खुल्लम खुल्ला करने का लायसेंस मिल जाता हो। खबर है कि बिग बॉस के इस बदनाम घर में अपनी बिंदास अदाओ
ं और खुलेपन के लिए पहचानी जाने वाली पॉमेला एंडरसन आ रही है। ऐसे ही एक रियलिटी शो में मर्यादाओं को ऐसेतार-तार किया गया कि इसमें शामिल झांसी का एक युवक मौत का शिकार हो गया। एनडीटीवी के शो राखी का इंसाफमें इस युवक को राखी ने शो पर नामर्द कहा था। परिजनों के मुताबिक शो के बाद युवक का अपने परिवार, मोहल्ले मेंमुंह दिखाना मुश्किल हो गया था। पिछले दिनों उसकी मौत हो गई। ऐसा नहीं है कि ये दोनों घटनाएं अचानक सीधेप्रसारण में हो गई हो। दोनों ही कार्यक्रम पहले से रिकॉर्डेड होते हैं। बावजूद इसके चैनल के कर्ताधर्ता ऐसे दृश्यों और संवादों पर एडिटिंग की कैंची क्यों नहीं चलाते। वे ऐसा करने या शर्मसार होने के बजाए कई-कई दिनों तक इन दृश्यों और संवादों को प्रचार में इस्तेमाल करते रहते हैं। ऐसे कार्यक्रमों को देखने के बाद ऐसा लगने लगा है कि टीवीके लिए भी सेंसरशिप पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए क्योंकि इसका दायरा व्यापक है। यह घर-घर तक पहुंचता है।फिल्में तो उन्हीं लोगों तक जाती हैं जो उसे देखने जाते हैं। तकनीकी विकास और आजादी ने अपने साथ प्रतिस्पर्धा औरपरेशानी भी लाई है। एक समय टीवी से ही महाभारत, रामायण, भारत एक खोज, चाणक्यसहित कई क्वीज प्रोग्राम देश भर में लोकप्रिय होते थे। टीआरपी की होड न होने के बावजूद जो दर्शकों का सम्मानमहाभारत, रामायण को मिला वो तमाम हथकड़ों के बावजूद आजतक कोई भी कार्यक्रम नहीं छु सका। जरूरत हैछोटे परदे के बिगड़ते रूप पर बड़ी बहस की।

Wednesday, February 17, 2010

सादगी का भाजपाई ड्रामा जारी आहे

एक बड़े नेता ने कुछ साल पहले कहा था कि राजनीतिक दलों के संगठन में भी अब तीन श्रेणियां हो गई हैं। पहली
खजूरिया, दूसरी हुजूरिया और तीसरी मजूरिया। खजूरिया वे लोग हैं जो निजी लाभ हासिल करने के लिए दल में रहते हैं। इसके बाद ऐसे लोग जो सिर्फ चमचागिरी, चापलूसी और जी हुजूरी में लगे रहते हैं, हुजूरिया कहलातेे हैं। तीसरे ऐसे कार्यकर्ता होते हैं जो बिना किसी अपेक्षा के रात-दिन काम मे लगे रहते हैं वे मजूरिया कहे जाने लगे हैं। इस वक्त भारतीय जनता पार्टी में भी बड़ा वर्ग खजूरिया व मजूरिया का है। राम मन्दिर आन्दोलन के दौरान इसमें मजूरिया यानी जमीनी कार्यकर्ताओं की बड़ी ताकत थी। जब से पार्टी सत्ता में आई संगठन पीछे छूट गया और उस पर हावी हो गई खजूरिया व हुजूरिया श्रेणी। पिछले साल चुनावों में मिली हार के बाद पार्टी में फील गुड, शाइनिंग इण्डिया और हाईटेक प्रचार के आवरण से बाहर निकलकर जमीनी संगठन खड़ा करने का हल्ला है। चूंकि भाजपा का राष्ट्रीय अधिवेशन 17 फरवरी से मध्यप्रदेश के इन्दौर में शुरू हो रहा है इसलिए ये सारी बातें जरूरी है।

अधिवेशन की तैयारियां जोरों पर हैं। कहा जा रहा है कि इन्दौर की जमीन से संगठन फिर उठ खड़ा होगा। पूरी चर्चा संगठन के ढांचे व जमीनी कार्यकर्ताओं के समान पर होगी। इसी उद्देश्य से संघ ने दिल्ली से देश चलाने वाले नेताओं को दरकिनार कर नागपुर से नितिन गडकरी को भेजा। संघ का मानना है कि यह बदलाव कारगर होगा। गडकरी सादगी का मन्त्र फंूकेंगे। कथनी-करनी का भेद मिटाएंगे। संघ की विचारधारा से पूरा ताना-बाना बुनेंगे। यह अधिवेशन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे न सिर्फ गडकरी की ताजपोशी होगी बल्कि इसमें हुए निर्णय ही पार्टी का भविष्य तय करेंगे। पालमपुर में 1989 में हुए अधिवेशन के बाद भाजपा का कोई अधिवेशन ऐसा यादगार नहीं रहा। पालमपुर में ही भाजपा ने राम जन्मभूमि आन्दोलन से जुड़ने का प्रस्ताव पारित किया था। उसके बाद वह लगातार ऊंचाइयों पर पहुंची और केन्द्र की सत्ता भी हासिल की। पर इन्दौर के अधिवेशन में पूरी चर्चा इन्तजामों, उनकी भव्यता पर हो रही है। कहीं भी विचारधारा या किन मुद्दों पर चर्चा होगी, इसकी बात नहीं हो रही।
इस अधिवेशन में मुय नारा सादगी है। पूरा आयोजन होटल व फाइव स्टार संस्कृति से दूर होगा, ऐसा दावा है। संघ की तर्ज पर तंबू लगाए जा रहे हैं। सारे बड़े नेता संघ शिविरों की तरह तंबू में रहेंगे। पर सिर्फ तंबू लगा लेने से कोई संघ की तरह नहीं हो जाता, जरूरी है कि संघ की तरह पूरा आयोजन हो। इन तंबूओं के खर्चे की बड़ी चर्चा है। नज़र डालिए इस फाइव स्टार सादगी पर। सारे तंबू वॉटर प्रूफ हैं। उनमें से ज्यादातर एयरकण्डीशण्ड रहेंगे। प्रत्येक तंबू के साथ अटैच लेट-बॉथ। अस्थायी टायलेट्स का खर्च करीब एक करोड़ है। वहीं पानी की लाइन व इन्तजाम पर खर्च होंगे 12 लाख रुपये। इसमें मिनरल वॉटर का खर्च शामिल नहीं है। बिजली कनेक्शन का खर्च 16 से 20 लाख है। नेताओं के लाने-ले जाने के लिए गाçड़यों पर खर्च होंगे 20 से 25 लाख रु.। इसके अलावा खाने के इन्तजाम पर करीब 50 लाख का खर्च होने का अनुमान है। सादगी की मिसाल बनने वाली इन 1200 झोपçड़यों का किराया है करीब 20 लाख। यानी एक झोपड़ी का औसत किराया 1600 रुपये। उस पर भी नेताओं के लिए नहाने के लिए गर्म पानी का इन्तजाम करीब पांच किलोमीटर दूर सांची दुग्ध सेंटर से होगा। वहां से पानी गर्म होकर टैंकरों से अधिवेशन स्थल तक आएगा। उस पर एक और शिगूफा, अधिवेशन स्थल पर नेता साइकिल का उपयोग करेंगे ताकि पर्यावरण न बिगडे। कब तक नेता यह समझते रहेंगे कि जमीनी कार्यकर्ता व जनता को वे आसानी से धोखा दे सकते हैं। अब जमाना बदल गया है बच्चा-बच्चा जानता है कि साइकल से पर्यावरण नहीं बचेगा यदि पर्यावरण की फिक्र इतनी ही है तो एयरकण्डीशण्ड व नेताओं की सेवा में लगी सात सौ गाçड़यां से होने वाले प्रदूषण पर भी गौर करिए।

ऐसा नहीं है कि दूसरे राजनीतिक दलों के अधिवेशन में ऐसी शाहखर्ची नहीं होती। कांग्रेस के सूरजकुण्ड व पचमढ़ी अधिवेशन भी ऐसे ही रहे हैं। पर उनके प्रस्तावों पर आज जनता में या कार्यकर्ताओं में कोई बात नहीं होती। जब भी इनकी बात आती है तो हलुए, रबड़ी और दाल-बाफले जैसे व्यंजन, ठहराने के इन्तजाम ही याद किए जाते हैं। क्या भाजपा का यह अधिवेशन भी चिन्तन, विचारधारा या किसी ठोस प्रस्ताव के बजाए सिर्फ हलुआ पूरी, मालवा के व्यंजन और मेहमाननवाजी के लिए ही जाना जाएगा? इन्दौर में संघ से जुडे व संघ को जानने वाले लोगों की संया कम नहीं है। यह वही शहर है जहां संघ के बड़े-बड़े शिविरों में खाने का इन्तजाम पूरे शहर से घर-घर से रोटियां इक_ा कर होता रहा है। इसके पीछे फिजूलखर्ची रोकने के साथ-साथ आम जनता और कार्यकर्ताओं को दिल से जोड़ने का भी रहा है। यकीन मानिए, यदि भाजपा यही तरीका अपनाती तो आम कार्यकर्ता के साथ-साथ जनता भी उन्हें भोजन देने में गर्व महसूस करती। वे हर घर में पैठ बना लेते। गडकरी प्रशंसा के सही हकदार बनते और दूसरे सभी अधिवेशन के लिए मिसाल भी। कांगे्रस नेता दिग्विजय सिंह ने हाल ही में बयान भी दिया था कि ये तंबू सिर्फ दिखावा है, खाना तो फाइव स्टार से ही मंगाकर खाएंगे ये भाजपाई। भाजपा के अधिवेशन में अब तक कहीं इस बात का जिक्र नहीं आया कि प्रस्ताव कौन से होंगे। पार्टी के सामने चुनौतियां क्या हैं। कौन इन मुद्दों के लिए तैयारी कर रहा है। भाजपा जैसे दलों को संगठनात्मक ढांचे के लिए वामदलों से सीख लेनी चाहिए। उनके बड़े-बड़े अधिवेशन बड़ी सादगी से निपट जाते हैं। वे कभी खाने और ठहरने के इन्तजामों के लिए चर्चा में नहीं रहते। अधिवेशन के बहुत पहले से ही उनके प्रस्तावों, विचारधारा और भविष्य की रणनीति पर चर्चा शुरू हो जाती है। मीडिया में भी चर्चा चिन्तन की ही रहती है।

अगर आप समाजसेवा, राष्ट्रसेवा पर चलें तो खुद की सुविधाओं पर इतना खर्च कितना जायज है। यह पैसा कहां से आ रहा है, यह सच समाज जानता है और जानना भी चाहता है। यदि इससे यह लगता है कि कार्यताओं में कोई सन्देश जाएगा तो गलत है। कार्यकर्ता को पता है कि चने व सत्तू खाकर चुनाव लड़ने का भी इतिहास रहा है। किसी भी पार्टी की पूरी मानसिकता सुविधाभोगी हो जाना अच्छा संकेत नहीं है। जो नेता सादगी का पाठ पढ़ाते हैं उनका व्यवहार खुद पूंजीपतियों से कम नहीं होता। पाटिüयों में आजकल घोषित या अघोषित रूप से उद्योगपतियों के घरानों या दलालों के जरिए हवाई यात्रा का चलन बढ़ा है। कितने लोगों ने किसी राजनेता को सड़क से गुजरते देखा है। बरसों बीत गए स्लीपर क्लास में किसी सांसद या प्रदेश अध्यक्ष को देखे। तमाम मुद्दों पर रथ यात्रा निकालने वाले दल क्यों महंगाई के खिलाफ कोई रथयात्रा नहीं निकालते। क्यों राजनीतिक दल जनता खासकर युवाओं का सीधे सामना करने से बचते हैं। इस अधिवेशन में नेतृत्व और नीति, दोनों पर चिन्तन जरूरी है। जरूरी है कि पार्टी में इस पर भी बहस हो कि रेaी बंधु व शिबू सोरेन कब तक हमारी मजबूरी रहेंगे। यदि इन सारे मुद्दों पर बहस नहीं हुई तो गडकरी की ताजपोशी भाजपा में सिर्फ व्यçक्त बदल साबित होगी, संगठन वैसा ही रहेगा। संघ ने हमेशा व्यçक्त से ऊपर व्यवस्था और संगठन को रखा है। ऐसे में यह सन्देश जरूर जाना चाहिए कि व्यवस्था भी बदल रही है, वरना भाजपा का यह अधिवेशन भी शाही शादियों की तरह छप्पन पकवान व डेकोरेशन के लिए ही जाना जाएगा।

Tuesday, July 28, 2009

मेरे वोट की इज्‍जत रखो, ये बेशर्मी छोडो

आज अखबारों में पीडीपी नेता महबूबा की फोटो देखी उन्‍होने आसंदी का माइक उखाडकर स्‍पीकर पर फेंका, दूसरी तस्‍वीर राजस्‍थान की एक विधायक की है, जिसमें सदन में धक्‍कामुक्‍क्‍ी में उनका हाथ टूट
गयाा अखिल भारतीय जनप्रतिनिधि दंगल के ये सीन देखकर मुझे अपने वोटर होने पर शर्म आई, पर इन बेशर्मो को शरम आती नहीं ा



इस समय मैं एक साथ कई सच का सामना कर रहा हूं, एक तरफ तो टीवी चैनलों पर राखी का स्‍वयंवर, सच का सामना, इस जंगल से हमे बचाओं और दूसरी तरफ मेरे वोट से बनी सरकार के नुमाइंदों की हरकतों काा जहां राखी का स्‍वयंवर खालिस झूठ हैं, वहीं सच का सामना अपने सवालों की अश्‍लीलता के घेरे में हैा जगल के तो कहने ही क्‍या, पर टीवी वाले मुझे ज्‍यादा शर्मिंदा नहीं कर रहे हैं न ही मैं उनसे कोई अनुशासन, शिष्‍टाचार की उम्‍मीद रखता हूं ा उनका तो काम ही है हाइप क्रिएट करना दर्शक जुटाना, पैसा बनाना ा वे उसे ईमानदारी से कर रहे हैं, मुझे खुशी है उनकी कर्म के प्र ति समर्पण पर ा मुझे शर्मिंदा कर रहा है मेरे ही वोट से चुना गया नेता ा उसके सच से मेरा रोज सामना हो रहा है, मुझे अपने चुने पर सोचना पड रहा हैा


चैनल बदलने का तो मेरे पास रिमोट है, पर जिसे चुन लिया उसे पांच साल तक झेलना पडेगा ा उसे मैं कैसे बदल दूं ा मुझे आज की दो घटनाओं ने शर्मसार किया ा दोनो सदन की है ा पहली में जम्‍मू कश्‍मीर विधानसभा में पीडीपी नेता महबूबा मुफ़ती ने आसंदी से माइक उखाड कर स्पीकर पर फेंक दिया ा उसके बाद उन्‍होंने इसे सही बताते हुए स्‍पीकर से माफी मांगने से भी इनकार कर दिया ा दूसरी घटना राजस्‍थान विधानसभा मे हुई जहां हंगामा इतना बढा कि होम मिनिस्‍टर का ब्‍लड प्रेशर बढ गया और सदन में डॉक्‍टरों को बुलाना पडा ा मार्शल से धक्‍कामुक्‍की में विधायक गिर गए तो एक महिला विधायक के हाथ में फ्रेक्‍चर हो गया ा क्‍या हमने इन्‍हें सदन में इसलिए भेजा कि ये हमें इसी तरह से लजाएं, हमने वोट राज्‍य निर्माण के लिए दिए है, और उसका इस्‍तेमाल गरिमा के विध्‍वंस के लिए हो रहा है ा मुझे शर्म आती है इनके चुनाव पर ा ऐसे नेता चुनने के लिए मैं खुद को दोषी मानता हूं, और हर आम आदमी को अपने चयन पर विचार करना चाहिए ा
भारतीय जनप्रतिनिधि दंगल और हिन्‍दुस्‍तानी सदन के अखाडे में ऐसी कुश्तियां नई नहीं है, पहले भी उत्‍तरप्रदेश और बिहार में ऐसी फेंका फाकी होती रही है ा उत्‍तर प्रदेश में तो ऐसी कोई सदन में नहीं बची जो स्‍पीकर की तरफ उछाली न गई हो ा बिहार के राज्‍यपाल को तो राबडीदेवी ने लंगडा तक कह डाला था ा दूसरी तरफ दिल्‍ली में यही संस्‍कारों के कर्ताधर्ता सदन में सच का सामना और बालिका वधू जैसे सीरियल बंद करने की आवाज उठा रहे हैं, उनका कहना है ये सीरियल हमारी युवा पीढी पर गलत असर डाल रहे हैं ा क्‍या इन्‍हें ऐसे सवाल उठाने का हक है, क्‍या इनके कर्मो से युवाओं को नैतिकता हासिल हो रही है ा पूरे देश के अखबारों में इनकी हरकतों की तस्‍वीरें छपी हैं, पर शर्म इन्‍हें आती नहींा

Friday, July 24, 2009

सच यानी सेक्‍स का सामना

क्‍या आप किसी पराए मर्द से शारीरिक संबंध बना सकती हैं, यदि आपके पति को पता न चले तो ?
क्‍या आपने कभी किसी महिला को अपना बच्‍चा गिराने के लिए कहा है ?
क्‍या आप ने अपनी बेटी से कम उम्र की महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं ?
क्‍या आप नाबालिग उम्र में अवैध संबंधों से गर्भवती हो गई ?
क्‍या आप लडकियों को किस करने लेडिज टायलेट में घुस जाया करते थे ?

आपको लग रहा होगा मैं कोई सी ग्रेड की एडल्‍ट मूवी की स्किप्‍ट लिख रहा हूं, या किसी अश्‍लील मैगजीन की कहानियों के विषय तैयार कर रहा हूंा नहीं, ये तो हिन्‍दुस्‍तान के करोडों घरों के बैठक रूम से गूंजती आवाजें हैं, दो सप्‍ताह से लाखों लोग परिवार के साथ टीवी पर इसे देख रहे हैं ा स्‍टार प्‍लस पर सच का सामना में परिवारों का सामना हुआ सिर्फ सेक्‍स से ा चूंकि सच आजकल बडी मुश्किल से सुनने को मिलता है, इसलिए बडी संख्‍या में लोग टीवी के सामने बैठ गए, उन्‍हें लगा गांधीजी, गौतम बुद़ध, महावीर या ईसा मसीह की तरह कोई सच का नया प्रयोग सामने आएगा, सच की सीख मिलेगी और कई बडे लोग अपनी जिंदगी की गलतियों को कबूल कर साहस दिखाएंगे ा पर बडी निराशा हाथ लगी, ऐसा सच जिसे सुनकर वे दाएं बांए झांकते हैंा

एक और बात शर्मिंदगी व मुंह छिपा लेने वाले उन सवालों के जवाब भी सामना करने वाला ऐसे सीना तानकर देता है मानो कोई तमगा हासिल किया हो ा उससे भी बढकर ऐसे कारनामों पर सामने बैठी उनकी मां, पत्‍नी और दोस्‍त भी ताली बजात हैं, मानो कह रहे हो वाह बेटा नाम रोशन कर दियाा एक ऐसा समाज जहां अस्‍सी फीसदी लोग आज भी अपनी पसंद की शादी की बात मां बाप से करने में शरमाते है, परिवार के सामने पत्नि के साथ एक सोफे पर बैठने में संकोच करते है, उस परिवेश में पति या पत्नि या बेटे की ऐसी लज्‍जाजनक स्‍वीकारोक्ति पर तालियां पीटना क्‍या कहा जाए ा

सच के इस खेल में ऐसे ही सवाल क्‍यों चुने जा रहे हैा, समझ से परे है, कांबली से बेडरूम के अलावा मैदान के तो उर्वशी ढोलकिया से सैक्‍स, शराब के अलावा उनके सीरियलों के रोल हथियाने पर और आल्विन डिसिल्‍वा जैसे मार्केटंिग एक्‍जिक्‍यूटिव से उसकी जिंदगी के दूसरे पहलू पर भी बात की जा सकती है ा यह सच समाज को नई दिशा देने के बजाए भटकाएगा ा पति पत्‍नी एक दूसरे को शक की निगाह से देखने लगेंगेा बच्‍चे मां बाप की सुनना बंद कर देंगे ा सबसे बढकर यह कार्यक्रम लोगों के बीच खासकर नई पीढी को यह संदेश देगा कि एक से अधिक औरतों से सबंध रखना गलत नहीं, देखिए इतने लोग ऐसे संबंध रखते है, टीवी में उन्‍होंने खुद स्‍वीकारा है, तो हम क्‍यों पीछे रहेंा संभव है कुछ दिनों बात ज्‍यादातर लोग ऐसे सबंधों का सडकों पर खुलासा करते फिरें, युवाओं को मौका मिलेगा यह कहने का कि हिंदुस्‍तानी समाज में भी यह सब जायज है ा क्‍या हम आने वाली पीढी को यह सीखा रहे है कि देखों गलत काम कोई भी करो पर उसको स्‍वीकार लो तो प्रायश्चित हो जाएगाा
धर्मग्रंथों ने भी हमें सीख दी है सच को स्‍वीकारो, सच को स्‍वीकारने से पाप धुल जाते हैं, पर सच को स्‍वीकारने के भी कुछ कायदे उनमें शामिल हैं ा हर काम का एक सलीका होता है ा हम कई गलत काम करते हैं, उसका प्रायश्चित या तो धर्मस्‍थल पर जाकर प्रभु के सामने करते हैं या जिसके साथ गलत काम किया उससे माफी मांगते है ा एक नियम यह भी है कि ऐसा सच जो किसी की जिंदगी को खतरे में डाल दे समाज के लिए संकट पैदा कर दे न बोला जाए तो ही बेहतर है ा सच हमेशा भलाई के लिए बोला जाता है, हम चर्च में फादर के सामने कन्‍फेस करते हैं, वह बात फादर और हमारे बीच खत्‍म हो जाती है कभी सुना है कि किसी फादर ने चर्च के बाहर किसी का सच उजागर कर दिया होा सच इतनी चकाचौंध से सार्वजनिक न किए जाए कि वे अपने पीछे घना अंधेरा छोड जाएं ा सच की स्‍वीकारोक्ति के पीछे प्रायश्चित हो केवल पैसा कमाने की लालसा न हो तभी वह सच हैा ऐसे गरिमाविहीन सच से तो सफेद झूठ अच्‍छा ा

Sunday, July 12, 2009

बुरा न मानिए, प्रोडक्‍ट तो एक उदाहरण है

मेरे कल की पोस्‍ट में नौकरीपेशा लोगों को प्रोडक्‍ट लिखने पर काफी लोग नाराज हैं, उनका कहना है कि ऐसा नहीं लिखना चाहिए, मान्‍यवर मैं एक बात साफ करना चाहता हूं कि मेरा आशय प्रोडक्‍ट से कोई वस्‍तु नहीं था, मूलरूप से मैंने यह शब्‍द एक उदाहरण के तौर पर उपयोग किया है, मेरा मकसद सिर्फ यह है कि नौकरीपेशा लोगों को वक्‍त के साथ अपने काम के तरीकों में बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए, लेकिन अपनी मूल छवि को मिटाए बिना ा जरा सोचिए यदि आप वक्‍त के साथ कंप्‍यूटर नहीं सीखते, अंग्रेजी की जानकारी नहीं बढाते, मैनेजमेंट की किताबें नहीं पढते तो क्‍या संस्‍था में नए आयाम पा सकते हैं ा
दूसरी एक और बात सामने आई मेरे कुछ साथियों का कहना है कि पत्रकारतिा के पेशे से जुडा होने के बावजूद मैंने ऐसे शब्‍द का उपयोग किया यह ज्‍यादा बडा अपराध है, इसमें भी मैं एक बात साफ कर देना चाहता हूं मित्रवर आपसे विनम्र अनुरोध है कि यहां पर जो भी लिखा पढा जा रहा है, व नितांत मेरा व्‍यक्तिगत है, इसे मेरे पेशे से जोडकर न पढे, यदि आप पेशे से जोडेग तो मेरे लिखे को आप एक अलग नजरिए से देखेंगे, जो पंकज मुकाती के साथ न्‍याय नहीं करेगा ा आपकी बेबाक राय के लिए धन्‍यवाद ा

Saturday, July 11, 2009

मैं और आप भी प्रोडक्‍ट हैं, अपडेट रहिए

Saturday, July 11, 2009

मैं और आप भी प्रोडक्‍ट हैं, अपडेट रहिए
मैं आज अपनी बात थोडे अलग ढंग से रख रहा हूं, संभव है ज्‍यादातर मनुष्‍यों को यह गलत लगेगीा मेरा मानना है हम सारे नौकरीपेशा लोग एक प्रोडक्‍ट हैा यदि नहीं हैं तो फ‍ि र हम यह क्‍यों कहते है. यार मार्केट वेल्‍यू बनी रहनी चाहिए, आजकल मेरा मार्केट डाउन हैा इस बात को लिखने की प्रेरणा मुझे सुबह अपने अखबार से मिलीा मैंने आज का हिन्‍दुस्‍तान टाईम्‍स उठाया तो उसका पूरा ले आउट व कंटेट बदला हुआ थाा एक अखबार जो अंग्रेजी अखबारों में लगतार आगे बना हुआ है, उसे बदलाव की क्‍या जरूरत ा सीधी से बात है पाठकों को जोडे रखना, मार्केट वेल्‍यू बनाए रखनाासीधी बात यह है कि कोई भी प्रोडक्‍ट या व्‍यक्ति बहुत दिनों तक एक जैसे रंग रूप और तौर तरीकों के साथ बाजार में लीडर नहीं बना रह सकता ा आपको समय समय पर कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए जो बाजार की नजरों में आपको लाए, यानी जिसकी चर्चा हो ा हम जिस मार्केट में हैं वहां सफलता का फार्मूला बहुत दिनों तक गुप्‍त नहीं रह सकताा बाजार में ज्‍यादातर कंपनियां और व्‍यक्ति ऐसे हैं जो दूसरे के कामों की नकल करने में बिल्‍कुल देरी नहीं करते ा संभव है नकल के जरिए वे मूल फार्मूले वाले से भी आगे निकल जाए ानकल के बाजार का सबसे बडा उदाहरण है पानी की बोतलों का धंधाा बिसलरी ने अपनी नीले रैपर वाली बोतल के साथ बाजार में प्रवेश किया, सफलता हासिल की ा देखते ही देखते तमाम कंपनियां बाजार में आई अपनी बोतल की डिजाइन व रैपर का कलर भी नीला ही चुना ये है नकल का बाजार, बिसलरी ने इसे समझा और अपने रैपर का रंग हरा कर दिया ा उस हरे रंग ने बाजार की उस दौड में ऐसा रंग जमाया कि बिसलरी सबसे अलग और सबसे आगे हो गयाा हम जैसे नौकरीपेशा लोगों और कंपनियों दोनों को यह मानकर चलना चाहिए कि सफलता के एक ही फार्मूले से चिपककर आगे नहीं बढा जा सकता ा जरा गौर करिए कोई भी प्रोडक्‍ट तभी तक बाजार में रहता है जब तक वह उपभोक्‍ता की जरूरतें पूरी करता है, तो हम इससे अलग कैसे हैं, हम भी तभी तक किसी भी संस्‍था का हिस्‍सा बने रह सकते हैं जब तक हम उनकी जरूरतों को पूरा करते हैं, जिस तरह हम बेहतर प्रोडक्‍ट की तलाश में बाजार पर नजर रखते हैं, कंपनियां भी बेहतर कर्मचारियों की तलाश में बाजार पर नजर रखती है ा जब हम बेहतर साबुन मिलने पर तीन पीढियों से चला आ रहा लाल साबुन तत्‍काल बदल देते हैं तो कंपनी कर्मचारी क्‍यों न बदलेा ये तो संभव ही नहीं कि आपको लाल साबुन से लगाव है तो आप उसे भी खरीदते रहेंगे एक बार उससे नहाएंगे फिर दूसरे से ाकुल मिलाकर एक बात साफ है इस प्रतिस्‍पर्धा में अपनी वेल्‍यू बनाए रखने के लिए हमें काम और व्‍यावसायिक रिश्‍तों की नई परिभाषा को समझना चाहिए वह यह है कि' कंपनी में मशीनों की तरह हम एक पुर्जा हैं जिसकी न किसी से दोस्‍ती है न दुश्‍मनी इस मशीन का लक्ष्‍य है काम और परिणाम ा हमे एक ऐसे मजबूत प्रोडक्‍ट की तरह बनना होगा जिसके बिना काम ही नहीं चल सकताा आप देखिए कई चीजें ऐसी होती है जो महंगी होने के बावजूद हम दूसरे खर्च कम कर उनका इस्‍तेमाल जारी रखते हैं, जिदंगी में पूछ परख भी ऐसे ही लोगों की होती है जो महंगे होने के बावजूद अपनी उपयोगिता बनाए रखते हैं ा कुछ अलग' इसमें बहुत थोडे अपवाद भी हो सकते हैं, हम कई बार देखते हैं कि बेहतर प्रोडक्‍ट भी मार्केटिंग पैकेजिंग या गलत इस्‍तेमाल की वजह से बाजार में फेल हो जाते हैं, कई बेहतर कर्मचारियों के साथ भी यह हो सकता है, संभव है कंपनी उनकी प्रतिभा को नहीं पहचान सकी हो, या उन्‍हें ऐसे काम सौंप दिए हो जो उनकी प्रतिभा से एकदम अलग हो, जैसे नहाने के साबुन को सफेद शर्ट धोने में इस्‍तेमाल करना ओर कह देना ये साबुन ही खराब है,इसमें साबुन का नहीं इस्‍तेमाल करने वाला का दोष है ा यदि आप ऐसे हालात से भी गुजर रहे हैं तो तत्‍काल अपनी मार्केटिंग करिए और ऐसा मालिक तलाशिए जिसे काम लेने का सलीका आता हो, वरना बाजार हमें नाकाबिल घोषित करने में देर नहीं करेगा ा
Posted by पंकज मुकाती at 5:39 AM 0 comments

Friday, July 10, 2009

कोई भी सफलता मंजिल नहीं होती

इंफोसिस के को फाउंडर नंदन नीलकेणी ने अपनी कंपनी को छोडते वक्‍त जो भाषण दिया वह युवाओं के लिए एक नई ईबारत हैा नीलकेणी ने कहा आज मैं अपनी पहचान खो रहा हूा यानी वे उस संस्‍थान को अलविदा कह रहे थे जिसने उन्‍हें नाम, पैसा और शोहरत दीा अब आप कहेंगे इसमें नया कया है कारपोरेट सेक्‍टर में नौकरियां तो लोग बदलते ही रहते हैंा पर नीलकेणी का साहस है कि वे 28 साल की नौकरी या अपनी पहचान छोडकर हिन्‍दुस्‍तानियों को पहचान देने का काम करने जा रहे हैंा उन्‍हें भारत सरकार ने मतदाता पहचान कार्ड का जिम्‍मा सौंपा हैा
मेरे और आपके जैसे युवाओं के लिए यह किस तरह से प्रेरणादायी है, आइए एक;एक बिंदु से समझते हैं 1 खुद की पहचान जरूरी; जिंदगी में लगातार एक ही काम से आदमी की पहचान सिर्फ एक ही तरीके के काम के एक्‍सपर्ट के रूप में बन जाती है, अक्‍सर हम कहते हैं कंपनी में इतने साल हो गए कंपनी ने बहुत कुछ दिया है, इसे कैसे छोड दें; हममें से ज्‍यादातर लोग कंपनी के पहले सौ लोगें में भी शामिल नहीं रहते पर हम उस कंपनी से ही जुडे रहते है, ज्‍यादा दिन तक एक जैसा काम करने से आपकी पहचान खत्‍म हो जाती है, और पूरी तरह कंपनी की वजह से आप जाने जाते हैा जिंदगी में आदमी को एक बार कंपनी से पहचान से मुक्‍त होकर अपनी खुद की पहचान बनानी चाहिएा शायद इसी लिए कहा गया है कि सूरज को उदय होने के लिए एक बारअस्‍त भी होना पडत है ा
2 कोई भी सफलता अंतिम नहीं . नीलकेणी इंफोसिस के को फांउडर रहे0; किसी भी कंपनी में ये शीर्ष पद होता है, ये पद आपके सपनों की अंतिम उडान या लक्ष्‍य होता है, बावजूद इसके वे इसे छोडकर नए सफर पर निकले इसका मतलब सफलता का मतलब पद ही नहीं हैा आपकी इच्‍छाएं और काम की बैचेनी जब तक है, नई सफलताएं तलाशते रहिएा ओशो' ने शायद इसीलिए लिखा था संतोषी सदा सुखी जैसे शब्‍द हटा देने चाहिए,
3 सुख चुनौतियों में है0; इंफोसिंस जैसे वेल आर्गेनाइज्‍ड समूह कारपोरेट समूह को छोडकर सरकारी दफ़तरों से माथापच्‍ची करना कोई आसान काम नहीं है, पर एक मल्‍टीनेशनल कंपनी और उसके होनहार कर्मचारियों के बीच सफलता हासिल करना कठिन काम नहीं है ा चुनौती है कामचलाऊ रवैये और अकुशल कम्रचारियों के बीच काम कर उनसे काम निकलवाना ा नीलकेणी के लिए सबसे बडी चुनौती यही है ा
4 कंपनी की सफलता में हिस्‍सेदारी मत मांगो; एक बात और हमें दिमाग में बैठा लेनी चाहिए कि कंपनी ने हमें काम के लिए रखा है, हमें काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए और कंपनी की ग्रोथ और उसकी बैलेंसशीट को कभी अपना मानकर उससे चिपक कर जिंदगी गुजारने का नहीं सोचना चाहिएा नीलकेणी के फाउंडर बनने के बाद कंपनी के बाद सात साल में कंपनी के कर्मचारियों की संख्‍या दस हजार से बढकर एक लाख होगई और उसका मुनाफा 808 करोड से बढकर 5980 करोड हो गयाा इसके बाद भी वे नई राह पर निकल पडे, इसके विपरीत हम कंपनी को छोटी मोटी सफलता दिलाने के बाद ही उस पर अपना हक समझते हुए जिंदगी वहीं बिताने का इंतजाम कर लेते हैा कंपनी की नहीं जिंदगी में अपनी पहचान की हिस्‍सेदारी पर ध्‍यान दीजिए को ा कोई भी कंपनी कोई भी सफलता आखरी नहीं हो सकतीा

Wednesday, February 6, 2008

महाराष्ट्र नहीं धृतराष्ट्र राज की मांग

राज ठाकरे ध़ृतराष्ट्र की तरह आंखें बंद क्यों किए हुए हैं जिन उत्तरभारतीयों को वे कोस रहे हैं उसी उत्तर भारत ने देश के शीर्ष पद पर एक मराठी महिला को चुना । उत्तरभारतीयों के वोट से ही प़तिभा पाटिल आज राष्ट्रपति हैं । क्या वे ऎसा चाहते हैं कि लतामंगेशकर को केवल मराठी ही सुने और सचिन केवल मुंबई की टीम में ही खिलाए जाएं । यदि राज की बात का जवाब पूरे देश ने दिया तो सिवाय राख के कुछ नहीं बचेगा । सारे मराठी शीर्ष पदों से खदेड दिए जाएंगे ।

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख और शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे जैसा बनने दिखने की कोशिश में लगे राज ठाकरे के नाम का इस समय बडा हल्ला है । राज ने जय महाराष्ट्र का नारा बुलंद किया । उन्होंने यूपी बिहार के लोगों को महाराष्ट्र के प्रति वफादार रहने की चेतावनी दी है । उन्हें इस बात से भी नाराजगी है कि अमिताभ बच्चन महाराष्ट्र से खाते कमाते हैं तो फिर यूपी में कालेज क्यों खोल रहे हैं वहां का प्रचार प्रसार क्यों करते हैं । राज ने लगभग सारे उत्तरभारतीयों को महाराष्ट्र से चले जाने को कहा है । उनका कहना है महाराष्ट्र में केवल मराठी ही रहेंगे । ९० के दशक में राज जिस तेजी से बाला साहब के उत्तराधिकारी के रुप में उभरे थे पिछले तीन दिनों में ही वे उससे कई गुना तेजी से नीचे गिरे । वे भी बाला साहेब की तरफ दहाडना चाहते हैं ऒर हिंदू शंर की पदवी हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं । ७० के दशक में बाला साहेब ने अपनी राजनीति भी इसी मराठी मुद्दे से शुरु की पर वक्त के साथ वे बदले और महाराष्ट्र से हटकर हिंदू राष्ट् के मुद्दे पर आ गए । उन्होंने अपना दायरा बढाया तभी हिंदुस्तानी शेर कहलाए । इसके बाद उनके बेटे उद्धव ने भी मी मुबंईकर जैसा अभियान चलाया ना कि मी मराठी । फिर राज इस नफरत की आग क्यों भडका रहे हैं । दरअसल यह लडाई मराठी या उत्तरभारती की नहीं राज और उद्धव में कौन बाला साहेब जैसा आक़ामक की है ।

देश में बहुत कुछ बदल चुका है । इस मुद्दे कॊ गंभीरता से देखना होगा दिमाग से समझना होगा ना कि हुडदंग की तरह । इतिहास देखिए हिंदुस्तान में कभी जाति और भाषा की लडाई वाले लंबे समय तक सम्मान के हकदार नहीं रहे थोडे समय में ही वे नफरत के शिकार बने और उनका नामलेवा भी नहीं बचा । खालिस्तान आंदोलन चलाने वाले भिडंरावाले कश्मीर में इस्लामिक शासन की मांग करने वाले और पिछडों के मसीहा बनने की कोशिश में मंडल का हथियार चलाने वाले वीपी सिंह इन तीनों को आज वे लोग भी नहीं पूछ रहे जिनके नाम पर इन्होंने ये आंदोलन खडे किए थे । हमें गर्व है कि हिंदुस्तानियॊं ने हमेशा ऎसे नफरतपरस्तों को बाहर का रास्ता दिखाया है । बाकि सारी बातें छोड दीजिए हिंदुवाद का नारा बुलंद करने वाली भाजपा को देखिए । इस देश में ८० फीसदी हिंदू वोटर होने के बाद भी भाजपा अपने बूते केंद में सरकार नहीं बना सकी । उसे उग्र हिंदूवाद छोडना पडा । उन पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाना स्वीकारना पडा जो कभी हिंदूवादी विचारधारा के समर्थक नहीं रहे। । यदि देश में यह सब चलता तो यहां हिंदू महासभा विश्व हिंदू परिषद भाजपा की सरकारें चलती पर ऎसा नहीं है ऒर यही हमारी ताक है । इस देश में मुस्लिम राष्ट्रपित सिख प़धानमंत्री और देश की सबसे बडी पार्टी की कमान एक एक ऎसी महिला के हाथ में है जो विदेशी है पर है तो हिंदुस्तान की बहू । राज ठाकरे ये क्यां याद नहीं रखते कि देश के शीर्ष पद पर बैठी महिला महाराष्टीयन हैं देश के सबसे बडे खेल किकेट के सर्वेसर्वा भी मराठी है और इन दोनों को उत्तरभारत ने ही चुना है । क्या राज ठाकरे चाहेंगे कि लता मंगेशकर को सिर्फ मराठी ही सुनें सचिन का पूरा देश बहिष्कार कर दे क्योंकि वे मराठी हैं । मुंबई से यदि उत्तरभारतीयों को कुछ घंटे के लिए भी हटा दिया जाए तो पूरा मुंबई किसी गांव से ज्यादा नजर नहीं आएगा । अंबानी अमिताभ पर इतराता मुंबई मिनटों में कंगाल हो जाएगा । अब अमिताभ के यूपी में पैसा लगाने पर राज को एतराज है क्या पुरखों को याद करना गलत है । अपने बचपन को देखना सहेजना गलत है यदि ये गलत है तो िफर विदेशों में बसे भारतीयों से क्यों देशप़ेम की उम्मीद रखते हैं उनसे इंिडया लोटने और यहां पैसा लगाने की मांग करते हैं । राज ठाकरे को संभलना हॊगा उन्हे ध्यान रखना चाहिए कि इतने हंगामें के बाद भी शिवसना कभी महाराष्ट्र में अकेले के दम पर सत्ता हासिल नहीं कर सकी । नफरत की ये चिंगारी एक दिन रिवर्स गियर लगाएगी और राज का पूरा कैरियर राख हो जाएगा । इस देश ने ऎसे कई नफरती दिमागों को खाक किया है । यह आग जल्द बुझेगी मराठी लोगों की प़ेम से भरी दमकलें ही इसे बुझाइएगी । महाराष्ट्र इस राषट्र में महा ही रहेगा नफरत और सत्ता मोह में अंधा कोई भी धृतराष्ट् उसे हिंदूस्तान से अलग नहीं कर पाएगा ।

Friday, February 1, 2008

सिगरेट के धुंए में उडती इंसानियत

केंदीय स्वास्थ्य मं‌त्री अबुमणि रामदौस ने हाल ही में सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान से अनुरोध किया कि वे िफल्मों में सिगरेट पीने वाले सीन न करें । उनका मानना है कि युवा पीढी इन दोनों अभिनेताऒं को आइडल मानती है । इनकी स्टाइल और परदे पर किए गए सीन को निजी जिंदगी में अपनाती है । इस अपील पर शाहरुख खान ने जो जवाब दिया वो उनके दंभ और देश के लिए नजरिया दर्शाता है । शाहरुख ने कहा कि इस तरह की रोक मंजूर नहीं यह अभिव्यिक्त की आजादी के खिलाफ है । इससे िफल्मों में रचनात्मकता कम होगी । इस मामले में बिग बी ने भी खामोश रहकर पल्ला झाड लिया । खामोशी के मायने यही है कि वे भी इस तरह की रोक से सहमत नहीं हैं । खुद को तमाम मंचों पर गरीबों का हमदर्द बताने वाले इन महान अभिनेताऒं को अब इंसानियत याद क्यों नहीं आ रही है ।
आखिर क्या कारण है जो केंदीय मंत्री को इन परदे के सूरमाऒं से अपील करनी पडी । कारण साफ है इस देश में अब भी जनता इनको कापी करती है‌ । इनके जैसे बाल इनके जैसी चाल और इनके जैसा दिखने की दीवानगी अब भी कायम है । हीरो के साथ ये सिनेमाघर में तो रोते हंसते ही हैं । उनकी निजी जिंदगी में भी उनके दुख में दुखी और खुशी में मिठाई बांटते हैं । शाहरुख का जन्मदिन देश के कई घरों में मनता है । उनके बेटे का नाम सुनकर कई लोगों ने अपने बेटे का नाम आर्यन रख लिया । उनकी िफल्मों का पहला शो देखने लोग घंटों लाईन में खडे रहते है । कुछ ऎसी ही दीवानगी बिग बी को लेकर रही है । याद कीजिए तेजी बच्चन के निधन के बाद कितने दीवानॊं ने शोकसभा आयोजित कर डाली सिर मुंडवा लिया । अभिषेक की शादी में पूरे देश में सैकडो दीवाने दिखे जिन्होंने मिठाईयां बंटवा दी ।इस दीवानगी को देखते हुए इन परदे के महान लोगों को हकीकत में भी थोडी सी इंसानियत दिखानी चाहिए । तमाम देशी विदेशी अवार्ड और जो मोम के पुतले बनें हैं वह इस देश की जनता के प्यार की वजह से ही मिले हैं । यदि ये अभिनेता यह मानते हैं कि वे अपने दम पर सबकुछ हैं तो िफर जब सरकार इनसे टैक्स वसूली और दूसरे कायदे कानून पालन करवाने का दबाव डालती है तब क्यॊं ये मीडिया में आकर दुखडा रोते है और अपने दीवानों का इस़्तेमाल करके पूरे देश को इमोशनल ब्लैकमेल करते हैं । होना यह चाहिए था कि मंत्री जी की अपील के बाद दोनों अभिनेता मीडिया को बुलाते और कहते कि आज के बाद हम ऎसे सीन नहीं करेंगे । साथ ही सिगरेट के खिलाफ मुहिम में भी सरकार की मदद करेंगे । यदि ये दोनों अभिनेता ऎसा कहते तो कोई भी निर्देशक इनसे ऎसे रोल के लिए कभी नहीं कहता । इन्हे इंसानियत को धुंए में उडाने और दर्द ए डिस्को के बजाए दर्द ए सिगरेट गाना चाहिए ।