जिद कुछ कर दिखाने की

जिद कुछ कर दिखाने की

Tuesday, July 28, 2009

मेरे वोट की इज्‍जत रखो, ये बेशर्मी छोडो

आज अखबारों में पीडीपी नेता महबूबा की फोटो देखी उन्‍होने आसंदी का माइक उखाडकर स्‍पीकर पर फेंका, दूसरी तस्‍वीर राजस्‍थान की एक विधायक की है, जिसमें सदन में धक्‍कामुक्‍क्‍ी में उनका हाथ टूट
गयाा अखिल भारतीय जनप्रतिनिधि दंगल के ये सीन देखकर मुझे अपने वोटर होने पर शर्म आई, पर इन बेशर्मो को शरम आती नहीं ा



इस समय मैं एक साथ कई सच का सामना कर रहा हूं, एक तरफ तो टीवी चैनलों पर राखी का स्‍वयंवर, सच का सामना, इस जंगल से हमे बचाओं और दूसरी तरफ मेरे वोट से बनी सरकार के नुमाइंदों की हरकतों काा जहां राखी का स्‍वयंवर खालिस झूठ हैं, वहीं सच का सामना अपने सवालों की अश्‍लीलता के घेरे में हैा जगल के तो कहने ही क्‍या, पर टीवी वाले मुझे ज्‍यादा शर्मिंदा नहीं कर रहे हैं न ही मैं उनसे कोई अनुशासन, शिष्‍टाचार की उम्‍मीद रखता हूं ा उनका तो काम ही है हाइप क्रिएट करना दर्शक जुटाना, पैसा बनाना ा वे उसे ईमानदारी से कर रहे हैं, मुझे खुशी है उनकी कर्म के प्र ति समर्पण पर ा मुझे शर्मिंदा कर रहा है मेरे ही वोट से चुना गया नेता ा उसके सच से मेरा रोज सामना हो रहा है, मुझे अपने चुने पर सोचना पड रहा हैा


चैनल बदलने का तो मेरे पास रिमोट है, पर जिसे चुन लिया उसे पांच साल तक झेलना पडेगा ा उसे मैं कैसे बदल दूं ा मुझे आज की दो घटनाओं ने शर्मसार किया ा दोनो सदन की है ा पहली में जम्‍मू कश्‍मीर विधानसभा में पीडीपी नेता महबूबा मुफ़ती ने आसंदी से माइक उखाड कर स्पीकर पर फेंक दिया ा उसके बाद उन्‍होंने इसे सही बताते हुए स्‍पीकर से माफी मांगने से भी इनकार कर दिया ा दूसरी घटना राजस्‍थान विधानसभा मे हुई जहां हंगामा इतना बढा कि होम मिनिस्‍टर का ब्‍लड प्रेशर बढ गया और सदन में डॉक्‍टरों को बुलाना पडा ा मार्शल से धक्‍कामुक्‍की में विधायक गिर गए तो एक महिला विधायक के हाथ में फ्रेक्‍चर हो गया ा क्‍या हमने इन्‍हें सदन में इसलिए भेजा कि ये हमें इसी तरह से लजाएं, हमने वोट राज्‍य निर्माण के लिए दिए है, और उसका इस्‍तेमाल गरिमा के विध्‍वंस के लिए हो रहा है ा मुझे शर्म आती है इनके चुनाव पर ा ऐसे नेता चुनने के लिए मैं खुद को दोषी मानता हूं, और हर आम आदमी को अपने चयन पर विचार करना चाहिए ा
भारतीय जनप्रतिनिधि दंगल और हिन्‍दुस्‍तानी सदन के अखाडे में ऐसी कुश्तियां नई नहीं है, पहले भी उत्‍तरप्रदेश और बिहार में ऐसी फेंका फाकी होती रही है ा उत्‍तर प्रदेश में तो ऐसी कोई सदन में नहीं बची जो स्‍पीकर की तरफ उछाली न गई हो ा बिहार के राज्‍यपाल को तो राबडीदेवी ने लंगडा तक कह डाला था ा दूसरी तरफ दिल्‍ली में यही संस्‍कारों के कर्ताधर्ता सदन में सच का सामना और बालिका वधू जैसे सीरियल बंद करने की आवाज उठा रहे हैं, उनका कहना है ये सीरियल हमारी युवा पीढी पर गलत असर डाल रहे हैं ा क्‍या इन्‍हें ऐसे सवाल उठाने का हक है, क्‍या इनके कर्मो से युवाओं को नैतिकता हासिल हो रही है ा पूरे देश के अखबारों में इनकी हरकतों की तस्‍वीरें छपी हैं, पर शर्म इन्‍हें आती नहींा

Friday, July 24, 2009

सच यानी सेक्‍स का सामना

क्‍या आप किसी पराए मर्द से शारीरिक संबंध बना सकती हैं, यदि आपके पति को पता न चले तो ?
क्‍या आपने कभी किसी महिला को अपना बच्‍चा गिराने के लिए कहा है ?
क्‍या आप ने अपनी बेटी से कम उम्र की महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं ?
क्‍या आप नाबालिग उम्र में अवैध संबंधों से गर्भवती हो गई ?
क्‍या आप लडकियों को किस करने लेडिज टायलेट में घुस जाया करते थे ?

आपको लग रहा होगा मैं कोई सी ग्रेड की एडल्‍ट मूवी की स्किप्‍ट लिख रहा हूं, या किसी अश्‍लील मैगजीन की कहानियों के विषय तैयार कर रहा हूंा नहीं, ये तो हिन्‍दुस्‍तान के करोडों घरों के बैठक रूम से गूंजती आवाजें हैं, दो सप्‍ताह से लाखों लोग परिवार के साथ टीवी पर इसे देख रहे हैं ा स्‍टार प्‍लस पर सच का सामना में परिवारों का सामना हुआ सिर्फ सेक्‍स से ा चूंकि सच आजकल बडी मुश्किल से सुनने को मिलता है, इसलिए बडी संख्‍या में लोग टीवी के सामने बैठ गए, उन्‍हें लगा गांधीजी, गौतम बुद़ध, महावीर या ईसा मसीह की तरह कोई सच का नया प्रयोग सामने आएगा, सच की सीख मिलेगी और कई बडे लोग अपनी जिंदगी की गलतियों को कबूल कर साहस दिखाएंगे ा पर बडी निराशा हाथ लगी, ऐसा सच जिसे सुनकर वे दाएं बांए झांकते हैंा

एक और बात शर्मिंदगी व मुंह छिपा लेने वाले उन सवालों के जवाब भी सामना करने वाला ऐसे सीना तानकर देता है मानो कोई तमगा हासिल किया हो ा उससे भी बढकर ऐसे कारनामों पर सामने बैठी उनकी मां, पत्‍नी और दोस्‍त भी ताली बजात हैं, मानो कह रहे हो वाह बेटा नाम रोशन कर दियाा एक ऐसा समाज जहां अस्‍सी फीसदी लोग आज भी अपनी पसंद की शादी की बात मां बाप से करने में शरमाते है, परिवार के सामने पत्नि के साथ एक सोफे पर बैठने में संकोच करते है, उस परिवेश में पति या पत्नि या बेटे की ऐसी लज्‍जाजनक स्‍वीकारोक्ति पर तालियां पीटना क्‍या कहा जाए ा

सच के इस खेल में ऐसे ही सवाल क्‍यों चुने जा रहे हैा, समझ से परे है, कांबली से बेडरूम के अलावा मैदान के तो उर्वशी ढोलकिया से सैक्‍स, शराब के अलावा उनके सीरियलों के रोल हथियाने पर और आल्विन डिसिल्‍वा जैसे मार्केटंिग एक्‍जिक्‍यूटिव से उसकी जिंदगी के दूसरे पहलू पर भी बात की जा सकती है ा यह सच समाज को नई दिशा देने के बजाए भटकाएगा ा पति पत्‍नी एक दूसरे को शक की निगाह से देखने लगेंगेा बच्‍चे मां बाप की सुनना बंद कर देंगे ा सबसे बढकर यह कार्यक्रम लोगों के बीच खासकर नई पीढी को यह संदेश देगा कि एक से अधिक औरतों से सबंध रखना गलत नहीं, देखिए इतने लोग ऐसे संबंध रखते है, टीवी में उन्‍होंने खुद स्‍वीकारा है, तो हम क्‍यों पीछे रहेंा संभव है कुछ दिनों बात ज्‍यादातर लोग ऐसे सबंधों का सडकों पर खुलासा करते फिरें, युवाओं को मौका मिलेगा यह कहने का कि हिंदुस्‍तानी समाज में भी यह सब जायज है ा क्‍या हम आने वाली पीढी को यह सीखा रहे है कि देखों गलत काम कोई भी करो पर उसको स्‍वीकार लो तो प्रायश्चित हो जाएगाा
धर्मग्रंथों ने भी हमें सीख दी है सच को स्‍वीकारो, सच को स्‍वीकारने से पाप धुल जाते हैं, पर सच को स्‍वीकारने के भी कुछ कायदे उनमें शामिल हैं ा हर काम का एक सलीका होता है ा हम कई गलत काम करते हैं, उसका प्रायश्चित या तो धर्मस्‍थल पर जाकर प्रभु के सामने करते हैं या जिसके साथ गलत काम किया उससे माफी मांगते है ा एक नियम यह भी है कि ऐसा सच जो किसी की जिंदगी को खतरे में डाल दे समाज के लिए संकट पैदा कर दे न बोला जाए तो ही बेहतर है ा सच हमेशा भलाई के लिए बोला जाता है, हम चर्च में फादर के सामने कन्‍फेस करते हैं, वह बात फादर और हमारे बीच खत्‍म हो जाती है कभी सुना है कि किसी फादर ने चर्च के बाहर किसी का सच उजागर कर दिया होा सच इतनी चकाचौंध से सार्वजनिक न किए जाए कि वे अपने पीछे घना अंधेरा छोड जाएं ा सच की स्‍वीकारोक्ति के पीछे प्रायश्चित हो केवल पैसा कमाने की लालसा न हो तभी वह सच हैा ऐसे गरिमाविहीन सच से तो सफेद झूठ अच्‍छा ा

Sunday, July 12, 2009

बुरा न मानिए, प्रोडक्‍ट तो एक उदाहरण है

मेरे कल की पोस्‍ट में नौकरीपेशा लोगों को प्रोडक्‍ट लिखने पर काफी लोग नाराज हैं, उनका कहना है कि ऐसा नहीं लिखना चाहिए, मान्‍यवर मैं एक बात साफ करना चाहता हूं कि मेरा आशय प्रोडक्‍ट से कोई वस्‍तु नहीं था, मूलरूप से मैंने यह शब्‍द एक उदाहरण के तौर पर उपयोग किया है, मेरा मकसद सिर्फ यह है कि नौकरीपेशा लोगों को वक्‍त के साथ अपने काम के तरीकों में बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए, लेकिन अपनी मूल छवि को मिटाए बिना ा जरा सोचिए यदि आप वक्‍त के साथ कंप्‍यूटर नहीं सीखते, अंग्रेजी की जानकारी नहीं बढाते, मैनेजमेंट की किताबें नहीं पढते तो क्‍या संस्‍था में नए आयाम पा सकते हैं ा
दूसरी एक और बात सामने आई मेरे कुछ साथियों का कहना है कि पत्रकारतिा के पेशे से जुडा होने के बावजूद मैंने ऐसे शब्‍द का उपयोग किया यह ज्‍यादा बडा अपराध है, इसमें भी मैं एक बात साफ कर देना चाहता हूं मित्रवर आपसे विनम्र अनुरोध है कि यहां पर जो भी लिखा पढा जा रहा है, व नितांत मेरा व्‍यक्तिगत है, इसे मेरे पेशे से जोडकर न पढे, यदि आप पेशे से जोडेग तो मेरे लिखे को आप एक अलग नजरिए से देखेंगे, जो पंकज मुकाती के साथ न्‍याय नहीं करेगा ा आपकी बेबाक राय के लिए धन्‍यवाद ा

Saturday, July 11, 2009

मैं और आप भी प्रोडक्‍ट हैं, अपडेट रहिए

Saturday, July 11, 2009

मैं और आप भी प्रोडक्‍ट हैं, अपडेट रहिए
मैं आज अपनी बात थोडे अलग ढंग से रख रहा हूं, संभव है ज्‍यादातर मनुष्‍यों को यह गलत लगेगीा मेरा मानना है हम सारे नौकरीपेशा लोग एक प्रोडक्‍ट हैा यदि नहीं हैं तो फ‍ि र हम यह क्‍यों कहते है. यार मार्केट वेल्‍यू बनी रहनी चाहिए, आजकल मेरा मार्केट डाउन हैा इस बात को लिखने की प्रेरणा मुझे सुबह अपने अखबार से मिलीा मैंने आज का हिन्‍दुस्‍तान टाईम्‍स उठाया तो उसका पूरा ले आउट व कंटेट बदला हुआ थाा एक अखबार जो अंग्रेजी अखबारों में लगतार आगे बना हुआ है, उसे बदलाव की क्‍या जरूरत ा सीधी से बात है पाठकों को जोडे रखना, मार्केट वेल्‍यू बनाए रखनाासीधी बात यह है कि कोई भी प्रोडक्‍ट या व्‍यक्ति बहुत दिनों तक एक जैसे रंग रूप और तौर तरीकों के साथ बाजार में लीडर नहीं बना रह सकता ा आपको समय समय पर कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए जो बाजार की नजरों में आपको लाए, यानी जिसकी चर्चा हो ा हम जिस मार्केट में हैं वहां सफलता का फार्मूला बहुत दिनों तक गुप्‍त नहीं रह सकताा बाजार में ज्‍यादातर कंपनियां और व्‍यक्ति ऐसे हैं जो दूसरे के कामों की नकल करने में बिल्‍कुल देरी नहीं करते ा संभव है नकल के जरिए वे मूल फार्मूले वाले से भी आगे निकल जाए ानकल के बाजार का सबसे बडा उदाहरण है पानी की बोतलों का धंधाा बिसलरी ने अपनी नीले रैपर वाली बोतल के साथ बाजार में प्रवेश किया, सफलता हासिल की ा देखते ही देखते तमाम कंपनियां बाजार में आई अपनी बोतल की डिजाइन व रैपर का कलर भी नीला ही चुना ये है नकल का बाजार, बिसलरी ने इसे समझा और अपने रैपर का रंग हरा कर दिया ा उस हरे रंग ने बाजार की उस दौड में ऐसा रंग जमाया कि बिसलरी सबसे अलग और सबसे आगे हो गयाा हम जैसे नौकरीपेशा लोगों और कंपनियों दोनों को यह मानकर चलना चाहिए कि सफलता के एक ही फार्मूले से चिपककर आगे नहीं बढा जा सकता ा जरा गौर करिए कोई भी प्रोडक्‍ट तभी तक बाजार में रहता है जब तक वह उपभोक्‍ता की जरूरतें पूरी करता है, तो हम इससे अलग कैसे हैं, हम भी तभी तक किसी भी संस्‍था का हिस्‍सा बने रह सकते हैं जब तक हम उनकी जरूरतों को पूरा करते हैं, जिस तरह हम बेहतर प्रोडक्‍ट की तलाश में बाजार पर नजर रखते हैं, कंपनियां भी बेहतर कर्मचारियों की तलाश में बाजार पर नजर रखती है ा जब हम बेहतर साबुन मिलने पर तीन पीढियों से चला आ रहा लाल साबुन तत्‍काल बदल देते हैं तो कंपनी कर्मचारी क्‍यों न बदलेा ये तो संभव ही नहीं कि आपको लाल साबुन से लगाव है तो आप उसे भी खरीदते रहेंगे एक बार उससे नहाएंगे फिर दूसरे से ाकुल मिलाकर एक बात साफ है इस प्रतिस्‍पर्धा में अपनी वेल्‍यू बनाए रखने के लिए हमें काम और व्‍यावसायिक रिश्‍तों की नई परिभाषा को समझना चाहिए वह यह है कि' कंपनी में मशीनों की तरह हम एक पुर्जा हैं जिसकी न किसी से दोस्‍ती है न दुश्‍मनी इस मशीन का लक्ष्‍य है काम और परिणाम ा हमे एक ऐसे मजबूत प्रोडक्‍ट की तरह बनना होगा जिसके बिना काम ही नहीं चल सकताा आप देखिए कई चीजें ऐसी होती है जो महंगी होने के बावजूद हम दूसरे खर्च कम कर उनका इस्‍तेमाल जारी रखते हैं, जिदंगी में पूछ परख भी ऐसे ही लोगों की होती है जो महंगे होने के बावजूद अपनी उपयोगिता बनाए रखते हैं ा कुछ अलग' इसमें बहुत थोडे अपवाद भी हो सकते हैं, हम कई बार देखते हैं कि बेहतर प्रोडक्‍ट भी मार्केटिंग पैकेजिंग या गलत इस्‍तेमाल की वजह से बाजार में फेल हो जाते हैं, कई बेहतर कर्मचारियों के साथ भी यह हो सकता है, संभव है कंपनी उनकी प्रतिभा को नहीं पहचान सकी हो, या उन्‍हें ऐसे काम सौंप दिए हो जो उनकी प्रतिभा से एकदम अलग हो, जैसे नहाने के साबुन को सफेद शर्ट धोने में इस्‍तेमाल करना ओर कह देना ये साबुन ही खराब है,इसमें साबुन का नहीं इस्‍तेमाल करने वाला का दोष है ा यदि आप ऐसे हालात से भी गुजर रहे हैं तो तत्‍काल अपनी मार्केटिंग करिए और ऐसा मालिक तलाशिए जिसे काम लेने का सलीका आता हो, वरना बाजार हमें नाकाबिल घोषित करने में देर नहीं करेगा ा
Posted by पंकज मुकाती at 5:39 AM 0 comments

Friday, July 10, 2009

कोई भी सफलता मंजिल नहीं होती

इंफोसिस के को फाउंडर नंदन नीलकेणी ने अपनी कंपनी को छोडते वक्‍त जो भाषण दिया वह युवाओं के लिए एक नई ईबारत हैा नीलकेणी ने कहा आज मैं अपनी पहचान खो रहा हूा यानी वे उस संस्‍थान को अलविदा कह रहे थे जिसने उन्‍हें नाम, पैसा और शोहरत दीा अब आप कहेंगे इसमें नया कया है कारपोरेट सेक्‍टर में नौकरियां तो लोग बदलते ही रहते हैंा पर नीलकेणी का साहस है कि वे 28 साल की नौकरी या अपनी पहचान छोडकर हिन्‍दुस्‍तानियों को पहचान देने का काम करने जा रहे हैंा उन्‍हें भारत सरकार ने मतदाता पहचान कार्ड का जिम्‍मा सौंपा हैा
मेरे और आपके जैसे युवाओं के लिए यह किस तरह से प्रेरणादायी है, आइए एक;एक बिंदु से समझते हैं 1 खुद की पहचान जरूरी; जिंदगी में लगातार एक ही काम से आदमी की पहचान सिर्फ एक ही तरीके के काम के एक्‍सपर्ट के रूप में बन जाती है, अक्‍सर हम कहते हैं कंपनी में इतने साल हो गए कंपनी ने बहुत कुछ दिया है, इसे कैसे छोड दें; हममें से ज्‍यादातर लोग कंपनी के पहले सौ लोगें में भी शामिल नहीं रहते पर हम उस कंपनी से ही जुडे रहते है, ज्‍यादा दिन तक एक जैसा काम करने से आपकी पहचान खत्‍म हो जाती है, और पूरी तरह कंपनी की वजह से आप जाने जाते हैा जिंदगी में आदमी को एक बार कंपनी से पहचान से मुक्‍त होकर अपनी खुद की पहचान बनानी चाहिएा शायद इसी लिए कहा गया है कि सूरज को उदय होने के लिए एक बारअस्‍त भी होना पडत है ा
2 कोई भी सफलता अंतिम नहीं . नीलकेणी इंफोसिस के को फांउडर रहे0; किसी भी कंपनी में ये शीर्ष पद होता है, ये पद आपके सपनों की अंतिम उडान या लक्ष्‍य होता है, बावजूद इसके वे इसे छोडकर नए सफर पर निकले इसका मतलब सफलता का मतलब पद ही नहीं हैा आपकी इच्‍छाएं और काम की बैचेनी जब तक है, नई सफलताएं तलाशते रहिएा ओशो' ने शायद इसीलिए लिखा था संतोषी सदा सुखी जैसे शब्‍द हटा देने चाहिए,
3 सुख चुनौतियों में है0; इंफोसिंस जैसे वेल आर्गेनाइज्‍ड समूह कारपोरेट समूह को छोडकर सरकारी दफ़तरों से माथापच्‍ची करना कोई आसान काम नहीं है, पर एक मल्‍टीनेशनल कंपनी और उसके होनहार कर्मचारियों के बीच सफलता हासिल करना कठिन काम नहीं है ा चुनौती है कामचलाऊ रवैये और अकुशल कम्रचारियों के बीच काम कर उनसे काम निकलवाना ा नीलकेणी के लिए सबसे बडी चुनौती यही है ा
4 कंपनी की सफलता में हिस्‍सेदारी मत मांगो; एक बात और हमें दिमाग में बैठा लेनी चाहिए कि कंपनी ने हमें काम के लिए रखा है, हमें काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए और कंपनी की ग्रोथ और उसकी बैलेंसशीट को कभी अपना मानकर उससे चिपक कर जिंदगी गुजारने का नहीं सोचना चाहिएा नीलकेणी के फाउंडर बनने के बाद कंपनी के बाद सात साल में कंपनी के कर्मचारियों की संख्‍या दस हजार से बढकर एक लाख होगई और उसका मुनाफा 808 करोड से बढकर 5980 करोड हो गयाा इसके बाद भी वे नई राह पर निकल पडे, इसके विपरीत हम कंपनी को छोटी मोटी सफलता दिलाने के बाद ही उस पर अपना हक समझते हुए जिंदगी वहीं बिताने का इंतजाम कर लेते हैा कंपनी की नहीं जिंदगी में अपनी पहचान की हिस्‍सेदारी पर ध्‍यान दीजिए को ा कोई भी कंपनी कोई भी सफलता आखरी नहीं हो सकतीा