जिद कुछ कर दिखाने की

जिद कुछ कर दिखाने की

Wednesday, January 12, 2011

उठो, कल हमारा है


उठो, कल हमारा है
हिंदुस्तान इस वक्त दुनिया का सबसे युवा देश है। लगभग पचपन करोड़ युवा। यानी तेरह से 35 साल की आबादी वाला समूह। यह समूह दुनिया का सबसे तेज, ताकतवर, ऊर्जावान और कामयाबी की और बढ़ता समूह है। जापान को गणित, अमेरिका को टेक् नॉलाजी तो अंग्रेजों को डॉक्टरी की दुनिया में भी हमारे युवा पछाड़ चुके हैं। एक दशक पहले तक जापान गणित में अव्वल था तो अब हम हैं। हमारे युवा जितनी तेजी से पहाड़े याद रखते हैं वह किसी के बस की बात नहीं। बड़ी से बड़ी संख्या का गुणा वे चुटकी बजाते कर देते हैं। बिना मशीनी सहायता के। अमेरिकी राष्टï्रपति बार-बार अपनी आबादी को चेता रहे हैं। संभलो, भारतीय युवा आ रहे हैं। अपनी नौकरी बचाओ, ज्ञान बढ़ाओ। यानी हमारे युवाओं की बुद्घि को सब जान, मान रहे हैं। वे सम्मान हासिल कर रहे हैं। ये पचपन करोड़ युवा सिर्फ संख्या नहीं है। ये है ऊर्जा के भंडार। देश को रोशन करने वाले लैम्प। एक तरह से ये नये एंग्री यंग मैन हैं जो भारत को नई ऊंचाई देंगे। अमिताभ बच्चन का फिल्मी एंग्री यंग मैन वाला किरदार थोड़ा निगेटिव था। वह सत्ता को उखाड़ फेंकने को तत्पर रहता था। पर हमारे युवा सत्ता को उखाड़ फेंकने के बजाए सिस्टम को बदलने की
तरफ बढ़ रहे हैं। वे पुराने ढर्रों से बाहर निकल रहे हैं।
आज की युवा पीढ़ी का न कोई रोल मॉडल है, न वे किसी के जैसा बनना चाहते हैं। वे सिर्फ और सिर्फ जो खुद हैं वही बनना चाहते हैं। वे राहुल गांधी के भाषणों पर ताली पीट सकते हैं, धोनी से सीख सकते हैं, साइना नेहवाल से कुछ नया हासिल कर लेंगे। पर वे इनमें से किसी की कापी नहीं बनेंगे। वे अपनी पहचान खुद बना रहे हैं। उन्हें रोल मॉडल की कोई जरूरत नहीं है। वे इस समाज में अपना रोल खुद लिख रहे हैं। वे एंग्री हैं पर अपनी जगह बनाने के लिए। उनका गुस्सा एक जुनून एक ऊर्जा है। उनमें एक तड़प है कुछ कर दिखाने की। इसके उदाहरण सैकड़ों हैं। एक बस ड्राइवर के बेटे सुशील कुमार ने अपने पसीने से कुश्ती के एरिना में नई कहानी लिखी। वहीं रिक् शा चालक की बेटी दीपिका कुमारी ने तीरंदाजी में जीत का निशाना लगाया। इन युवाओं का एक ही फलसफा है- समझौता नहीं करना, जो दिल कहे वो करो, जो दिमाग को ठीक लगे उस राह पर चलो और कामयाबी जब तक न मिल जाए चलते रहो। थककर बैठना इन्होंने नहीं सीखा। वे जो भी सीख रहे हैं अपनी गलतियों से।
दिमाग पर ऐसा कोई बोझ नहीं रखना चाहते कि मेरा मन ये था पर मैंने वो कर लिया। ऐसे युवाओं मे हैं देश के रूपए को चिन्ह देने वाले उदय कुमार। फार्मूला वन रेस के विजेता करुण चंडोक। 26 साल की उम्र में संसद में पहुंचने वाले हमीदुल्ला सईद। 33 की उम्र में मैक्स मोबाइल जैसी कंपनी खड़ी करने वाले अजय अग्रवाल। कश्मीर के दर्द पर कफ्र्यू नाइट जैसी किताब लिखने वाले 34 साल के बशरत पीर। 15 साल की उम्र में 32 घंटे लगातार वायलिन बजाकर गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में स्थान बनाने वाली अथिरा कृष्णा। देश में ऐसे होनहार युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है।

आर्थिक उदारीकरण के बाद जन्मी इस पीढ़ी में जिम्मेदारी का भाव है। वह तकनीकी ज्ञान के साथ सामाजिक सरोकार भी समझती है। वोट की कीमत और नौकरी के पीछे दौडऩे के बजाय अपना खुद का कारोबार करने में यकीन रखती है। अभी तो देखिए 2015 तक ये गुस्सा और जुनून कैसे देश की किस्मत संवार देगा। उस वक्त हमारी कुल युवा आबादी का लगभग 75 फीसदी शिक्षित होगा। युवाओं के इस जज्बे को समझते हुए गांधीजी ने
उन्हें समाज और इतिहास बदलने की क्षमता रखने वाला बताया। शिवाजी सावंत की मृत्युजंय में युवाओं की पहचान के कुछ आधार दिए गए है।आज का भारतीय युवा उन मानदंडों पर पूरा खरा उतरता है। आइए सिलसिलेवार उन आधारों को जानें-
- पुरूषार्थ-पुरुषार्थ थोड़ा सा ही क्यों न हो। यह हजार बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। बातों से भावनाएं जाग सकती है किंतु उस सिद्घांत की अनुभूति के लिए पुरुषार्थ नहीं किया गया तो समझो समय और भावना बेकार नष्टï हुई। अर्जुन ने मछली की आंख के प्रतिबिंब पर ही ध्यान केंद्रित किया, तीर छोड़ा और स्वयंवर की शर्त पूरी कर ली। द्रोपदी को प्राप्त किया। यहां बाण पुरुषार्थ का, मछली लक्ष्य का प्रतीक है।
- निर्भयता- निर्भयता युवा के जीवन संगीत का सबसे उंचा स्वर है। इस स्वर की बेसुरी और बिखरी हुई ध्वनि है भय। जग ऊंचे स्वर की तान सुनने को उत्सुक होता है, फटी हुई आवाज नहीं। साहस और खेल में कामयाबी केलिए एटीकेटी नहीं चलती, असफल होने के डर से भागने के बजाय , साहस के साथ डटे रहें, सफलता आपके सामने होगी।
-अभिमान- ये है युवावस्था की आत्मा। जिस मनुष्य में श्रद्घा नहीं है, वह मनुष्य नही है। और जिस युवा में अभिमान नहीं है, वह युवा नहीं है।
- महत्वकांक्षा-ये हर युवा का स्थायी भाव है। मैं महान बनूंगा। परिस्थिति के मस्तक पर पैर रखकर मैं उसे झुका दूंगा। यह विचारधारा ही युवा को ऊँचा उठाती है। जीवन में असफल होने का बड़ा कारण लक्ष्य का न होना है। स्वयं को जानो सुकारात का यह कथन ही जिंदगी बदलने को काफी है।
-उदारता- उदारता युवावस्था का अलंकार है। अपनी शक्ति का अन्य दुर्बलों के संरक्षण में उपयोग। स्वयं जीवित रहकर दुसरों को जीने का अमूल्य साधन।
आज का भारतीय युवा इन सभी कसौटयों पर खरा उतरता है। ऐसे युवाओं के जोश से भरे हिंदुस्तान को कोई नहीं रोक सकता। साथियों उठो, आगे बढ़ो कल हमारा है।

Thursday, January 6, 2011

सातवीं पास किसान ने खोजा 'गुणा' का आसान फार्मूला




हरियाणा/कैथल. गांव सौंगल के महज सातवीं पास किसान लछमन सिंह ने गुणा करने का आसान तरीका ढूंढ निकाला है। उसके फार्मूला से विद्यार्थी जल्द गुणा करना सीख जाते हैं। लछमन इसकी सीडी तैयार स्कूलों में वितरित करेगा। उसकी खोज जल्द ही पेटेंट होने वाली है। बुधवार को लछमन ने राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय कैथल में दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों को मौखिक रूप से बड़ी गुणा करने के गुर सिखाए। उन्होंने बाकायदा ब्लैक बोर्ड पर भी विद्यार्थियों को गुणा करके दिखाई और मौखिक रूप से भी गुणा की। सभी विद्यार्थी लछमन के गुणा करने की स्पीड से हतप्रभ थे। गांव सोंगल का रहने वाला लछमन सिंह सातवीं जमात तक पढ़ा है और उसकी गणित में खासी रुचि है। इसी कारण उसने गणना करने के आसान तरीके ईजाद किए। निरंतर अभ्यास से यह संभव हुआ है।

ऐसे करता है गणना

गणना के फार्मूला में दोनों ही संख्याओं के पहले एवं दूसरे अंकों से गणना की शुरुआत की जाती है, चाहे कितनी भी बड़ी गणना क्यों न हो, यह कुछ ही क्षण में की जा सकती है। उसने अपने फार्मूला से तैयार की गई गणना के बाद दोनों संख्याओं में से एक को गणना के परिणाम से भाग देकर जांच की, तो दूसरी संख्या उसके भागफल में आ गई। इससे उसकी गणना का फार्मूला स्वत: सिद्ध हो गया। उसने बताया कि गणित एक ऐसा शास्त्र है, जिसमें परिणाम सही पाए जाने के बाद और कोई सुबूत देने की अवश्यकता नहीं होती।

साभार- दैनिक भास्कर

Saturday, January 1, 2011

भूलना मना है


मैं एक बार कमिटमेंट कर देता हूं तो फिर अपने आप की भी नहीं सुनता। आपका मन जब भी संकल्प से पीछे हटे, तब इस संवाद को दिल से बोलिए...

भूलना मना है
एक और नया साल। एक और नई सुबह। रातभर जश्न, सुबह हैप्पी न्यू ईयर। दोपहर तक तमाम संकल्प। इस बार मैं सिगरेट छोड दूंगा, तुम शराब छोड़ दो, हम डटकर पढ़ेंगे, मैं अपना वजन कम कर लूंगी, हम आपस में नहीं लड़ेंगे, बचत करेंगे, फ्लर्ट नहीं करूंगा/करूंगी आदि इत्यादि जैसी लंबी लिस्ट। सब संकल्प ले रहे हैं। वादे करते हैं। पर एक जनवरी की शाम आते-आते याद का परदा सरकने लगता है। अपने संकल्प का कायाकल्प करने लगते हैं। मैंने सिर्फ सिगरेट छोडऩे का कहा था, सिगरेट शराब दोनों नहीं।
और एक सप्ताह बीतते-बीतते फिर वही कहानी। न कुछ छूटा न कुछ बदला। लंदन में एक रिसर्च ने भी इसे साबित किया है कि सत्तर फीसदी से ज्यादा लोग अपने न्यू ईयर रिजाल्यूशन यानी संकल्प सात दिन में भूल जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण उनमें बदलाव की तड़प ना होना है। साथ ही वे इस बदलाव के लिए अकेले जुझते रहते हैं। वे अपने रिश्तेदारों, दोस्तों की मदद नहीं लेते। जरूरत है करीबियों की मदद लें, देखिए आपके सारे संकल्प पूरे होंगे। वैसे भी यह साल तो ग्यारह अंक का है। ग्यारह यानी एक और एक यानी सहयोग का साल। ग्यारह वो अंक है जिसे हमेशा से शुभ माना गया है। पंडित को दक्षिणा देनी हो, या दान, भगवान को लड्डू चढ़ाना हो या दुर्वा सब ग्यारह हो तो क्या बात है। मंत्रों का जाप भी एक और एक से ही बढ़ता है। ग्यारह, एक सौ एक एक हजार एक, एक लाख एक और जितना चाहो पर एक और एक जरूर होगा। भारत के लिए खेल में भी अभी ग्यारह का जलवा है। सही समझे क्रिकेट में ग्यारह खिलाड़ी और इसी खेल में भारत है दुनिया का नंबर वन । हिंदू व्रत में सबसे फलदायी व्रत एकादशी। हां, धर्मग्रंथों में जरूर दस दिशाओं का जिक्र है। पर हम सफल तभी होंगे जब इसमें एक हमारी अपनी बनाई दिशा भी जुड़े। दस बीत चुका है, ग्यारह में संकल्प करें कि आप कुछ नहीं भूलेंगे। सारे संकल्प निबाहेंगे। सारी बुरी आदतों को नौ दो ग्यारह कहेंगे। वरना फिर वही कहानी। इस बार ठान लीजिए जो संकल्प लिया है, उसे नहीं छोड़ेंगे। सबसे पहले संकल्प लीजिए कि अब मैं इसे कभी नहीं भूलूंगा। फिर भी याद नहीं रहता हो तो सलमान का वह डॉयलाग याद कर लीजिए - मैं एक बार कमिटमेंट कर देता हूं तो फिर अपने आप की भी नहीं सुनता। आपका मन जब भी संकल्प से पीछे हटे तब इस संवाद को दिल से बोलिए।