जिद कुछ कर दिखाने की

जिद कुछ कर दिखाने की

Friday, July 10, 2009

कोई भी सफलता मंजिल नहीं होती

इंफोसिस के को फाउंडर नंदन नीलकेणी ने अपनी कंपनी को छोडते वक्‍त जो भाषण दिया वह युवाओं के लिए एक नई ईबारत हैा नीलकेणी ने कहा आज मैं अपनी पहचान खो रहा हूा यानी वे उस संस्‍थान को अलविदा कह रहे थे जिसने उन्‍हें नाम, पैसा और शोहरत दीा अब आप कहेंगे इसमें नया कया है कारपोरेट सेक्‍टर में नौकरियां तो लोग बदलते ही रहते हैंा पर नीलकेणी का साहस है कि वे 28 साल की नौकरी या अपनी पहचान छोडकर हिन्‍दुस्‍तानियों को पहचान देने का काम करने जा रहे हैंा उन्‍हें भारत सरकार ने मतदाता पहचान कार्ड का जिम्‍मा सौंपा हैा
मेरे और आपके जैसे युवाओं के लिए यह किस तरह से प्रेरणादायी है, आइए एक;एक बिंदु से समझते हैं 1 खुद की पहचान जरूरी; जिंदगी में लगातार एक ही काम से आदमी की पहचान सिर्फ एक ही तरीके के काम के एक्‍सपर्ट के रूप में बन जाती है, अक्‍सर हम कहते हैं कंपनी में इतने साल हो गए कंपनी ने बहुत कुछ दिया है, इसे कैसे छोड दें; हममें से ज्‍यादातर लोग कंपनी के पहले सौ लोगें में भी शामिल नहीं रहते पर हम उस कंपनी से ही जुडे रहते है, ज्‍यादा दिन तक एक जैसा काम करने से आपकी पहचान खत्‍म हो जाती है, और पूरी तरह कंपनी की वजह से आप जाने जाते हैा जिंदगी में आदमी को एक बार कंपनी से पहचान से मुक्‍त होकर अपनी खुद की पहचान बनानी चाहिएा शायद इसी लिए कहा गया है कि सूरज को उदय होने के लिए एक बारअस्‍त भी होना पडत है ा
2 कोई भी सफलता अंतिम नहीं . नीलकेणी इंफोसिस के को फांउडर रहे0; किसी भी कंपनी में ये शीर्ष पद होता है, ये पद आपके सपनों की अंतिम उडान या लक्ष्‍य होता है, बावजूद इसके वे इसे छोडकर नए सफर पर निकले इसका मतलब सफलता का मतलब पद ही नहीं हैा आपकी इच्‍छाएं और काम की बैचेनी जब तक है, नई सफलताएं तलाशते रहिएा ओशो' ने शायद इसीलिए लिखा था संतोषी सदा सुखी जैसे शब्‍द हटा देने चाहिए,
3 सुख चुनौतियों में है0; इंफोसिंस जैसे वेल आर्गेनाइज्‍ड समूह कारपोरेट समूह को छोडकर सरकारी दफ़तरों से माथापच्‍ची करना कोई आसान काम नहीं है, पर एक मल्‍टीनेशनल कंपनी और उसके होनहार कर्मचारियों के बीच सफलता हासिल करना कठिन काम नहीं है ा चुनौती है कामचलाऊ रवैये और अकुशल कम्रचारियों के बीच काम कर उनसे काम निकलवाना ा नीलकेणी के लिए सबसे बडी चुनौती यही है ा
4 कंपनी की सफलता में हिस्‍सेदारी मत मांगो; एक बात और हमें दिमाग में बैठा लेनी चाहिए कि कंपनी ने हमें काम के लिए रखा है, हमें काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए और कंपनी की ग्रोथ और उसकी बैलेंसशीट को कभी अपना मानकर उससे चिपक कर जिंदगी गुजारने का नहीं सोचना चाहिएा नीलकेणी के फाउंडर बनने के बाद कंपनी के बाद सात साल में कंपनी के कर्मचारियों की संख्‍या दस हजार से बढकर एक लाख होगई और उसका मुनाफा 808 करोड से बढकर 5980 करोड हो गयाा इसके बाद भी वे नई राह पर निकल पडे, इसके विपरीत हम कंपनी को छोटी मोटी सफलता दिलाने के बाद ही उस पर अपना हक समझते हुए जिंदगी वहीं बिताने का इंतजाम कर लेते हैा कंपनी की नहीं जिंदगी में अपनी पहचान की हिस्‍सेदारी पर ध्‍यान दीजिए को ा कोई भी कंपनी कोई भी सफलता आखरी नहीं हो सकतीा

8 comments:

Ritu Mishra said...

baht dino ke bad laga aap samne khade hokar bol rahe hain. ya koi meeting le rah hain. ham log jis ghatna ko aam samajhkar nazar andazz kar dete hain uska is tarah vishleshan padh kar achchha laga. Waise bhi jab tak pahchan hai tabhi tak astitva hai dunia main varna lakhon log aae gae ho jate hain. aur apane wajood ko banae rakhne ka hunar har koi nahi janta.

sonal said...

Hi sIr..!! Wat a analytical view!! This was such an event on which we jst read, watched or talked abt it superficially..bt cudnt get into itz real meaning n msg that was silently being conveyed ..Thnx 4 giving us a view to look at life n making us able to understand things..!!! i also appreciate ur way of writing.. it really touches our heart..!!
I wanna mention 3 quotes (really liked)which u gave in this post:
- jyada din tak ek jaisa kaam karne par aapki pehchan khatam ho jati hai..aap puri tarah se company ki wajah se jane jaate hai..
- Safalta ka matlab pad nahi hai ..
- Company ki nahi Zindgi mein apni pehchan ki hissedari par dhayan dijiye..
.......... ITZ INDORE TEAM MiSSiNG U sIr..!!!
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Anonymous said...

lambe samay baat aapko padha accha lage roj likhiya ise bahane aap se mulakat bhi hoti rahegi..
kapil

अजित वडनेरकर said...

प्रियवर,
ब्लागलेखन में सातत्य, निरंतरता बेहद ज़रूरी है। उम्मीद है, इसे कायम रखोगे।

सफलता चंद मूलभूत नैतिकताओं पर निर्भर है मसलन मेहनत, ईमानदारी,सच्चरित्रता, समय की पाबंदी, दूरदर्शिता वगैरह-वगैरह। मगर कई बार इनके बावजूद नहीं मिलती। सफलता मिलने के बाद ही कोई व्यक्ति अथवा संस्था सफलता प्राप्ति का अपना दर्शन, व्याकरण या सिद्धांत रचती है।

जाहिर है कि 100 फीसद सफलता के लिए उपरोक्त नैतिकताओं के अलावा उस तत्व की भी ज़रूरत होती है जिसे पाना आपके हाथ में नहीं होता। जो अनायास मिलता है। यूं मिलता है कि आप भौचक्के रह जाते हैं। उस रास्ते पर मिलता है जहां से उसके आने की उम्मीद नहीं थी।

दुनिया का कोई मैनेजमेंट स्कूल सफलता के इस तथाकथित अदृश्य तत्व के बारे में कुछ नहीं बता सकता। यह बहुत कुछ सकारात्मक दृष्टिकोण जैसा है, मगर है नहीं। यह उससे भी अधिक आस्था से मिलता जुलता है, मगर पूरी तरह से वह भी नहीं है। यह काफी कुछ भाग्य से मिलता-जुलता है, पर उसका अनुमान लगाना कठिन है। भाग्य क्या है? मेरे लिए तय मेरा हिस्सा (भाग)। उससे ज्यादा नहीं मिलेगा। इसी तरह तथाकथित सफलता भी किन्हीं लोगों का भाग्य है। बाकी छोटी-बड़ी सफलता सबके हिस्से में आती हैं। उन पर हमें गर्व करते आना चाहिए। हर कोई इंफोसिस, बिड़ला या रिलायंस का नियंता नहीं बन सकता।

शुभकामनाएं

varsha said...

vah pankajji aap to management 'fun' ke mahir jaan padte hain.

pradeep parihar said...

सर , आपने सही कहा , एक जैसा काम करने से आपकी पहचान खत्म हो जाती है ।
आपने जो क्लास में टिप्स दिए तो आज तक काम आ रहे है ,

pradeep parihar said...

सर , आपने सही कहा , एक जैसा काम करने से आपकी पहचान खत्म हो जाती है ।
आपने जो क्लास में टिप्स दिए तो आज तक काम आ रहे है ,

Unknown said...

ritu mishra ne jo bola me us se me ekdum sahmat hu mera bhi yahi manana hai ki jis tarah hum hawa ki wajah se is duniya me hai usi tarah bina wajood ke hamara jivan adhura hai