जिद कुछ कर दिखाने की

जिद कुछ कर दिखाने की

Wednesday, February 17, 2010

सादगी का भाजपाई ड्रामा जारी आहे

एक बड़े नेता ने कुछ साल पहले कहा था कि राजनीतिक दलों के संगठन में भी अब तीन श्रेणियां हो गई हैं। पहली
खजूरिया, दूसरी हुजूरिया और तीसरी मजूरिया। खजूरिया वे लोग हैं जो निजी लाभ हासिल करने के लिए दल में रहते हैं। इसके बाद ऐसे लोग जो सिर्फ चमचागिरी, चापलूसी और जी हुजूरी में लगे रहते हैं, हुजूरिया कहलातेे हैं। तीसरे ऐसे कार्यकर्ता होते हैं जो बिना किसी अपेक्षा के रात-दिन काम मे लगे रहते हैं वे मजूरिया कहे जाने लगे हैं। इस वक्त भारतीय जनता पार्टी में भी बड़ा वर्ग खजूरिया व मजूरिया का है। राम मन्दिर आन्दोलन के दौरान इसमें मजूरिया यानी जमीनी कार्यकर्ताओं की बड़ी ताकत थी। जब से पार्टी सत्ता में आई संगठन पीछे छूट गया और उस पर हावी हो गई खजूरिया व हुजूरिया श्रेणी। पिछले साल चुनावों में मिली हार के बाद पार्टी में फील गुड, शाइनिंग इण्डिया और हाईटेक प्रचार के आवरण से बाहर निकलकर जमीनी संगठन खड़ा करने का हल्ला है। चूंकि भाजपा का राष्ट्रीय अधिवेशन 17 फरवरी से मध्यप्रदेश के इन्दौर में शुरू हो रहा है इसलिए ये सारी बातें जरूरी है।

अधिवेशन की तैयारियां जोरों पर हैं। कहा जा रहा है कि इन्दौर की जमीन से संगठन फिर उठ खड़ा होगा। पूरी चर्चा संगठन के ढांचे व जमीनी कार्यकर्ताओं के समान पर होगी। इसी उद्देश्य से संघ ने दिल्ली से देश चलाने वाले नेताओं को दरकिनार कर नागपुर से नितिन गडकरी को भेजा। संघ का मानना है कि यह बदलाव कारगर होगा। गडकरी सादगी का मन्त्र फंूकेंगे। कथनी-करनी का भेद मिटाएंगे। संघ की विचारधारा से पूरा ताना-बाना बुनेंगे। यह अधिवेशन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे न सिर्फ गडकरी की ताजपोशी होगी बल्कि इसमें हुए निर्णय ही पार्टी का भविष्य तय करेंगे। पालमपुर में 1989 में हुए अधिवेशन के बाद भाजपा का कोई अधिवेशन ऐसा यादगार नहीं रहा। पालमपुर में ही भाजपा ने राम जन्मभूमि आन्दोलन से जुड़ने का प्रस्ताव पारित किया था। उसके बाद वह लगातार ऊंचाइयों पर पहुंची और केन्द्र की सत्ता भी हासिल की। पर इन्दौर के अधिवेशन में पूरी चर्चा इन्तजामों, उनकी भव्यता पर हो रही है। कहीं भी विचारधारा या किन मुद्दों पर चर्चा होगी, इसकी बात नहीं हो रही।
इस अधिवेशन में मुय नारा सादगी है। पूरा आयोजन होटल व फाइव स्टार संस्कृति से दूर होगा, ऐसा दावा है। संघ की तर्ज पर तंबू लगाए जा रहे हैं। सारे बड़े नेता संघ शिविरों की तरह तंबू में रहेंगे। पर सिर्फ तंबू लगा लेने से कोई संघ की तरह नहीं हो जाता, जरूरी है कि संघ की तरह पूरा आयोजन हो। इन तंबूओं के खर्चे की बड़ी चर्चा है। नज़र डालिए इस फाइव स्टार सादगी पर। सारे तंबू वॉटर प्रूफ हैं। उनमें से ज्यादातर एयरकण्डीशण्ड रहेंगे। प्रत्येक तंबू के साथ अटैच लेट-बॉथ। अस्थायी टायलेट्स का खर्च करीब एक करोड़ है। वहीं पानी की लाइन व इन्तजाम पर खर्च होंगे 12 लाख रुपये। इसमें मिनरल वॉटर का खर्च शामिल नहीं है। बिजली कनेक्शन का खर्च 16 से 20 लाख है। नेताओं के लाने-ले जाने के लिए गाçड़यों पर खर्च होंगे 20 से 25 लाख रु.। इसके अलावा खाने के इन्तजाम पर करीब 50 लाख का खर्च होने का अनुमान है। सादगी की मिसाल बनने वाली इन 1200 झोपçड़यों का किराया है करीब 20 लाख। यानी एक झोपड़ी का औसत किराया 1600 रुपये। उस पर भी नेताओं के लिए नहाने के लिए गर्म पानी का इन्तजाम करीब पांच किलोमीटर दूर सांची दुग्ध सेंटर से होगा। वहां से पानी गर्म होकर टैंकरों से अधिवेशन स्थल तक आएगा। उस पर एक और शिगूफा, अधिवेशन स्थल पर नेता साइकिल का उपयोग करेंगे ताकि पर्यावरण न बिगडे। कब तक नेता यह समझते रहेंगे कि जमीनी कार्यकर्ता व जनता को वे आसानी से धोखा दे सकते हैं। अब जमाना बदल गया है बच्चा-बच्चा जानता है कि साइकल से पर्यावरण नहीं बचेगा यदि पर्यावरण की फिक्र इतनी ही है तो एयरकण्डीशण्ड व नेताओं की सेवा में लगी सात सौ गाçड़यां से होने वाले प्रदूषण पर भी गौर करिए।

ऐसा नहीं है कि दूसरे राजनीतिक दलों के अधिवेशन में ऐसी शाहखर्ची नहीं होती। कांग्रेस के सूरजकुण्ड व पचमढ़ी अधिवेशन भी ऐसे ही रहे हैं। पर उनके प्रस्तावों पर आज जनता में या कार्यकर्ताओं में कोई बात नहीं होती। जब भी इनकी बात आती है तो हलुए, रबड़ी और दाल-बाफले जैसे व्यंजन, ठहराने के इन्तजाम ही याद किए जाते हैं। क्या भाजपा का यह अधिवेशन भी चिन्तन, विचारधारा या किसी ठोस प्रस्ताव के बजाए सिर्फ हलुआ पूरी, मालवा के व्यंजन और मेहमाननवाजी के लिए ही जाना जाएगा? इन्दौर में संघ से जुडे व संघ को जानने वाले लोगों की संया कम नहीं है। यह वही शहर है जहां संघ के बड़े-बड़े शिविरों में खाने का इन्तजाम पूरे शहर से घर-घर से रोटियां इक_ा कर होता रहा है। इसके पीछे फिजूलखर्ची रोकने के साथ-साथ आम जनता और कार्यकर्ताओं को दिल से जोड़ने का भी रहा है। यकीन मानिए, यदि भाजपा यही तरीका अपनाती तो आम कार्यकर्ता के साथ-साथ जनता भी उन्हें भोजन देने में गर्व महसूस करती। वे हर घर में पैठ बना लेते। गडकरी प्रशंसा के सही हकदार बनते और दूसरे सभी अधिवेशन के लिए मिसाल भी। कांगे्रस नेता दिग्विजय सिंह ने हाल ही में बयान भी दिया था कि ये तंबू सिर्फ दिखावा है, खाना तो फाइव स्टार से ही मंगाकर खाएंगे ये भाजपाई। भाजपा के अधिवेशन में अब तक कहीं इस बात का जिक्र नहीं आया कि प्रस्ताव कौन से होंगे। पार्टी के सामने चुनौतियां क्या हैं। कौन इन मुद्दों के लिए तैयारी कर रहा है। भाजपा जैसे दलों को संगठनात्मक ढांचे के लिए वामदलों से सीख लेनी चाहिए। उनके बड़े-बड़े अधिवेशन बड़ी सादगी से निपट जाते हैं। वे कभी खाने और ठहरने के इन्तजामों के लिए चर्चा में नहीं रहते। अधिवेशन के बहुत पहले से ही उनके प्रस्तावों, विचारधारा और भविष्य की रणनीति पर चर्चा शुरू हो जाती है। मीडिया में भी चर्चा चिन्तन की ही रहती है।

अगर आप समाजसेवा, राष्ट्रसेवा पर चलें तो खुद की सुविधाओं पर इतना खर्च कितना जायज है। यह पैसा कहां से आ रहा है, यह सच समाज जानता है और जानना भी चाहता है। यदि इससे यह लगता है कि कार्यताओं में कोई सन्देश जाएगा तो गलत है। कार्यकर्ता को पता है कि चने व सत्तू खाकर चुनाव लड़ने का भी इतिहास रहा है। किसी भी पार्टी की पूरी मानसिकता सुविधाभोगी हो जाना अच्छा संकेत नहीं है। जो नेता सादगी का पाठ पढ़ाते हैं उनका व्यवहार खुद पूंजीपतियों से कम नहीं होता। पाटिüयों में आजकल घोषित या अघोषित रूप से उद्योगपतियों के घरानों या दलालों के जरिए हवाई यात्रा का चलन बढ़ा है। कितने लोगों ने किसी राजनेता को सड़क से गुजरते देखा है। बरसों बीत गए स्लीपर क्लास में किसी सांसद या प्रदेश अध्यक्ष को देखे। तमाम मुद्दों पर रथ यात्रा निकालने वाले दल क्यों महंगाई के खिलाफ कोई रथयात्रा नहीं निकालते। क्यों राजनीतिक दल जनता खासकर युवाओं का सीधे सामना करने से बचते हैं। इस अधिवेशन में नेतृत्व और नीति, दोनों पर चिन्तन जरूरी है। जरूरी है कि पार्टी में इस पर भी बहस हो कि रेaी बंधु व शिबू सोरेन कब तक हमारी मजबूरी रहेंगे। यदि इन सारे मुद्दों पर बहस नहीं हुई तो गडकरी की ताजपोशी भाजपा में सिर्फ व्यçक्त बदल साबित होगी, संगठन वैसा ही रहेगा। संघ ने हमेशा व्यçक्त से ऊपर व्यवस्था और संगठन को रखा है। ऐसे में यह सन्देश जरूर जाना चाहिए कि व्यवस्था भी बदल रही है, वरना भाजपा का यह अधिवेशन भी शाही शादियों की तरह छप्पन पकवान व डेकोरेशन के लिए ही जाना जाएगा।

Tuesday, July 28, 2009

मेरे वोट की इज्‍जत रखो, ये बेशर्मी छोडो

आज अखबारों में पीडीपी नेता महबूबा की फोटो देखी उन्‍होने आसंदी का माइक उखाडकर स्‍पीकर पर फेंका, दूसरी तस्‍वीर राजस्‍थान की एक विधायक की है, जिसमें सदन में धक्‍कामुक्‍क्‍ी में उनका हाथ टूट
गयाा अखिल भारतीय जनप्रतिनिधि दंगल के ये सीन देखकर मुझे अपने वोटर होने पर शर्म आई, पर इन बेशर्मो को शरम आती नहीं ा



इस समय मैं एक साथ कई सच का सामना कर रहा हूं, एक तरफ तो टीवी चैनलों पर राखी का स्‍वयंवर, सच का सामना, इस जंगल से हमे बचाओं और दूसरी तरफ मेरे वोट से बनी सरकार के नुमाइंदों की हरकतों काा जहां राखी का स्‍वयंवर खालिस झूठ हैं, वहीं सच का सामना अपने सवालों की अश्‍लीलता के घेरे में हैा जगल के तो कहने ही क्‍या, पर टीवी वाले मुझे ज्‍यादा शर्मिंदा नहीं कर रहे हैं न ही मैं उनसे कोई अनुशासन, शिष्‍टाचार की उम्‍मीद रखता हूं ा उनका तो काम ही है हाइप क्रिएट करना दर्शक जुटाना, पैसा बनाना ा वे उसे ईमानदारी से कर रहे हैं, मुझे खुशी है उनकी कर्म के प्र ति समर्पण पर ा मुझे शर्मिंदा कर रहा है मेरे ही वोट से चुना गया नेता ा उसके सच से मेरा रोज सामना हो रहा है, मुझे अपने चुने पर सोचना पड रहा हैा


चैनल बदलने का तो मेरे पास रिमोट है, पर जिसे चुन लिया उसे पांच साल तक झेलना पडेगा ा उसे मैं कैसे बदल दूं ा मुझे आज की दो घटनाओं ने शर्मसार किया ा दोनो सदन की है ा पहली में जम्‍मू कश्‍मीर विधानसभा में पीडीपी नेता महबूबा मुफ़ती ने आसंदी से माइक उखाड कर स्पीकर पर फेंक दिया ा उसके बाद उन्‍होंने इसे सही बताते हुए स्‍पीकर से माफी मांगने से भी इनकार कर दिया ा दूसरी घटना राजस्‍थान विधानसभा मे हुई जहां हंगामा इतना बढा कि होम मिनिस्‍टर का ब्‍लड प्रेशर बढ गया और सदन में डॉक्‍टरों को बुलाना पडा ा मार्शल से धक्‍कामुक्‍की में विधायक गिर गए तो एक महिला विधायक के हाथ में फ्रेक्‍चर हो गया ा क्‍या हमने इन्‍हें सदन में इसलिए भेजा कि ये हमें इसी तरह से लजाएं, हमने वोट राज्‍य निर्माण के लिए दिए है, और उसका इस्‍तेमाल गरिमा के विध्‍वंस के लिए हो रहा है ा मुझे शर्म आती है इनके चुनाव पर ा ऐसे नेता चुनने के लिए मैं खुद को दोषी मानता हूं, और हर आम आदमी को अपने चयन पर विचार करना चाहिए ा
भारतीय जनप्रतिनिधि दंगल और हिन्‍दुस्‍तानी सदन के अखाडे में ऐसी कुश्तियां नई नहीं है, पहले भी उत्‍तरप्रदेश और बिहार में ऐसी फेंका फाकी होती रही है ा उत्‍तर प्रदेश में तो ऐसी कोई सदन में नहीं बची जो स्‍पीकर की तरफ उछाली न गई हो ा बिहार के राज्‍यपाल को तो राबडीदेवी ने लंगडा तक कह डाला था ा दूसरी तरफ दिल्‍ली में यही संस्‍कारों के कर्ताधर्ता सदन में सच का सामना और बालिका वधू जैसे सीरियल बंद करने की आवाज उठा रहे हैं, उनका कहना है ये सीरियल हमारी युवा पीढी पर गलत असर डाल रहे हैं ा क्‍या इन्‍हें ऐसे सवाल उठाने का हक है, क्‍या इनके कर्मो से युवाओं को नैतिकता हासिल हो रही है ा पूरे देश के अखबारों में इनकी हरकतों की तस्‍वीरें छपी हैं, पर शर्म इन्‍हें आती नहींा

Friday, July 24, 2009

सच यानी सेक्‍स का सामना

क्‍या आप किसी पराए मर्द से शारीरिक संबंध बना सकती हैं, यदि आपके पति को पता न चले तो ?
क्‍या आपने कभी किसी महिला को अपना बच्‍चा गिराने के लिए कहा है ?
क्‍या आप ने अपनी बेटी से कम उम्र की महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं ?
क्‍या आप नाबालिग उम्र में अवैध संबंधों से गर्भवती हो गई ?
क्‍या आप लडकियों को किस करने लेडिज टायलेट में घुस जाया करते थे ?

आपको लग रहा होगा मैं कोई सी ग्रेड की एडल्‍ट मूवी की स्किप्‍ट लिख रहा हूं, या किसी अश्‍लील मैगजीन की कहानियों के विषय तैयार कर रहा हूंा नहीं, ये तो हिन्‍दुस्‍तान के करोडों घरों के बैठक रूम से गूंजती आवाजें हैं, दो सप्‍ताह से लाखों लोग परिवार के साथ टीवी पर इसे देख रहे हैं ा स्‍टार प्‍लस पर सच का सामना में परिवारों का सामना हुआ सिर्फ सेक्‍स से ा चूंकि सच आजकल बडी मुश्किल से सुनने को मिलता है, इसलिए बडी संख्‍या में लोग टीवी के सामने बैठ गए, उन्‍हें लगा गांधीजी, गौतम बुद़ध, महावीर या ईसा मसीह की तरह कोई सच का नया प्रयोग सामने आएगा, सच की सीख मिलेगी और कई बडे लोग अपनी जिंदगी की गलतियों को कबूल कर साहस दिखाएंगे ा पर बडी निराशा हाथ लगी, ऐसा सच जिसे सुनकर वे दाएं बांए झांकते हैंा

एक और बात शर्मिंदगी व मुंह छिपा लेने वाले उन सवालों के जवाब भी सामना करने वाला ऐसे सीना तानकर देता है मानो कोई तमगा हासिल किया हो ा उससे भी बढकर ऐसे कारनामों पर सामने बैठी उनकी मां, पत्‍नी और दोस्‍त भी ताली बजात हैं, मानो कह रहे हो वाह बेटा नाम रोशन कर दियाा एक ऐसा समाज जहां अस्‍सी फीसदी लोग आज भी अपनी पसंद की शादी की बात मां बाप से करने में शरमाते है, परिवार के सामने पत्नि के साथ एक सोफे पर बैठने में संकोच करते है, उस परिवेश में पति या पत्नि या बेटे की ऐसी लज्‍जाजनक स्‍वीकारोक्ति पर तालियां पीटना क्‍या कहा जाए ा

सच के इस खेल में ऐसे ही सवाल क्‍यों चुने जा रहे हैा, समझ से परे है, कांबली से बेडरूम के अलावा मैदान के तो उर्वशी ढोलकिया से सैक्‍स, शराब के अलावा उनके सीरियलों के रोल हथियाने पर और आल्विन डिसिल्‍वा जैसे मार्केटंिग एक्‍जिक्‍यूटिव से उसकी जिंदगी के दूसरे पहलू पर भी बात की जा सकती है ा यह सच समाज को नई दिशा देने के बजाए भटकाएगा ा पति पत्‍नी एक दूसरे को शक की निगाह से देखने लगेंगेा बच्‍चे मां बाप की सुनना बंद कर देंगे ा सबसे बढकर यह कार्यक्रम लोगों के बीच खासकर नई पीढी को यह संदेश देगा कि एक से अधिक औरतों से सबंध रखना गलत नहीं, देखिए इतने लोग ऐसे संबंध रखते है, टीवी में उन्‍होंने खुद स्‍वीकारा है, तो हम क्‍यों पीछे रहेंा संभव है कुछ दिनों बात ज्‍यादातर लोग ऐसे सबंधों का सडकों पर खुलासा करते फिरें, युवाओं को मौका मिलेगा यह कहने का कि हिंदुस्‍तानी समाज में भी यह सब जायज है ा क्‍या हम आने वाली पीढी को यह सीखा रहे है कि देखों गलत काम कोई भी करो पर उसको स्‍वीकार लो तो प्रायश्चित हो जाएगाा
धर्मग्रंथों ने भी हमें सीख दी है सच को स्‍वीकारो, सच को स्‍वीकारने से पाप धुल जाते हैं, पर सच को स्‍वीकारने के भी कुछ कायदे उनमें शामिल हैं ा हर काम का एक सलीका होता है ा हम कई गलत काम करते हैं, उसका प्रायश्चित या तो धर्मस्‍थल पर जाकर प्रभु के सामने करते हैं या जिसके साथ गलत काम किया उससे माफी मांगते है ा एक नियम यह भी है कि ऐसा सच जो किसी की जिंदगी को खतरे में डाल दे समाज के लिए संकट पैदा कर दे न बोला जाए तो ही बेहतर है ा सच हमेशा भलाई के लिए बोला जाता है, हम चर्च में फादर के सामने कन्‍फेस करते हैं, वह बात फादर और हमारे बीच खत्‍म हो जाती है कभी सुना है कि किसी फादर ने चर्च के बाहर किसी का सच उजागर कर दिया होा सच इतनी चकाचौंध से सार्वजनिक न किए जाए कि वे अपने पीछे घना अंधेरा छोड जाएं ा सच की स्‍वीकारोक्ति के पीछे प्रायश्चित हो केवल पैसा कमाने की लालसा न हो तभी वह सच हैा ऐसे गरिमाविहीन सच से तो सफेद झूठ अच्‍छा ा

Sunday, July 12, 2009

बुरा न मानिए, प्रोडक्‍ट तो एक उदाहरण है

मेरे कल की पोस्‍ट में नौकरीपेशा लोगों को प्रोडक्‍ट लिखने पर काफी लोग नाराज हैं, उनका कहना है कि ऐसा नहीं लिखना चाहिए, मान्‍यवर मैं एक बात साफ करना चाहता हूं कि मेरा आशय प्रोडक्‍ट से कोई वस्‍तु नहीं था, मूलरूप से मैंने यह शब्‍द एक उदाहरण के तौर पर उपयोग किया है, मेरा मकसद सिर्फ यह है कि नौकरीपेशा लोगों को वक्‍त के साथ अपने काम के तरीकों में बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए, लेकिन अपनी मूल छवि को मिटाए बिना ा जरा सोचिए यदि आप वक्‍त के साथ कंप्‍यूटर नहीं सीखते, अंग्रेजी की जानकारी नहीं बढाते, मैनेजमेंट की किताबें नहीं पढते तो क्‍या संस्‍था में नए आयाम पा सकते हैं ा
दूसरी एक और बात सामने आई मेरे कुछ साथियों का कहना है कि पत्रकारतिा के पेशे से जुडा होने के बावजूद मैंने ऐसे शब्‍द का उपयोग किया यह ज्‍यादा बडा अपराध है, इसमें भी मैं एक बात साफ कर देना चाहता हूं मित्रवर आपसे विनम्र अनुरोध है कि यहां पर जो भी लिखा पढा जा रहा है, व नितांत मेरा व्‍यक्तिगत है, इसे मेरे पेशे से जोडकर न पढे, यदि आप पेशे से जोडेग तो मेरे लिखे को आप एक अलग नजरिए से देखेंगे, जो पंकज मुकाती के साथ न्‍याय नहीं करेगा ा आपकी बेबाक राय के लिए धन्‍यवाद ा

Saturday, July 11, 2009

मैं और आप भी प्रोडक्‍ट हैं, अपडेट रहिए

Saturday, July 11, 2009

मैं और आप भी प्रोडक्‍ट हैं, अपडेट रहिए
मैं आज अपनी बात थोडे अलग ढंग से रख रहा हूं, संभव है ज्‍यादातर मनुष्‍यों को यह गलत लगेगीा मेरा मानना है हम सारे नौकरीपेशा लोग एक प्रोडक्‍ट हैा यदि नहीं हैं तो फ‍ि र हम यह क्‍यों कहते है. यार मार्केट वेल्‍यू बनी रहनी चाहिए, आजकल मेरा मार्केट डाउन हैा इस बात को लिखने की प्रेरणा मुझे सुबह अपने अखबार से मिलीा मैंने आज का हिन्‍दुस्‍तान टाईम्‍स उठाया तो उसका पूरा ले आउट व कंटेट बदला हुआ थाा एक अखबार जो अंग्रेजी अखबारों में लगतार आगे बना हुआ है, उसे बदलाव की क्‍या जरूरत ा सीधी से बात है पाठकों को जोडे रखना, मार्केट वेल्‍यू बनाए रखनाासीधी बात यह है कि कोई भी प्रोडक्‍ट या व्‍यक्ति बहुत दिनों तक एक जैसे रंग रूप और तौर तरीकों के साथ बाजार में लीडर नहीं बना रह सकता ा आपको समय समय पर कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए जो बाजार की नजरों में आपको लाए, यानी जिसकी चर्चा हो ा हम जिस मार्केट में हैं वहां सफलता का फार्मूला बहुत दिनों तक गुप्‍त नहीं रह सकताा बाजार में ज्‍यादातर कंपनियां और व्‍यक्ति ऐसे हैं जो दूसरे के कामों की नकल करने में बिल्‍कुल देरी नहीं करते ा संभव है नकल के जरिए वे मूल फार्मूले वाले से भी आगे निकल जाए ानकल के बाजार का सबसे बडा उदाहरण है पानी की बोतलों का धंधाा बिसलरी ने अपनी नीले रैपर वाली बोतल के साथ बाजार में प्रवेश किया, सफलता हासिल की ा देखते ही देखते तमाम कंपनियां बाजार में आई अपनी बोतल की डिजाइन व रैपर का कलर भी नीला ही चुना ये है नकल का बाजार, बिसलरी ने इसे समझा और अपने रैपर का रंग हरा कर दिया ा उस हरे रंग ने बाजार की उस दौड में ऐसा रंग जमाया कि बिसलरी सबसे अलग और सबसे आगे हो गयाा हम जैसे नौकरीपेशा लोगों और कंपनियों दोनों को यह मानकर चलना चाहिए कि सफलता के एक ही फार्मूले से चिपककर आगे नहीं बढा जा सकता ा जरा गौर करिए कोई भी प्रोडक्‍ट तभी तक बाजार में रहता है जब तक वह उपभोक्‍ता की जरूरतें पूरी करता है, तो हम इससे अलग कैसे हैं, हम भी तभी तक किसी भी संस्‍था का हिस्‍सा बने रह सकते हैं जब तक हम उनकी जरूरतों को पूरा करते हैं, जिस तरह हम बेहतर प्रोडक्‍ट की तलाश में बाजार पर नजर रखते हैं, कंपनियां भी बेहतर कर्मचारियों की तलाश में बाजार पर नजर रखती है ा जब हम बेहतर साबुन मिलने पर तीन पीढियों से चला आ रहा लाल साबुन तत्‍काल बदल देते हैं तो कंपनी कर्मचारी क्‍यों न बदलेा ये तो संभव ही नहीं कि आपको लाल साबुन से लगाव है तो आप उसे भी खरीदते रहेंगे एक बार उससे नहाएंगे फिर दूसरे से ाकुल मिलाकर एक बात साफ है इस प्रतिस्‍पर्धा में अपनी वेल्‍यू बनाए रखने के लिए हमें काम और व्‍यावसायिक रिश्‍तों की नई परिभाषा को समझना चाहिए वह यह है कि' कंपनी में मशीनों की तरह हम एक पुर्जा हैं जिसकी न किसी से दोस्‍ती है न दुश्‍मनी इस मशीन का लक्ष्‍य है काम और परिणाम ा हमे एक ऐसे मजबूत प्रोडक्‍ट की तरह बनना होगा जिसके बिना काम ही नहीं चल सकताा आप देखिए कई चीजें ऐसी होती है जो महंगी होने के बावजूद हम दूसरे खर्च कम कर उनका इस्‍तेमाल जारी रखते हैं, जिदंगी में पूछ परख भी ऐसे ही लोगों की होती है जो महंगे होने के बावजूद अपनी उपयोगिता बनाए रखते हैं ा कुछ अलग' इसमें बहुत थोडे अपवाद भी हो सकते हैं, हम कई बार देखते हैं कि बेहतर प्रोडक्‍ट भी मार्केटिंग पैकेजिंग या गलत इस्‍तेमाल की वजह से बाजार में फेल हो जाते हैं, कई बेहतर कर्मचारियों के साथ भी यह हो सकता है, संभव है कंपनी उनकी प्रतिभा को नहीं पहचान सकी हो, या उन्‍हें ऐसे काम सौंप दिए हो जो उनकी प्रतिभा से एकदम अलग हो, जैसे नहाने के साबुन को सफेद शर्ट धोने में इस्‍तेमाल करना ओर कह देना ये साबुन ही खराब है,इसमें साबुन का नहीं इस्‍तेमाल करने वाला का दोष है ा यदि आप ऐसे हालात से भी गुजर रहे हैं तो तत्‍काल अपनी मार्केटिंग करिए और ऐसा मालिक तलाशिए जिसे काम लेने का सलीका आता हो, वरना बाजार हमें नाकाबिल घोषित करने में देर नहीं करेगा ा
Posted by पंकज मुकाती at 5:39 AM 0 comments

Friday, July 10, 2009

कोई भी सफलता मंजिल नहीं होती

इंफोसिस के को फाउंडर नंदन नीलकेणी ने अपनी कंपनी को छोडते वक्‍त जो भाषण दिया वह युवाओं के लिए एक नई ईबारत हैा नीलकेणी ने कहा आज मैं अपनी पहचान खो रहा हूा यानी वे उस संस्‍थान को अलविदा कह रहे थे जिसने उन्‍हें नाम, पैसा और शोहरत दीा अब आप कहेंगे इसमें नया कया है कारपोरेट सेक्‍टर में नौकरियां तो लोग बदलते ही रहते हैंा पर नीलकेणी का साहस है कि वे 28 साल की नौकरी या अपनी पहचान छोडकर हिन्‍दुस्‍तानियों को पहचान देने का काम करने जा रहे हैंा उन्‍हें भारत सरकार ने मतदाता पहचान कार्ड का जिम्‍मा सौंपा हैा
मेरे और आपके जैसे युवाओं के लिए यह किस तरह से प्रेरणादायी है, आइए एक;एक बिंदु से समझते हैं 1 खुद की पहचान जरूरी; जिंदगी में लगातार एक ही काम से आदमी की पहचान सिर्फ एक ही तरीके के काम के एक्‍सपर्ट के रूप में बन जाती है, अक्‍सर हम कहते हैं कंपनी में इतने साल हो गए कंपनी ने बहुत कुछ दिया है, इसे कैसे छोड दें; हममें से ज्‍यादातर लोग कंपनी के पहले सौ लोगें में भी शामिल नहीं रहते पर हम उस कंपनी से ही जुडे रहते है, ज्‍यादा दिन तक एक जैसा काम करने से आपकी पहचान खत्‍म हो जाती है, और पूरी तरह कंपनी की वजह से आप जाने जाते हैा जिंदगी में आदमी को एक बार कंपनी से पहचान से मुक्‍त होकर अपनी खुद की पहचान बनानी चाहिएा शायद इसी लिए कहा गया है कि सूरज को उदय होने के लिए एक बारअस्‍त भी होना पडत है ा
2 कोई भी सफलता अंतिम नहीं . नीलकेणी इंफोसिस के को फांउडर रहे0; किसी भी कंपनी में ये शीर्ष पद होता है, ये पद आपके सपनों की अंतिम उडान या लक्ष्‍य होता है, बावजूद इसके वे इसे छोडकर नए सफर पर निकले इसका मतलब सफलता का मतलब पद ही नहीं हैा आपकी इच्‍छाएं और काम की बैचेनी जब तक है, नई सफलताएं तलाशते रहिएा ओशो' ने शायद इसीलिए लिखा था संतोषी सदा सुखी जैसे शब्‍द हटा देने चाहिए,
3 सुख चुनौतियों में है0; इंफोसिंस जैसे वेल आर्गेनाइज्‍ड समूह कारपोरेट समूह को छोडकर सरकारी दफ़तरों से माथापच्‍ची करना कोई आसान काम नहीं है, पर एक मल्‍टीनेशनल कंपनी और उसके होनहार कर्मचारियों के बीच सफलता हासिल करना कठिन काम नहीं है ा चुनौती है कामचलाऊ रवैये और अकुशल कम्रचारियों के बीच काम कर उनसे काम निकलवाना ा नीलकेणी के लिए सबसे बडी चुनौती यही है ा
4 कंपनी की सफलता में हिस्‍सेदारी मत मांगो; एक बात और हमें दिमाग में बैठा लेनी चाहिए कि कंपनी ने हमें काम के लिए रखा है, हमें काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए और कंपनी की ग्रोथ और उसकी बैलेंसशीट को कभी अपना मानकर उससे चिपक कर जिंदगी गुजारने का नहीं सोचना चाहिएा नीलकेणी के फाउंडर बनने के बाद कंपनी के बाद सात साल में कंपनी के कर्मचारियों की संख्‍या दस हजार से बढकर एक लाख होगई और उसका मुनाफा 808 करोड से बढकर 5980 करोड हो गयाा इसके बाद भी वे नई राह पर निकल पडे, इसके विपरीत हम कंपनी को छोटी मोटी सफलता दिलाने के बाद ही उस पर अपना हक समझते हुए जिंदगी वहीं बिताने का इंतजाम कर लेते हैा कंपनी की नहीं जिंदगी में अपनी पहचान की हिस्‍सेदारी पर ध्‍यान दीजिए को ा कोई भी कंपनी कोई भी सफलता आखरी नहीं हो सकतीा

Wednesday, February 6, 2008

महाराष्ट्र नहीं धृतराष्ट्र राज की मांग

राज ठाकरे ध़ृतराष्ट्र की तरह आंखें बंद क्यों किए हुए हैं जिन उत्तरभारतीयों को वे कोस रहे हैं उसी उत्तर भारत ने देश के शीर्ष पद पर एक मराठी महिला को चुना । उत्तरभारतीयों के वोट से ही प़तिभा पाटिल आज राष्ट्रपति हैं । क्या वे ऎसा चाहते हैं कि लतामंगेशकर को केवल मराठी ही सुने और सचिन केवल मुंबई की टीम में ही खिलाए जाएं । यदि राज की बात का जवाब पूरे देश ने दिया तो सिवाय राख के कुछ नहीं बचेगा । सारे मराठी शीर्ष पदों से खदेड दिए जाएंगे ।

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख और शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे जैसा बनने दिखने की कोशिश में लगे राज ठाकरे के नाम का इस समय बडा हल्ला है । राज ने जय महाराष्ट्र का नारा बुलंद किया । उन्होंने यूपी बिहार के लोगों को महाराष्ट्र के प्रति वफादार रहने की चेतावनी दी है । उन्हें इस बात से भी नाराजगी है कि अमिताभ बच्चन महाराष्ट्र से खाते कमाते हैं तो फिर यूपी में कालेज क्यों खोल रहे हैं वहां का प्रचार प्रसार क्यों करते हैं । राज ने लगभग सारे उत्तरभारतीयों को महाराष्ट्र से चले जाने को कहा है । उनका कहना है महाराष्ट्र में केवल मराठी ही रहेंगे । ९० के दशक में राज जिस तेजी से बाला साहब के उत्तराधिकारी के रुप में उभरे थे पिछले तीन दिनों में ही वे उससे कई गुना तेजी से नीचे गिरे । वे भी बाला साहेब की तरफ दहाडना चाहते हैं ऒर हिंदू शंर की पदवी हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं । ७० के दशक में बाला साहेब ने अपनी राजनीति भी इसी मराठी मुद्दे से शुरु की पर वक्त के साथ वे बदले और महाराष्ट्र से हटकर हिंदू राष्ट् के मुद्दे पर आ गए । उन्होंने अपना दायरा बढाया तभी हिंदुस्तानी शेर कहलाए । इसके बाद उनके बेटे उद्धव ने भी मी मुबंईकर जैसा अभियान चलाया ना कि मी मराठी । फिर राज इस नफरत की आग क्यों भडका रहे हैं । दरअसल यह लडाई मराठी या उत्तरभारती की नहीं राज और उद्धव में कौन बाला साहेब जैसा आक़ामक की है ।

देश में बहुत कुछ बदल चुका है । इस मुद्दे कॊ गंभीरता से देखना होगा दिमाग से समझना होगा ना कि हुडदंग की तरह । इतिहास देखिए हिंदुस्तान में कभी जाति और भाषा की लडाई वाले लंबे समय तक सम्मान के हकदार नहीं रहे थोडे समय में ही वे नफरत के शिकार बने और उनका नामलेवा भी नहीं बचा । खालिस्तान आंदोलन चलाने वाले भिडंरावाले कश्मीर में इस्लामिक शासन की मांग करने वाले और पिछडों के मसीहा बनने की कोशिश में मंडल का हथियार चलाने वाले वीपी सिंह इन तीनों को आज वे लोग भी नहीं पूछ रहे जिनके नाम पर इन्होंने ये आंदोलन खडे किए थे । हमें गर्व है कि हिंदुस्तानियॊं ने हमेशा ऎसे नफरतपरस्तों को बाहर का रास्ता दिखाया है । बाकि सारी बातें छोड दीजिए हिंदुवाद का नारा बुलंद करने वाली भाजपा को देखिए । इस देश में ८० फीसदी हिंदू वोटर होने के बाद भी भाजपा अपने बूते केंद में सरकार नहीं बना सकी । उसे उग्र हिंदूवाद छोडना पडा । उन पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाना स्वीकारना पडा जो कभी हिंदूवादी विचारधारा के समर्थक नहीं रहे। । यदि देश में यह सब चलता तो यहां हिंदू महासभा विश्व हिंदू परिषद भाजपा की सरकारें चलती पर ऎसा नहीं है ऒर यही हमारी ताक है । इस देश में मुस्लिम राष्ट्रपित सिख प़धानमंत्री और देश की सबसे बडी पार्टी की कमान एक एक ऎसी महिला के हाथ में है जो विदेशी है पर है तो हिंदुस्तान की बहू । राज ठाकरे ये क्यां याद नहीं रखते कि देश के शीर्ष पद पर बैठी महिला महाराष्टीयन हैं देश के सबसे बडे खेल किकेट के सर्वेसर्वा भी मराठी है और इन दोनों को उत्तरभारत ने ही चुना है । क्या राज ठाकरे चाहेंगे कि लता मंगेशकर को सिर्फ मराठी ही सुनें सचिन का पूरा देश बहिष्कार कर दे क्योंकि वे मराठी हैं । मुंबई से यदि उत्तरभारतीयों को कुछ घंटे के लिए भी हटा दिया जाए तो पूरा मुंबई किसी गांव से ज्यादा नजर नहीं आएगा । अंबानी अमिताभ पर इतराता मुंबई मिनटों में कंगाल हो जाएगा । अब अमिताभ के यूपी में पैसा लगाने पर राज को एतराज है क्या पुरखों को याद करना गलत है । अपने बचपन को देखना सहेजना गलत है यदि ये गलत है तो िफर विदेशों में बसे भारतीयों से क्यों देशप़ेम की उम्मीद रखते हैं उनसे इंिडया लोटने और यहां पैसा लगाने की मांग करते हैं । राज ठाकरे को संभलना हॊगा उन्हे ध्यान रखना चाहिए कि इतने हंगामें के बाद भी शिवसना कभी महाराष्ट्र में अकेले के दम पर सत्ता हासिल नहीं कर सकी । नफरत की ये चिंगारी एक दिन रिवर्स गियर लगाएगी और राज का पूरा कैरियर राख हो जाएगा । इस देश ने ऎसे कई नफरती दिमागों को खाक किया है । यह आग जल्द बुझेगी मराठी लोगों की प़ेम से भरी दमकलें ही इसे बुझाइएगी । महाराष्ट्र इस राषट्र में महा ही रहेगा नफरत और सत्ता मोह में अंधा कोई भी धृतराष्ट् उसे हिंदूस्तान से अलग नहीं कर पाएगा ।